
श्रीमहादेव जी बोले – ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को महापापी जनों के भी उद्धार के लिए भगवती गङ्गा प्रकट हुईं।।1।। मुनिश्रेष्ठ ! उस तिथि में गङ्गा में स्नान, दान और तप करने से महान पुण्यफल की प्राप्ति होती है; और उसी तरह महापातकों का नाश होता है।।2।। मुने ! उस दिन गङ्गा दस जन्मों में अर्जित पापों का नाश करती हैं। इसीलिए वह दशमी दशहरा तिथि कही जाती है।।3।। हस्त नक्षत्र तथा मंगलवार का दशमी तिथी के साथ योग होने पर स्नान तथा अवगाहन करने वाले मनुष्यों के दस जन्मों में सञ्चित दस प्रकार के पापों का भागीरथी स्वयं नाश कर देती हैं। इसलिए महापापों से मुक्ति चाहने वाले सभी देहधारियों को प्रयत्नपूर्वक गङ्गा में स्नान करना चाहिये।।4-5।।
तदनन्तर महावेगवती भगवती गङ्गा स्वर्ग से निकलकर राजा के रथ का अनुगमन करती हुई दक्षिण दिशा में आयीं।।6।। मार्ग में देवर्षि, गंधर्वों तथा मनुष्यों द्वारा विभिन्न प्रकार के पुष्पसमूहों, बिल्वपत्रों, अक्षत तथा सुन्दर दूर्वादलों आदि से परम भक्तिपूर्वक भगवती गङ्गा की पूजा की गई। उन पुष्पों से शोभायमान, शुद्ध स्फटिक के समान कान्तिवाली, सुरतरंगिणी, वेगवती, भीषण ध्वनि करने वाली तथा फेनों से सुशोभित भगवती गङ्गा दुर्भेद्य दुर्गम पर्वतों को पार कर हाथी-सिंहों को भगाती हुई, विशाल निषेध नामक तथा हेमकूट पर्वत को पार कर हिमालय की सन्निधि में आ गयीं।।7-10।। वहाँ आकर फेन राशि से अद्भुत प्रतीत होने वाली महावेगवती गङ्गा भगवान् शंकर के मस्तक पर आसीन होने के लिए सुशोभित होने लगीं।।11।।
मुने ! इस प्रकार भगवती गङ्गा को निकट आया हुआ जानकर भगवान् शंकर मस्तक पर विस्तृत जटाओं का सेतु बांधकर उन्हें सिर पर धारण करने के लिए हिमालय के शिखर पर इधर-उधर विराजमान हो गए।।12।। महामते ! ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मध्याह्न में गङ्गा भगवान् शम्भु के मस्तक पर वेगपूर्वक पहुँच गयीं।।13।। गङ्गा को अपने मस्तक पर आयी हुई जानकर पूर्णात्मा, जगदीश्वर परमानन्दस्वरूप गङ्गाधर आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे। भगवान् शंकर का नृत्य देखकर पार्श्वस्थ करोड़ों-करोड़ प्रमथगण भी प्रसन्न होकर नाचने लगे।।14-15।।
भगवती गङ्गा भगवान् शंकर के मस्तक को प्राप्त कर परमानन्दित होकर फेन और पुष्प समूहों से सुशोभित हो नाना तरंगों से युक्त होकर विचरण करने लगीं।।16।। तदनन्तर राजा भगीरथ पीछे की ओर भगवती गङ्गा से रहित दिशा को देखकर तथा देवाधिदेव भगवान् शंकर को नाचते हुए देखकर अत्यन्त चिंतातुर हो गए।।17।। तब राजा भगीरथ ने भगवान् शंकर के मस्तक पर भगवती गङ्गा के महानाद को सुनकर यह माना कि वे अत्यंत कोपवाली गङ्गा भगवान् शिव के मस्तक पर पहुँच गई हैं।।18।।
तत्पश्चात राजा भगीरथ ने महाध्वनि वाला शंख बजाया, जिसे सुनकर गङ्गा बाहर निकलने का मार्ग खोजती हुई विचरण करने लगी।।19।।
मुने ! राजा भगीरथ की वशवर्तिनी महावेगवती महानदी भगवती गङ्गा ने शंख की ध्वनि से आकर्षित होकर बाहर निकलने का मार्ग न प्राप्त कर भगवान् शिव के मस्तक पर एक वर्ष का समय बिता दिया।।20।। सूर्यवंशदीपक, धर्मात्मा राजा भगीरथ ने नाचते हुए भगवान् सदाशिव को साष्टाँग प्रणाम कर हाथ जोड़कर कहा – ।।21।।
राजा बोले – शरणागतों पर कृपा करने वाले जगदवन्द्य, देवाधिदेव ! मेरे पितरों का उद्धार करने के लिए अपने मस्तक से भगवती गङ्गा को मुझे प्रदान कर दीजिए। आपने ही मुझे वरदान दिया था और कहा था कि त्रिपथगा गङ्गा स्वयं विवरस्थान पर पहुँचकर तुम्हारे पूर्वजों का उद्धार करेगी। भगवान् विष्णु के विग्रह से मेरे द्वारा लायी गयी उन्हीं गङ्गा का आपने हरण कर लिया तो देव ! मेरे पितरों का उद्धार कैसे होगा। इसलिए परमेश्वर ! आप उनको अपने सिर से निकालकर मुझे दे दें और शंकर ! आप अपने दिए हुए वरदान को सफल करें।।22-25।।
श्रीशिवजी बोले – राजन ! पूर्व में स्वीकृत वचन के अनुसार आपके पूर्वजों की मुक्ति के लिए सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गा आपको दे दूँगा, इसमें संदेह नहीं है।।26।। किन्तु ये ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन हस्त नक्षत्र और मंगलवार का योग होने पर मेरे मस्तक से निकलेंगी। महिपाल ! महामते ! तब तक आप इस पर्वत शिखर पर ठहरें।।27।।
श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! राजा भगीरथ ने ऐसी बात सुनकर उस तिथि और समय की प्रतीक्षा में कुछ काल वहाँ व्यतीत किया।।28।। तत्पश्चात उस तिथि के आ जाने पर राजा भगीरथ ने दिव्य तुषार की आभा तथा महाध्वनि वाले महाशंख को ‘गङ्गे-गङ्गे’ कहते हुए बजाया।।29।। इसे सुनकर सरिताओं में श्रेष्ठ वे महावेगवती गङ्गा भगवान् शंकर की जटा के मध्य कल-कल ध्वनि करती हुई घूमने लगी।।30।। निकलने का द्वार न प्राप्त होने पर शंख की ध्वनि से व्याकुल भगवती गङ्गा ने भगवान् शंकर के शरणागत होकर उनसे कहा – ।।31।।
गङ्गा जी बोलीं – प्रभो ! देव ! जगन्नाथ ! महेश्वर ! मैं आपकी शरणागत तथा राजा भगीरथ की वशवर्तिनी हूँ। अतः आप मुझे मार्ग दीजिये, जिससे मैं पृथ्वी पर स्थित सभी प्राणियों के उद्धार के लिए बाहर निकल सकूँ। राजा भगीरथ की शंख की ध्वनि से आकर्षित मैं अत्यन्त पीड़ित हूँ।।32-33।।
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार भगवती गंगा की बात सुनकर भगवान् शंकर ने उसी क्षण बायें हाथ से दक्षिण दिशा की तरफ अपने जटाबन्ध को खोल दिया, तदनन्तर वे भगवती गङ्गा घोर गर्जना करती हुई भगवान् शम्भु के सिर से निकलकर अत्यधिक तीव्र गति से दक्षिण दिशा में राजा भगीरथ के रथ की ओर चल पड़ी।।34-35।।
मुनिश्रेष्ठ ! राजा भगीरथ भी महाशब्द वाले शंख को बजाते हुए स्वर्ण परिष्कृत रथ को वेगपूर्वक चलाने लगे।। 36½।। नदियों में श्रेष्ठ सुरनदी ‘गङ्गा’ पर्वतराज हिमालय के पृष्ठभाग पर विहार करती हुई गजों, सिंहों आदि जंतुओं को दसों दिशाओं में भगाती हुई जा रही हैं, ऐसा सुनकर मेना तथा पर्वतराज हिमालय उनको देखने के लिए उनके समीप आ गए।।37-38।।
माता-पिता दोनों को देखकर सुरश्रेष्ठ भगवती गंगा साष्टाङ्ग प्रणाम कर उन दोनों से पूजित होकर शीघ्रता से पृथ्वी तल पर गिरीं।।39।। तदनन्तर दिग-दिगन्तरों में पुष्प की वर्षा होने लगी और चारों तरफ लोगों की जयध्वनि गूंजने लगी।।40।। तब भागीरथी गङ्गा पृथ्वीतल को प्राप्त कर तपाये हुए सोने की आभा के समान अपने तेज से दीप्तिमान होने लगीं।।41।। उनका वेग चौगुना बढ़ गया तथा स्वर भी अधिक तीव्र हो गया, फिर भी पृथ्वी भगवती गङ्गा के लाभ से आनंदित हुई।।42।। मुने ! वेगवती गङ्गा रथ से बने हुए मार्ग को खोजती हुई अपनी कल-कल ध्वनि के साथ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ी।।43।।
शाल, चिरौंजी आदि समस्त वृक्षों तथा द्रोणपुष्प के वनों और नगर, ग्राम तथा गृह आदि को चारों तरफ से आप्लावित करके देवर्षियों के द्वारा स्तुत होती हुई राजा भगीरथ की वशवर्तिनी महादेवी भगवती गङ्गा उनके पीछे-पीछे तीव्र गति से बढ़ने लगी।।44-45।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘भगवान शंकर के जटाजूट का भेदन करके मेना एवं हिमालय के दर्शन और पूजन के बाद भूपृष्ठागमन’ नामक उनहत्तरवां अध्याय पूर्ण हुआ।।
