महाभागवत – देवी पुराण – सत्तरवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार महादेवी गङ्गा बहुत योजन दूरी को पारकर उन महात्मा राजा भगीरथ के साथ हरिद्वार आ गयीं।।1।। नारद ! वहाँ सप्तर्षियों ने देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ गङ्गा को देखकर शंख की ध्वनि के साथ आनन्दपूर्वक उनकी पूजा की और उन सातों ऋषियों ने भी सातों दिशाओं में पृथक-पृथक महाशंख बजाये। तब उस शंखध्वनि को सुनकर भागीरथी गङ्गा तीव्र वेग धारण कर राजा भगीरथ के समीप में ही सात धाराओं में विभक्त हो गयीं। तत्पश्चात पराशाम्भवी भगवती गङ्गा ने वेगपूर्वक पाषाणों को तोड़कर नदियों के साथ मिलकर आग्नेय दिशा की ओर प्रस्थान किया।।2-4½।। मुनिश्रेष्ठ ! शिवा भगवती गङ्गा प्रयाग में आकर यमुना और सरस्वती के साथ मिल गयीं। प्रयाग में पुण्यमयी भागीरथी गंगा देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं। मुने ! वहाँ किये गए स्नान, तप और दान-पुण्य से भी पुण्यतर हैं। वहाँ ब्रह्मादि तथा सभी सुराधीश भी स्नान कर अपने-आपको पवित्र मानते हैं तो फिर अन्य की क्या बात है।।5-7।।  

तत्पश्चात महेश्वरी गङ्गा पूर्वाभिमुख होकर कुछ दूर चलकर भगवान् शंकर का दर्शन करने के लिए उत्तराभिमुख होकर काशी को प्राप्त हुई।।8।। मुने ! जिस प्रकार काशी मोक्षप्रदा हैं, उसी प्रकार पुण्यतमा भगवती गङ्गा महान पापों का नाश करने वाली हैं।।9।। वहाँ ज्ञान अथवा अज्ञानपूर्वक देह त्याग करने वाले प्राणी को सुरोत्तमा कल्याणी भगवती गङ्गा शाश्वत शान्तिप्रद मोक्ष प्रदान करती हैं।।10।। महामुने ! काशी में देह त्याग करने वाले पापी प्राणियों को भी मुक्ति के लिए अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं होती, यह मैं सच-सच कहता हूँ।।11।। भगवती गङ्गा सभी स्थानों पर सुलभ हैं, किन्तु हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गा सागर संगम – इन तीन स्थानों पर गङ्गा की प्राप्ति दुर्लभ है।।12।। 

नारद ! इस प्रकार परमवेगवती गङ्गा को काशी में आयी हुई देखकर काशी क्षेत्र की रक्षा करने वाले भैरवश्रेष्ठ (कालभैरव्) दण्ड लेकर तीव्र गति से उनकी ओर दौड़े। दुर्धर्ष भैरव ने गङ्गा से कहा – द्रवमयी तुम कौन हो और कहाँ से आयी हो, निम्नगे ! तुम काशी को क्यों जलाप्लावित कर रही हो? यह देवाधिदेव भगवान् शंकर की नगरी है। इस नगरी के संरक्षक मुझ भैरव को क्या तुम नहीं जानती हो! ।।13-15½।।  तदनन्तर भीषण नेत्र वाले, हाथ में दण्ड उठाये हुए, साक्षात प्रलयंकारी महाकालसदृश भैरव से भगवती गङ्गा ने यह वचन कहा – ।।16½।। मैं द्रवमयी भगवती गङ्गा भगवान् शंकर की प्रिया हूँ और पृथ्वीतल पर आयी हूँ तथा भगवान् शंकर के शीश पर प्रतिष्ठित होकर भगवान् विश्वेश्वर के दर्शन के लिए उनके निकट काशी आयी हूँ। कालभैरव ! आप रुकिए, मैं काशी को जलाप्लावित नहीं करुँगी।।17-18।।  

श्रीमहादेव जी बोले – भगवती गङ्गा के इस प्रकार कहने पर महाबाहु कालभैरव ने अपने दण्ड को नीचे कर के शिवप्रिया भगवती गङ्गा को नमस्कार किया।।19।। महात्मा भैरव के द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर भगवती गंगा कामाख्यापीठ का दर्शन करने के लिए पूर्वाभिमुख हो गयीं।।20।। उनका अभिप्राय जानकर महाबुद्धिमान राजा भगीरथ ने भी कुछ क्षण के लिए अपने सारथी को रोक दिया और शंख बजाना भी बंद कर दिया।।21।। उसी समय जह्नु ऋषि ने शंख ध्वनि की, जिसे सुनकर भगवती गङ्गा तीव्रवेग से उनके आश्रम में चली गयीं।।22।। राजा भगीरथ ने वेग से वहाँ जाती हुई भगवती गङ्गा को देखकर महामेघगर्जन करने वाला अपना महाशंख पुनः बजाया। महाशंख की उस ध्वनि को सुनकर और उसे पूर्व परिचित समझकर वे जान गयीं कि परम तेजस्वी मुनीश्वर जह्नु ने मेरा हरण किया है।।23-24।।  

मुने ! उस ध्वनि को सुनकर भगवती गङ्गा क्रोधान्वित होकर जह्नु ऋषि के आश्रम को बहाने के लिए परम वेग के साथ बह चलीं।।25।। जह्नु ऋषि ने भी गङ्गा का अभिप्राय जानकर अपने ब्रह्म तेज के बल से हठात अपने हाथ की अञ्जलि में भरकर उस सम्पूर्ण गङ्गा को पी लिया।।26।। उसके बाद आकाश तथा पृथ्वीलोक में मनुष्यों आदि सभी प्राणियों में हाहाकार मच गया।।27।। राजा भगीरथ दुःख से पीड़ित होकर रोने लगे, पृथ्वी भी दु:खी हो गयी, दिशाएँ व्याकुल हो गयीं तथा भगवान् भास्कर का तेज म्लान हो गया।।28।।  तत्पश्चात राजा को रोता हुआ देखकर भक्तवत्सला गङ्गा ने कहा – भगीरथ ! आप पुनः अपने महाशंख को बजायें।।29।। महामते ! आपके शंख की महाध्वनि से आकृष्ट मनवाली, अति वेगवती मुझको रोक रखने में इस संसार में कोई समर्थ नहीं है।।30।। गङ्गा के द्वारा इस प्रकार आदेश प्राप्त होने पर प्रमुदित राजा ने पृथ्वी को क्षुब्ध करने वाला महाशंख पुनः बजाया।।31।। शंखध्वनि को सुनकर वे महादेवी भगवती गङ्गा जह्नु मुनि की जङ्घा का भेदन कर सहसा अत्यन्त तरङ्गयुक्त होकर तीव्रधारा के साथ निकल पड़ी।।32।।  तत्पश्चात भगवती गङ्गा अत्यन्त वेगपूर्वक जह्नु मुनि की जङ्घा से बाहर आ गयीं। यह जानकर मुनि ने भी भगवती गङ्गा को नमस्कार कर इस प्रकार स्तुति की – ।।33।।  

मुनि बोले – माता ! आप सर्वश्रेष्ठ, अतुलनीया पराशक्ति, सर्वाश्रयदात्री, लोगों को पवित्र करने वाली तथा सम्पूर्ण जगत द्वारा वन्दित चरणकमल वाली हैं। आपको ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तत्त्वत: नहीं जानते तथा अन्य लोग भी नहीं जानते। भगवान् शिव के मस्तक से सम्मानित शिवे ! फिर मैं आपको कैसे जान सकता हूँ ! ।।34।। मैं आपके अचिन्त्य और अपार रूप तथा चरित्र का क्या वर्णन करूँ? ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित आप सुरनदी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाली शिवे ! माता ! आप अपने शुभ गुणों से पुण्य तथा करुणा का विस्तार करके मुझ कृतापराध और शरणागत को क्षमा कीजिये।।35।। मेरा इस पृथ्वी पर जन्म और कर्म दोनों धन्य हुए, मेरी कठिन तपस्या धन्य हुई तथा मेरे ये दोनों नेत्र भी धन्य हुए; जो त्रिलोचन भगवान् शंकर की आराध्या आपका मैं अपने नेत्रों से दर्शन कर रहा हूँ। आपके जल के स्पर्श से ये मेरे दोनों हाथ धन्य हो गए और यह मेरा शरीर भी धन्य हुआ है, जिसमें आपका पावन जल गया।। 36।।  

पापों का संहार करने वाली, भगवान् शंकर के मस्तक पर विराजमान तथा सभी प्राणियों के हित के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण आपको नमस्कार है, नमस्कार है।।37।। देवी गङ्गे आप स्वर्ग और मोक्ष देने वाली हैं, पतितों को पवित्र करने वाली हैं, मैं आपकी शरण में हूँ, आप मुझ पर प्रसन्न होकर मेरा उद्धार कीजिये ।।38।।  

महादेवजी बोले – मुनीश्वर जह्नु के द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जाने पर प्रसन्न मुखकमल वाली, दिव्यरूपधरा भगवती गङ्गा ने मुनिश्रेष्ठ जह्नु से कहा – ।।39।।  

गङ्गाजी बोलीं – तात ! मैं आपकी पुत्री हूँ; क्योंकि मैं आपके शरीर से निकली हूँ। मुने ! इसमें आपका कोई अपराध नहीं है; आप स्थिरचित्त हों।।40।।   

पिता ! आज से मेरा नाम ‘जाह्नवी’ हो गया। मुनिश्रेष्ठ ! इस संसार में आपकी कीर्ति विख्यात होगी।।41।। मुने ! इस संसार में जो लोग मेरा जाह्नवी के नाम से एक बार भी स्मरण करेंगे; उन्हें पाप तथा दुःख नहीं होंगे ।।42।। मुनिश्रेष्ठ ! आप मेरे परमभक्त हैं। जो लोग आपके चरित्र का स्मरण करेंगे, उन पर मैं सदा प्रसन्न रहूँगी।।43।।  

श्रीमहादेवजी बोले – उन मुनिश्रेष्ठ से इस प्रकार अनेकश: कहकर भगवती गङ्गा ने उनके द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होकर पुण्यकीर्ति महामति राजा भगीरथ के पास जाने की इच्छा से ऐसा कहा – ।।44।।  

गङ्गा जी बोलीं – तात ! आपके द्वारा प्रार्थना करने पर मैं भगवान् विष्णु के शरीर को त्यागकर पृथ्वीतल पर चली आयी हूँ और आपके वशीभूत हूँ। कामाख्या महापीठ के दर्शन की इच्छा से मैं पूर्वाभिमुख हो गयी थी। प्रारम्भ में ही वहाँ जह्नु मुनि के साथ कुछ विरसता आ गयी। इसलिए मैं आपसे पूछती हूँ कि आपकी जहाँ जाने की इच्छा हो, वहीं मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगी। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसे ही बतायें।।45-47।। 

राजा बोले – मुनि के शाप से भस्मीभूत मेरे पूर्वज दक्षिण दिशा में हैं, जिनके उद्धार के लिए मैं आपको पृथ्वीतल पर लाया हूँ, अतः उनके उद्धार के लिए शीघ्र चलें।।48।।  

श्रीमहादेव जी बोले – महाबाहु राजा भगीरथ ने इस प्रकार कहकर पुनः महाशंख को बजाया। भगवती गङ्गा भी उनके पीछे दक्षिण दिशा में चल पड़ी। तब थके हुए राजा भगीरथ कुछ दूर चलकर रथ पर बैठकर विश्राम करने लगे और थका हुआ सारथि भी विश्राम करने लगा। महामते ! मुने ! इसी बीच जह्नु मुनि की पुत्री पद्मा ने अपनी बहन भगवती को देखने की इच्छा से शंख बजाया। शंख की ध्वनि सुनकर चञ्चला महादेवी गङ्गा उस शब्द की ओर अग्निकोण मुखी होकर कुछ दूर चली गयीं। उसी क्षण राजा भगीरथ ने भगवती गङ्गा को दूसरी ओर जाती हुई देखकर अपने सारथि से कहा – सखे ! घोड़ों को तेज चलाओ। जैसे गौ अपने बछड़े की ध्वनि से आकृष्ट होकर उसकी ओर दौड़ती है, उसी प्रकार शंख की ध्वनि को सुनते ही मोहित होकर भगवती गङ्गा दूसरी ओर भागी जा रही हैं।।49-54।।   

नारद ! इतना कहकर राजा भगीरथ ने भी शीघ्र ही शंख बजाया तथा सारथि ने भी रथ को तीव्र गति से चलाया।।55।। यह सुनकर पुनः भगवती गङ्गा राजा के रथ की अनुगामिनी हो गयीं। इसी कारण पद्मा अत्यन्त क्रुद्ध होकर जल रूप में सुशोभित होने लगीं। वह पुण्यसलिला पद्मा विस्तृत प्रवाह से वेगपूर्वक पूर्व दिशा की ओर चलीं और सिंधुराज में मिल गयीं।।56-57।। तत्पश्चात पाप का हरण करने वाली भगवती महादेवी गङ्गा अत्यन्त वेगपूर्वक दक्षिण दिशा की ओर चली गयीं।।58।। भगवती गङ्गा राजा सगर के वंशजों का अन्वेषण करती हुई वेगपूर्वक समुद्र के निकट पहुंचकर हजारों धाराओं में उसके चारों ओर फैल गयीं। वह समुद्र उनके कल-कल निनाद से व्याप्त होकर सुशोभित होने लगा।।59।। समुद्र ने देवेन्द्र से पूजित महावेगवती भगवती गङ्गा को आयी हुई जान करके वहाँ आकर अपनी धारा चारों ओर फैलाकर पुष्प, गंध तथा धूप आदि से उनका अर्चन किया।।60।।  

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘श्रीजह्नुतनयासमुद्रतीरप्राप्ति’ नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।