महाभागवत – देवी पुराण – इक्यावनवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! प्रातःकाल पुत्रोंत्पत्ति की जानकारी होने पर नन्द जी ने उसका जन्मोत्सव मनाया और ब्राह्मणों को हजारों गाय, दिव्य वस्त्र तथा बहुत सारा धन देकर राजा कंस को कर देने के लिए शीघ्र ही मथुरा के लिए प्रस्थान किया ।।1-2।। इसी बीच मंत्रियों से परामर्श करके कंस ने बालकों को मार डालने वाली पूतना नाम की राक्षसी को गोकुल में भेजा। मुने ! वह पूतना उसकी आज्ञा से सुंदर रूप धारण करके गोकुल आकर नन्द के घर में प्रविष्ट हो गयी ।।3-4।। उसे आती हुई देख के व्रज की सभी स्त्रियाँ परस्पर बातचीत करने लगीं कि सुंदर रूपवाली यह कौन रमणी यहाँ आ गयी? क्या देवराज इन्द्र की पत्नी शची अथवा कामदेव की पत्नी स्वयं रति नन्द के पुत्र को देखने के लिए आई हुई हैं ।।5-6।। इच्छानुसार रूप धारण करने वाली उस राक्षसी को पहचान कर श्रीकृष्ण ने दोनों आँखें बंद कर लीं और पलने पर स्थित होकर उन्होंने इसे पुनः देखा ।।7।। अग्नि के समान प्रदीप्त उस बालक को पर्यंक पर स्थित देखकर वह क्रूर राक्षसी पूतना विनम्रतापूर्ण मधुर वाणी में यशोदा से कहने लगी – ।।8।। 

पूतना बोली – सखी यशोदा ! इसे मैं तुम्हारे सैकड़ों जन्मों का अर्जित भाग्य मानती हूँ, जो कि तुम्हारे यहाँ पर यह सर्वांग सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ है। आज मैं तुम्हारे इस सर्वांग सुंदर श्याम वर्ण वाले पुत्र को देखकर परम हर्षित हूँ। तुम्हारा यह सुंदर पुत्र दीर्घकाल तक जीवित रहे।।9-10।। 

श्रीमहादेव जी बोले – [नारद !] इस प्रकार की स्नेह संबंधी वाणी बोलकर उस राक्षसी ने यशोदा से पुनः ऐसा कहा कि इस बालक को मेरी गोद में दें दीजिए ।।11।। 

तदनंतर उसका वचन सुनकर यशोदा ने उसकी गोद में पुत्र को दे दिया और तब उसने श्रीकृष्ण के मुख में अपना विषाक्त स्तन दे दिया ।।12।। श्रीकृष्ण ने उसे क्रूर स्वभाव वाली राक्षसी पूतना पहचानकर अपने अपने ओष्ठ के द्वारा उसके स्तन से प्राणों सहित दुग्ध का पान किया। तत्पश्चात उस सौम्य रूप को छोड़कर वह भयानक राक्षसी के रूप में आ गयी और ‘छोड़ दे, छोड़ दे’ – ऐसा कहती हुई उसने प्राणों का परित्याग कर दिया। तदनंतर विकराल  मुखवाली वह भयंकर पूतना पृथ्वी को पीड़ित करती हुई विशाल पर्वत की भांति धरातल पर गिर पड़ी, जिससे पूरा गोकुल ढक गया।।13-15।।                                               

श्रीकृष्ण उसके वक्ष:स्थल पर अचानक भयानक मुखवाली, मुंडमाला से सुशोभित दूसरी कालिका देवी के रूप में विराजित होने लगे। भगवती कालिका ने उस राक्षसी पूतना के शरीर से हटकर क्षणार्ध में श्याम वर्ण के बालकृष्ण का रूप धारण कर लिया ।।16-17।। यह सब देखकर वे समस्त ब्रजवासी अत्यंत आश्चर्यचकित हो उठे और उन्होंने शिशुरूप श्रीकृष्ण को परात्पर आद्या शक्ति के रूप में माना ।।18।।  इसके बाद औषधियुक्त जल से श्रीकृष्ण का मार्जन करके यशोदा जी ने उन्हें उठाकर अपनी गोद में लिपटाकर उनके मुखारविंद में अपना स्तन दे दिया ।।19।। इसी बीच उस पापी राजा कंस को राज्य देकर नंदगोप भी वहाँ आ गए। महामुने ! उस बालक का यह अद्भुत कृत्य सुनकर उन्होंने आदरपूर्वक अनेक उपचार अर्पण करके भगवती की विधिवत पूजा की ।।20-21।। 

इसके बाद पूतना के निधन का समाचार तथा श्रीकृष्ण की यह आश्चर्यजनक लीला सुनकर कंस ने उन्हे अपना कालरूप समझ लिया। तत्पश्चात कंस ने गोकुल में स्थित श्रीकृष्ण को तेजी से उड़ाकर उठा लाने के लिए महान असुर तृणावर्त को भेजा ।।22-23।। 

वह तृणावर्त आया और उन श्रीकृष्ण को एकांत में बैठा हुआ देखकर उन्हें अपनी दोनों भुजाओं में जकड़कर आकाश में ले गया और वहीं स्थित हो गया। उसकी गोद में विराजमान श्रीकृष्ण मुस्कराकर तत्काल ब्रह्मरूपिणी काली के रूप में प्रकट हो गए। वे बाघम्बर धारण किए थीं और महान मेघ के समान गर्जना कर रही थीं। उन काली के उस नाद से मूर्छित होकर वह महान असुर तृणावर्त पर्वतों, वनों और वाटिकाओं के सहित पृथ्वी को चलायमान करता हुआ गिर पड़ा ।।24-26।। 

नारद ! तत्पश्चात भगवती काली खड्ग से उसका सिर काटकर और पुनः बालक के रूप मे होकर उस राक्षस के वक्ष:स्थल पर स्थित हो गयी और यशोदा जी ने वहाँ आकर एक विशाल पर्वत के समान पड़े, कटे मस्तक वाले और खून से लथपथ मारे हुए राक्षस को देखा। यह देखकर वह अत्यंत आश्चर्य चकित होकर अपने पुत्र को खोजने लगीं। वहाँ बलवान तृणावर्त पर बैठे प्रसन्नवदन श्यामसुंदर को हँसते हुए देखकर उन्हें अत्यंत विस्मय हुआ और ‘वत्स, वत्स!’ – ऐसा कहती हुई उन्होंने श्रीकृष्ण को झट से उठाकर अपनी गोद में ले लिया ।।27-30।। 

मुनिश्रेष्ठ ! नन्द भी वहाँ आकर अत्यधिक रक्त से लथपथ तथा निष्प्राण होकर भूमि पर पड़े उस घोर रूप तृणावर्त को देखकर और श्रीकृष्ण के द्वारा उसे मारा गया जानकर अति आनंदित हुए ।।31½।। इस प्रकार लीला से पुरुष का रूप धारण करने वाली भगवती जगदंबा यशोदा और नंदगोप को उनकी तपस्या का फल प्रदान करने के लिए शिशुभाव का आश्रय ग्रहण करके गोकुल में स्वयं विराजमान हुई ।।32-33।। उसी समय भगवान शिव वृषभानु के घर में अपनी लीला से स्त्रीरूप में जन्म लेकर ‘राधा’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए ।।34।।

महामुनि ! उन राधा के पास जाकर एक गोप ने संबंध बनाने की कुचेष्टा की, किन्तु भगवान शिव की इच्छानुसार वह अचानक ही क्लीब (नपुंसक) हो गया।।35।। वे राधा कमल के समान नेत्रवाले कृष्ण के पास प्रतिदिन जाकर प्रेमपूर्वक अपने अंक में बिठाकर अत्यंत आदर से उन्हें देखा करती थी।।36।। उधर महान असुर तृणावर्त के निधन का समाचार सुनकर कंस नंदपुत्र श्रीकृष्ण के अपहरण का उपाय दिन-रात सोचता रहता था ।।37।।

मुने ! परम आनन्द से परिपूर्ण आत्मा वाले रोहिणी पुत्र श्रीबलराम असीम तेजस्वी श्रीकृष्ण के साथ दिन-रात क्रीडा करने में लीन रहते थे। उसी प्रकार कमल के समान सुंदर मुखवाले रूप सम्पन्न श्रीदाम तथा वसुदाम नामक दोनों गोपकुमार भी उन श्रीकृष्ण के साथ खेला करते थे। महामते ! उन सबके प्रेम भाव से प्रसन्न मन वाले श्रीकृष्ण राधा के साथ विहार करने की इच्छा से गोकुल में रहने लगी ।।38-40।। 

।। इस प्रकार श्री महाभागवत महा पुराण के अंतर्गत ‘ पूतना वध के अनंतर तृणावर्तवधोपाख्यान’ नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।