महाभागवत – देवी पुराण – पचासवाँ अध्याय

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श्री महादेव जी बोले – ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर साक्षात भगवती देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए अपने अंश से वसुदेव पुत्र भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुई और विष्णु भगवान ने भी वसुदेव के घर में महान बल तथा पराक्रम वाले श्रीबलराम एवं दूसरे पांडुपुत्र धनुर्धरों में श्रेष्ठ अर्जुन – इन दो रूपों में होकर पृथ्वीतल पर जन्म लिया।।1-2½।। महामते! अब उनके जन्म के संबंध में विस्तार से सुनिए। उसमें मैं प्रारंभ में श्रीबलराम और श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन करूंगा, आप उसे सुनें – ।।3½।। 

प्राचीनकाल में देवताओं की माता अदिति तथा प्रजापति कश्यप ने दीर्घकाल तक सच्ची भक्ति से भगवती की उपासना की। उन दोनों ने निराहार रहते हुए शीतकाल में जल में खड़े होकर तथा ग्रीष्मकाल में अग्नि के मध्य स्थित रहकर दो हजार दिव्य वर्षों तक भक्तिपूर्वक कठोर तप किया। उन दोनों पर प्रसन्न होकर भगवती जगदीश्वरी साक्षात प्रकट हो गयी और बोलीं – आप दोनों की क्या अभिलाषा है? जो भी हो उसे माँग लीजिए।।4-6½।। तब उन दोनों ने बार-बार साष्टांग प्रणाम करके उनसे कहा – माता ! आप हम दोनों के घर में लीलापूर्वक जन्म ग्रहण कीजिए ।।7½।।

सुरोत्तमे ! जैसे दक्ष प्रजापति के घर में आपका जन्म हुआ था, उसी प्रकार द्वापर युग के अंत में पृथ्वीतल के किसी स्थान पर हमारे घर में भी आप जन्म लें।।8-9।।

श्रीदेवी जी बोली – स्त्री रूप में अवतीर्ण शम्भु की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए मैं अपनी इच्छा से नवीन मेघ के समान कांतिवाले पुरुष रूप में आविर्भूत होऊँगी तथा मेरी यह मुंडमाला भी वनमाला हो जाएगी। मेरा यह भयानक विग्रह सौम्यरूप, दो नेत्रों तथा दो भुजाओं से युक्त, पीताम्बर से सुशोभित, हाथ में वंशी लिए हुए तथा गोपियों के मन को आकर्षित करने वाला, ऐश्वर्ययुक्त भगवान विष्णु के लक्षणों से सम्पन्न होगा ।।10-12।।

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे महादेवी उन दोनों के समक्ष ही अन्तर्धान हो गईं और वे दोनों प्रसन्न होकर अपने स्थान को चले गए ।।13।।

वे प्रजापति कश्यप यदुकुल में जन्म लेकर वसुदेव – इस नाम से भूलोक में विख्यात हुए और नारद ! उन अदिति ने भी दुष्ट प्रकृति वाले राजा कंस की बहन देवकी तथा रोहिणी – इन दो रूपों में जन्म लिया। मुनिश्रेष्ठ ! शरतकालीन चंद्रमा के समान मुखवाली उन देवकी तथा रोहिणी के साथ वसुदेव ने विधानपूर्वक विवाह किया। रानी देवकी के उस विवाह में महान असुर कंस ने बहन के स्नेह के कारण बहुत बड़ा मंगलोत्सव किया। तत्पश्चात देवकी तथा वसुदेव के प्रस्थान के समय अत्यंत दुष्ट बुद्धिवाला कंस भी रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ आया।।14-18।।   

मुने ! इसी समय अचानक देवभाषा में आकाश से अशरीरी वाणी (आकाशवाणी) उत्पन्न हुई कि राजन ! महीपते ! इसके आठवें गर्भ से जो बालक उत्पन्न होगा, वह निश्चित रूप से तुम्हारा संहार करनेवाला होगा ।।19-20।। 

ऐसा सुनकर वह दुष्टबुद्धि कंस देवकी को काट डालने की इच्छा से तलवार लेकर अकस्मात बड़े वेग से उनकी ओर दौड़ा। तब उन महामति वसुदेव ने उसके चरणों में गिरकर कहा कि इसके गर्भ से उत्पन्न सभी संतानें मैं आपको दे दूंगा और आप उसे लेकर जो चाहे सो कीजिएगा ।।21-22½।।

मुनिश्रेष्ठ ! तत्पश्चात उस दुष्टस्वभाव कंस ने वहाँ रक्षक नियुक्त कर दिए और इस प्रकार उन देवकी को जान से मारने का विचार छोड़ दिया। उस दुष्टात्मा ने रक्षकों से कह दिया कि रक्षकों ! जब इसके पुत्र उत्पन्न हों तब तुम लोग मेरे पास आकर मुसे बता देना और इसके आठवें गर्भ के होने पर तुम लोग मुझसे अवश्य कहना; तब मैं अपनी इस बहन का गर्भ सहित वध कर दूँगा ।।23-25½।।   

देवकी के लिए नियुक्त रक्षकों को यह आदेश देकर वह दुरात्मा कंस खिन्नमनस्क होकर मंत्रियों के साथ अपने भवन में प्रविष्ट हो गया ।।26½।।

तदनंतर उन देवकी की संतान उत्पन्न होने पर रक्षकगण उसकी आज्ञा के अनुसार उसे बता दिया करते थे और मुनिश्रेष्ठ ! वह पापात्मा कंस देवकी से उत्पन्न हुए पुत्रों के विषय में सुन-सुनकर वहाँ पहुँच जाता था तथा उन नवजात शिशुओं को हाथ से पकड़कर उन्हें पत्थर पर पटक कर मार डालता था ।।27-28½।।   

इस प्रकार देवकी के गर्भ से उत्पन्न छ: संतानों को मारकर उस मूर्ख बुद्धि कंस ने सातवें गर्भ के लिए देवकी के रक्षकों को अत्यधिक सावधान कर दिया  ।।29-30।।

इसी बीच जगतपति ब्रह्मा जी विचार-विमर्श करने के लिए सभी देवताओं के साथ कैलास शिखर पर गए। उन्होंने महादेवी तथा सदाशिव को प्रणाम करके भगवती के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर उनसे यह वचन कहा – ।।31-32।।

ब्रह्माजी बोले – माता ! आपने कहा था कि पृथ्वीतल पर देवकी के गर्भ से पुरुष रूप में जन्म लेकर मैं पृथ्वी के भार का निश्चित रूप से शमन करूंगी। अत्यंत नीच बुद्धि वह राजा कंस पैदा होते ही उसकी सभी संतानों को शिला पर पटक कर मार डालता है। पूर्वकाल में देवकी के विवाह में उस दुर्मति कंस के लिए भयदायक बड़े ऊँचे स्वर में आकाशवाणी हुई थी कि ‘दुर्मते ! देवकी के गर्भ से जो आठवाँ बालक उत्पन्न होगा, वह तुम्हारा विनाशकारी होगा – ऐसा तुम निश्चित रूप से जान लो’ ।।33-36।।

शिवे ! तब उसे सुनकर अत्यंत नीच उस कंस ने उसी क्षण देवकी को काट डालने का प्रयास किया; तब वसुदेव ने उत्पन्न होने वाली संतानों को उसे सौंप देने की प्रतिज्ञा करके देवकी को मार देने से रोक दिया। तत्पश्चात अत्यंत मूर्ख बुद्धि कंस ने यह निश्चय किया कि इसके आठवें गर्भ के होने पर मैं देवकी को अवश्य ही मार डालूँगा। इसलिए उग्र प्रतापी तथा अपराजेय होते हुए भी उस कंस ने देवकी के गर्भ से उत्पन्न छ: पुत्रों को पैदा होते ही मार डाला। परमेश्वरि ! अब यदि आप देवकी के सातवें गर्भ से जन्म नहीं लेंगी, तब फिर देवकी से आपका जन्म कैसे होगा और फिर आप पृथ्वी के भार का नाश किस प्रकार करेंगी; यह मुझे बताइए ।।37-41।।   

श्रीदेवी जी बोलीं – ब्रह्मन ! आकाशवाणी अन्यथा नहीं हो सकती। देवकी के आठवें गर्भ से मेरा जन्म अवश्य होगा। कमलासन ! मैं आपको उपाय बता रही हूँ; आप उसी के अनुसार प्रयास कीजिए। अब आप विलंब मत कीजिए और शीघ्रतापूर्वक वैकुंठलोक के लिए प्रस्थान कीजिए ।।42-46।।

भगवान विष्णु अपने अंश से वसुदेव के घर में मेरे बड़े भाई बलराम के रूप में पृथ्वीतल पर अवश्य उत्पन्न होंगे। पूर्वकाल में इन विष्णु के साथ मेरी इस प्रकार की वचनबद्धता भी हो चुकी है। अतः आप उन जगतपति विष्णु से शीघ्र ही कहिए कि वे अपने अंश से पृथ्वीतल पर वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ में प्रविष्ट होवे ।।44-45½।।

मैं भी अपने अंश से दो रूपों में होकर पृथ्वीतल पर रोहिणी तथा यशोदा के गर्भ मे जाऊँगी। पांचवें माह के आने पर मैं रोहिणी के गर्भ से देवकी के गर्भ में चली जाऊँगी और कमलयोनि ! विष्णुजी उनके गर्भ से रोहिणी के गर्भ में चले आएंगे। इस प्रकार देवकी के आठवें गर्भ से मेरा जन्म हो जाएगा और वह दुर्बुद्धि कंस इस आठवें गर्भ को समझ भी नहीं पाएगा ।।46-50।।

इस प्रकार मैं देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेकर सैनिकों सहित उस दुष्ट कंस को समय आने पर मार डालूँगी। जब तक इस कंस का पुण्यकर्म क्षीण नहीं होता, तब तक उस हेतु जो कुछ किया जाना चाहिए, उसे आप मुझसे सुनिए ।।51-52।।  

प्रजापते ! एक ही समय में देवकी के गर्भ से पुरुषरूप तथा यशोदा के गर्भ से स्त्रीरूप में लीलापूर्वक मेरे उत्पन्न होने के पश्चात देवकी के गर्भ से (श्रीकृष्ण रूप में) उत्पन्न हुई मुझको तत्काल गोकुल में यशोदा के गर्भ स्त्री रूप में उत्पन्न मुझ बालिका को ले आकर वसुदेव जी को उस दुरात्मा कंस से ऐसा कहना चाहिए कि राजन ! मेरी यह कन्या उत्पन्न हुई है; इसकी रक्षा कीजिए ।।53-55½।। 

तत्पश्चात जब वह असुर कंस उसे मारने का प्रयास करेगा, उसी समय मेरी वह मूर्ति उसके संहारक श्रीकृष्ण के विषय में कहते हुए उस दुर्बुद्धि कंस के देखते-देखते आकाश में चली जाएगी। कमलासन ! तदनंतर उस कंस के प्रारब्ध कर्म के क्षीण होने पर मैं गोकुल से आकर उस नीच को मार डालूँगी ।।56-58।।     

श्रीमहादेव जी बोले –  देवी के इस प्रकार कहने पर भगवान ब्रह्मा वैकुंठ आ गए और उनके द्वारा जो कुछ भी कहा गया था, वह सब उन्होंने विष्णु जी से कह दिया ।।59।। महामते ! उसे सुनकर भगवान विष्णु ने अपने अंशद्वारा रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न होने के लिए देवकी के गर्भ में प्रवेश किया और इधर जगद्धात्री भगवती भी पृथ्वी का भार मिटाने के लिए दो रूपों में विभक्त होकर रोहिणी तथा यशोदा के गर्भ में प्रतिष्ठित हुई ।।60-61।।

तत्पश्चात भादों महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृक्ष लग्न में अर्धरात्रि की वेला में भगवती ने देवकी के गर्भ से परम पुरुष के रूप में जन्म लिया। उस समय मेघ समुदाय गर्जना कर रहे थे, चारों ओर अंधकार छाया हुआ था, सभी रक्षक तथा अन्य लोग निद्रावस्था में थे। उस बालक के शरीर का वर्ण नवीन मेघ के सदृश श्याम था और वह वनमाला से सुशोभित था। उसके वक्ष:स्थल पर श्रीवत्स चिन्ह विराजमान था, दोनों नेत्र प्रभायुक्त थे, दो भुजायें थी, सभी अंग दिव्य थे और वह अपने तेज से देदीप्यमान प्रतीत हो रहा था। उस नवजात बालक को देखकर उसे साक्षात पूर्ण ब्रह्मसवरूप समझकर देवकी ने करूण रुदन करते हुए उससे यह वचन कहा – सुलोचन ! तुम कौन हो, जो मुझ अभागिनी के गर्भ से उत्पन्न हुए हो। पैदा होते ही मेरे पुत्रों का वध कर देने वाले शत्रु रूप मेरे भाई कंस को क्या तुम नहीं जानते? मेरे पुत्र रूप में तुम्हारे जन्म लेने का समाचार सुनकर वह दुष्टात्मा कंस मुझे शोक संतप्त करके आज ही तुम्हारा वध कर देगा ।।65-71।।   

श्रीमहादेव जी बोले – उन माता देवकी का यह वचन सुनकर वह बालक महान दु:ख से व्याकुल उन देवकी को अपने अमृतरूपी वचनों से प्रसन्न करते हुए कहने लगा – ।।72।।

बालक बोला – माता ! आप भय मत कीजिए, क्योंकि इन तीनों लोकों में असुर, देवता अथवा मनुष्य कोई भी मुझे मारने वाला नहीं है। मैं जगत का संहार करने वाली आदिशक्ति पराविद्या हूँ – पूर्व जन्म में किए गए आप दोनों के तप से प्रसन्न होकर तथा भगवान शिव की सम्मति से मायामयी श्रेष्ठ पुरुषाकृति में मैं इस समय देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए आपके गर्भ से उत्पन्न हुई हूँ ।।73-75।।

देवकी बोली – वत्स ! तुम्हारा यह वचन सुनकर मुझे आश्चर्य हो रहा है। सुलोचन ! अब तुम मुझे अपने उत्कृष्ट देवी रूप का दर्शन कराओ ।।76।।

श्रीमहादेव जी बोले – देवकी के ऐसा कहते ही कमल के समान नेत्र वाले श्रीकृष्ण तत्काल शव पर आरूढ़ भयानक मुखवाली भगवती काली के स्वरूप में प्रकट हो गए। उनकी चार भुजाये, तीन नेत्र एवं लपलपाती हुई भीषण जिह्वा थी। उनके लहराते हुए लंबे केशपाश से उनकी पीठ ढकी हुई थी और उन्होंने सुंदर किरीट धारण कर रखा था। मुने ! उस समय वह चित्ताकर्षक वनमाला भी मुंडसमूहों से बनी हुई अत्यंत सुंदर तथा लंबी माला के रूप में हो गयीं ।।77-79।।

उस बालक को भयानक काली रूप में देखकर देवकी ने शीघ्रतापूर्वक वसुदेव को बुलाया। उन वसुदेव ने वहाँ आकर यह सब देखा और बालक ने जन्म लिया – ऐसा सुनकर वे अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए और फिर वचन बोले – ।।80-81।।

वसुदेव जी बोले – मेरे सैकड़ों जन्मों की अनेक तपस्याओं तथा भाग्य के फलस्वरूप आपने माया बालक का रूप धारण करके यदि मेरे घर में जन्म लिया ही है और जिस प्रकार आपने मेरे ऊपर कृपा करके अपने इस परम दुर्लभ कालिका रूप को दिखाकर मेरे जन्म को सफल किया है, उसी प्रकार उगते हुए करोड़ों चंद्रमाओं की आभा के समान अपने दस भुजाओं वाले सौम्य तथा सुंदर दूसरे रूप का दर्शन भी मुझे करा दीजिए ।।82-84।।

श्रीमहादेव जी बोले – तब उनका यह वचन सुनते ही उस रूप का त्याग कर के भगवती एकाएक सौम्य तथा दस भुजाओं से युक्त रूपवाली हो गईं। उस रूप को देखकर आनकदुंदुभि वसुदेव जी को अत्यंत विस्मय हुआ और वे हाथ जोड़कर महान भक्ति से उनकी स्तुति करने लगे – । । 85-86 । ।

वसुदेव जी बोले – आप जगत की माता हैं, अनादि हैं, पराविद्या हैं और अति सूक्ष्म स्वरूपिणी हैं। उसी तरह आप संसार के पिता भी हैं। आप पूर्ण चिन्मयस्वरूप साक्षात अनादि पुरुष हैं। आप विश्वरूप हैं, समस्त स्त्रियों के रूप में आप ही प्रतिष्ठित हैं, आप विश्व का आश्रय हैं, आप विश्वव्यापिनी हैं और आपसे अतिरिक्त अन्य कोई भी इस त्रिभुवन में नहीं हैं। विश्वेशि! आपको नमस्कार है ।।87।।    

सृष्टिकार्य में आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा के रूप में हो जाती हैं, पालन में आप ही परमात्मा प्रभु विष्णु हो जाती हैं और संहार कार्य में आप ही अत्यंत भयानक रूप तथा चरित्र वाले पिनाकास्त्रधारी रुद्र के रूप में हो जाती हैं। उनके सृजन, पालन तथा संहार कार्य में ब्रह्ममयी, परा तथा नित्यस्वरूपिणी एकमात्र आप कालिका ही हेतु हैं। जगद्वंदीते ! परमे ! कृष्णे ! अप मुझ पर प्रसन्न हों ।।88।।  

आप सूक्ष्मा प्रकृति हैं, आप निराकार होते हुए भी मेरे पुत्र रूप में प्रकट हुई हैं, आप जगत में व्याप्त है, आप में सदा स्त्रीत्वादिका का अभाव रहने पर भी आप स्त्री-पुरुष-नपुंसक भेद से संसार में व्याप्त हैं। इस संसार में कोई भी आपका वास्तविक रहस्य नहीं जान सकता तथा परमेष्ठि भगवान ब्रह्मा भी इससे मोहित बुद्धिवाले हो जाते हैं, फिर अंबिके ! मैं आपकी स्तुति करने में भला किस प्रकार समर्थ हो सकता हूँ ।।89।।

देवताओं के द्वारा वंदनीय भगवती ! विश्व को मोहित कर देने वाली आप गौरी को नमस्कार है। मायापुरुषरूपिणी ! कृष्ण का रूप धारण करने वाली आप भगवती को नमस्कार है ।।90।।

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार उनके स्तुति करने पर दस भुजाओं वाली वे भगवती तत्काल कमल के समान नेत्रों वाले बालक रूप श्रीकृष्ण के रूप में प्रत्यक्ष हो गयी। मुनिश्रेष्ठ ! वनमाला से सुशोभित उस बालकरूप श्रीकृष्ण को देखकर वसुदेव जी हाथ जोड़कर पुनः कहने लगे – ।।91-92।।

वसुदेव जी बोले – वत्स ! महान बलशाली तथा उग्र कंस मेरे सभी पुत्रों को पैदा होते ही शिला के अग्रभाग पर पटक कर मार डालता है। अतः अब जब तक उस कंस के सेवक तथा रक्षक जाग नहीं जाते हैं, तब तक देव ! जगतपते ! आपके लिए मुझे जो इस समय करना चाहिए, वह सब आप मुझे बताया दीजिए; क्योंकि पृथ्वी का भार मिटाने के लिए ही आप उत्पन्न हुए हैं ।।93-95।।

श्रीमहादेव जी बोले – उनका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण रूप में विद्यमान भगवती काली ने यशोदा तथा नन्द की पूर्व तपस्या का समरण कर उनसे यह कहा – ।।96।।

श्रीकृष्ण बोले – वात ! महामते ! अत्यंत सतर्क दृष्टि रखने वाले मामा कंस के भय से बचने के लिए इस समय आपको जो करना है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।।97।।

आज ही अष्टमी तिथि के व्यतीत होने पर गोकुल में यशोदा के गर्भ से मेरी एक दूसरी कन्यामूर्ति प्रादुर्भूत हुई है। मेरी माया से मोहित होने के कारण निद्रा में निमग्न यशोदा को उन कमल सदृश नेत्रोंवाली सर्वांगसुन्दरी गौरी के विषय में जानकारी नहीं है। आप शीघ्रतापूर्वक [वहाँ जाइये और] मुझे वहाँ रखकर तथा उस कन्या को यहाँ लाकर यह बात प्रचारित कर दीजिए की मेरी एक सुंदर कन्या उत्पन्न हुई है ।।98-100।।  

तत्पश्चात उस कन्या को मारने के लिए जब मेरा मामा वह दुष्ट कंस कुपित होकर शिला पर पटकने के लिए मुझे ऊपर उठाएगा, तब पिताजी, देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिए उस कंस का वध करने वाले मेरे विषय में बताकर वह कन्या उसके देखते-देखते आकाश में चली जाएगी। तत्पश्चात कुछ समय तक गोकुल में रहने के बाद यहाँ आकर मैं दुष्टात्मा मामा कंस का वध करूंगा ।।101103।।  

श्रीमहादेव जी बोले – महामुने ! उस बालक की यह बात सुनकर वसुदेव जी उसे लेकर गोकुल की ओर चल पड़े ।।104।। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय वासुदेव श्रीकृष्ण की अपरंपार माया से मोहित हो जाने के कारण कोई भी व्यक्ति जाग नहीं सका ।।105।।

अपने पुर से निकलकर वसुदेव जी ने अपने तेज से देदीप्यमान पुत्र को बार-बार देखकर अत्यंत दु:खी होकर इस प्रकार कहते हुए बहुत रुदन किया – हा वत्स ! तुम मुझ पापी के घर में किसलिए पैदा हो गए हो, अब तुम्हें गोकुल में बिना रक्षित किए फिर घर कैसे लौट आऊँ ।।106-107।।   

इस प्रकार अनेक प्रकार से रोते-कलपते और अपने आंसुओं से उस बालक को सींचते हुए वसुदेव जी ने श्रीकृष्णा की कृपा से यमुना नदी को पार कर बालक रूप भगवती के साथ नन्द जी के भवन में आज्ञातरूप से प्रवेश किया और वहाँ पर सुंदर-सी कन्या को जन्म देने वाली यशोदा को देखा। इस समय वे यशोदा जी सोयी हुई थी, उन्हें अपने उदर से उत्पन्न कन्या की जानकारी नहीं थी और उनके साथ उनकी सखियाँ भी इधर-उधर सोयी पड़ी थीं। तत्पश्चात वसुदेव जी श्रीकृष्णा को वहीं पर रखकर और उस कन्या को लेकर तत्काल घर से निकल गए ।।108-111।।

मुने ! उस समय दस भुजाओं से युक्त तथा मनोरम तेज से प्रदीप्त वे भगवती वसुदेव की गोद में अत्यंत सुशोभित हो रही थी। समस्त लोकों की एकमात्र जननी तथा ब्रह्मस्वरूपिणी उन देवी को देखकर आनन्द से परिपूर्ण मनवाले वसुदेव जी मथुरापुरी पहुँच गए और घर में प्रवेश करके देवकी को वह कन्या समर्पित कर दी। इसके बाद उन महामति वसुदेव जी ने रक्षकों को बताया की कन्या ने जन्म लिया है ।।112-114।।  तदनंतर उन रक्षकों ने भी घोर दुष्टात्मा उस कंस से तत्काल जाकर कहा – राजन ! देवकी के आठवें गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई है ।।115।। 

महामुने ! इसे सुनकर उस पापात्मा कंस ने उन रक्षकों से कहा – उसे यहाँ शीघ्र लाओ; मैं बिना कुछ सोच-विचार के उसका वध कर दूंगा। उसकी बात सुनकर रक्षकों ने वह कन्या लाकर उस नीच बुद्धि कंस को दे दी। उस कन्या को अत्यंत सुदृढ़ देखकर मानो वह पत्थरों से बनी हुई हो, वह पापात्मा कंस नहीं जान सका कि यह कन्या सृजन, पालन तथा संहार करने वाली परमेश्वरी भगवती देवी ही हैं और उसे मारने की इच्छा से उसने अपने बाएं हाथ की मुट्ठी से कसकर पकड़ लिया। उस समय कठोर विग्रहवाली उस कन्या को शिला से निर्मित मानकर उसने उस कन्या को पत्थर पर पटकने की इच्छा से ऊपर उछाला। तत्पश्चात आकाश में स्थित होकर सिंह के पृष्ठ पर आरूढ़ और महान तेज से जाज्वल्यमान भगवती देवी ने उस पाप बुद्धि कंस से कहा – ।।116-120½।। 

श्रीमहादेवी जी बोली – दुरात्मन ! तुम्हारे विनाश के लिए मैं ही अपने अंश से माया के प्रभाव से वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ से पुरुष रूप में उत्पन्न होकर गोकुल में नंदगोप के घर में विराजमान हूँ ।।121-122।।  

श्रीमहादेव जी बोले – ऐसा कहकर सिंह पर विराजमान वे भगवती देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए उस नीच बुद्धि कंस के देखते-देखते अंतरिक्ष में चली गयी ।।123।।

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीकृष्णप्रादुर्भावोपाख्यान’   

नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।