महाभागवत – देवी पुराण – उंचासवाँ अध्याय 

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श्रीनारदजी बोले – अनेक तत्वज्ञानी लोग कहते हैं कि जो परात्पर विद्यास्वरूपिणी काली हैं, उन्होंने ही स्वयं पृथ्वी पर श्रीकृष्ण रूप में अवतार ग्रहण किया। कंस आदि दुष्टों का संहार करके पृथ्वी का भार दूर करने के लिए उन्होंने ही अपनी लीला से वसुदेव के घर में देवी देवकी के गर्भ से जगदीश्वर के रूप में जन्म लिया। प्रभो ! भगवती महेश्वरी पृथ्वीलोक में पुरुषरूप में ही क्यूँ अवतीर्ण हुई, वह प्रसंग मैं सुनना चाहता हूँ, आप मुझे बताइए ।।1-3।। 

श्रीमहादेवजी बोले – वत्स ! सुनिए, अब मैं आपसे परम गोपनीय तथा सत्य प्रसंग का वर्णन कर रहा हूँ। उन भगवती ने दुष्टों से पृथ्वी का भार समाप्त करने के लिए द्वापर के अंत में शम्भु की इच्छा के अनुसार माया पुरुष का रूप धारण कर वसुदेव से देवकी के गर्भ से पृथ्वीलोक में अवतार लिया था।।4-5।। 

श्रीनारद जी बोले – महेशान ! जिस प्रकार से शम्भु की इच्छा हुई और जिस प्रकार से स्वयं उन भगवती काली ने वसुदेव के घर में देवकी के गर्भ से श्रीकृष्णरूप से पृथ्वी पर अवतार लिया, यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बताइए। जगन्नाथ ! आप दयालु तथा सर्वज्ञ हैं।।6-7।। 

श्रीमहादेव जी बोले – वत्स ! मुनिश्रेष्ठ ! जिस तरह से महेश्वर की इच्छा हुई और जिस तरह से उन भगवती काली ने द्वापर के अंत में पृथ्वीलोक में जन्म ग्रहण किया, नारद ! आप परम भक्तिमान हैं। अतः वह सब प्रसंग मैं आपको सम्पूर्ण रूप से बतला रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनिए।।8-9।। 

एक समय की बात है, परम कौतुकी भगवान शिव कैलास शिखर पर सुरम्य मंदिर में एकांत में पार्वती के साथ विहार कर रहे थे। वहाँ पर पार्वती जी के सुंदर रूप को देखकर भगवान शम्भु मन ही मन सोचने लगे कि नारी जन्म तो अत्यंत ही शोभन है। उसी समय अपने हाथ से पार्वती के मुख कमल का स्पर्श करते हुए तथा उन सर्वांग सुंदरी भगवती को अपने मधुर वचनों से प्रसन्नता प्रदान करते हुए शिवजी उनसे कहने लगे – ।।10-12।।  

श्रीशिवजी बोले – परमेशानि ! आपकी कृपा से मेरे सभी मनोरथ परिपूर्ण हो चुके हैं और कुछ भी अवशिष्ट नहीं रह गया है। तथापि शर्वआणि ! मेरी एक दूसरी इच्छा हुई है। शिवे ! यदि मुझ पर आपका अनुग्रह हो तो उसे पूर्ण कर दीजिए।।13-14।। 

श्रीदेवी जी बोली – शम्भो ! आपकी दूसरी कौन सी अभिलाषा है; उसे बताइए। प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी।।15।। 

श्रीशिवजी बोले – यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो पृथ्वी तल पर कहीं भी पुरुष रूप से अवतीर्ण होइए और मैं स्त्री रूप से अवतीर्ण होऊँगा। इस समय मैं जिस प्रकार से आपका प्रिय पति हूँ तथा आप मेरी प्राणप्रिया पत्नी हैं, उसी प्रकार का दाम्पत्य प्रेम उस समय में भी हो। भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाली देवि ! यही मेरे मन की अभिलाषा है; मेरी इस उत्तम याचना को आप परिपूर्ण कर दीजिए।।16-17½।। 

श्रीदेवीजी बोली – महादेव ! प्रभो ! आपकी प्रसन्नता के लिए मैं पृथ्वी तल पर वसुदेव के घर में पुरुषरूप में श्रीकृष्ण होकर अवश्य ही जन्म लूँगी और त्रिलोचन ! मेरी प्रसन्नता के लिए आप भी स्त्री रूप में जन्म लीजिए ।।18-19।। 

श्रीशिवजी बोले – जगत का पालन करने वाली शिवे ! आपके पुरुष रूप से श्रीकृष्ण के रूप में प्राप्त होने पर स्वयं मैं आपकी प्राण सदृश वृषभानु पुत्री राधा रूप में होकर आपके साथ विहार करूंगा। साथ ही मेरी आठ मूर्तियाँ भी सुंदर नेत्रों वाली रुक्मिणी, सत्यभामा आदि पटरानियों के रूप में मृत्युलोक में अवतरित होगी।।20-21½।। 

श्रीदेवी जी बोली – आपकी इन मूर्तियों के साथ मैं यथोचित विहार करूँगी, जैसा न तो किसी ने किया है और न तो कहीं सुना ही गया है। महादेव ! वह अद्भुत उपाख्यान प्राणियों के पापों का नाश करने वाला तथा महान पुण्य प्रदान करने वाला होगा। प्रभो ! विजया और जया नामक मेरी दोनों सखियाँ उस समय श्रीदाम और वसुदाम नाम से पुरुष रूप में प्रतिष्ठित होगी। महेश्वर ! पूर्वकाल में विष्णु जी के साथ मेरी प्रतिज्ञा हुई है, उसके अनुसार वे उस समय (जब मैं श्रीकृष्ण होऊँगी) मेरे बड़े भाई होंगे। सर्वदा मेरा प्रिय करने वाले, महान बलशाली तथा आयुध के रूप में हल धारण करने वाले वे “बलराम” नाम से प्रसिद्ध होंगे। इस प्रकार मैं पृथ्वी पर प्रादुर्भूत होऊँगी और देवताओं के कार्य सम्पन्न करूँगी तथा अंत में महान कीर्ति स्थापित करके भूतल से वापिस चली जाऊँगी ।।22-27।। 

श्री महादेव जी बोले – इस प्रकार प्रेम भावना से युक्त होकर भगवती ने शम्भु से प्रतिज्ञा की थी। उसी कारण वे नवीन मेघ की आभा से युक्त श्याम वर्ण वाले श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुई। मुनिश्रेष्ठ ! शरवाणी के श्रीकृष्णावतार धारण करने का यही मुख्य कारण कहा गया है। अब आप अन्य प्रसंग भी सुनिए ।।28-29।।

मुनिश्रेष्ठ ! पूर्वकाल में भगवती और विष्णु जी ने युद्ध में जिन राक्षसों का संहार किया था, द्वापर के अंत में वे ही  बहुत से राजाओं के रूप में उत्पन्न हुए। उनमें कंस तथा दुर्योधन आदि बड़े ही दुरदाँत थे। उसी प्रकार और भी महान क्षत्रिय नरेश अनेक देशों में उत्पन्न हुए। उनके भार को सहन न कर सकने के कारण गाय का रूप धारण कर पृथ्वी समस्त देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास गयी। दु:ख से संतप्त उन गोरूपधारिणी पृथ्वी को देखकर ब्रह्माजी ने कहा – माता ! आप मेरे पास किसलिए आई हैं? ।।30-33।।  

पृथ्वी बोलीं – ब्रह्मन ! पूर्वकाल में जो-जो महान राक्षस युद्ध में मारे गए थे, वे ही इस समय दुष्ट चित्त वाले राजा बने हुए हैं। उनका भार वहन करने में असमर्थ होकर मैं आपके पास आई हूँ। अतः कमलासन ! उनकी मृत्यु का कोई उपाय कीजिए।।34-35।।    

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! पृथ्वी का यह वचन सुनकर ब्रह्मा जी उन्हें आश्वासन प्रदान कर देवताओं के साथ कैलास पर्वत पर पहुंचे। वहाँ पर जगत का पालन करने वाली भगवती को देखकर ब्रह्मा जी ने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें बार-बार प्रणाम किया और यह वचन कहा – ।।36-37।। 

ब्रह्माजी बोले – माता ! आपने और विष्णु जी ने जिन-जिन दैत्यों, दानवों और राक्षसों का संहार किया था, वे सब इस समय बड़े-बड़े क्षत्रिय राजा हो गए हैं। उन दुराचारी राजाओं से पृथ्वी व्याप्त है और उनका भार सहन नहीं कर पा रही हैं, अतः आप उनकी मृत्यु का उपाय सोचिए। माता ! आप माया विग्रह धारण कर छल के द्वारा उन राजाओं का वध कीजिए; क्योंकि अंबिके ! आप उनकी मृत्यु स्वरूपिणी हैं ।।38-40।। 

श्रीदेवी जी बोली – मैं स्त्री स्वरूप में रहते हुए युद्धक्षेत्र में उन महान क्षत्रियों के साथ नहीं लड़ूँगी; क्योंकि उन्होंने भक्तिपूर्वक मेरे स्त्री रूप का ही आश्रय ग्रहण किया है, किन्तु ब्रह्मन ! नवीन मेघ की आभा वाली जो मेरी भद्रकाली मूर्ति है, वह वसुदेव के घर में पुरुष रूप से जन्म लेगी ।।41-42।। देवकी के गर्भ से दो भुजाओं वाला सौम्य रूप धारण करके वनमाला से सुशोभित, श्रीवत्सचिन्ह को धारण किए हुए अत्यंत सुंदर मुख कमल वाले सर्वांग सुंदर ‘श्याम’ अवतार लेंगे। वे अपने स्वरूप को छिपाने के लिए भगवान विष्णु के लक्षणों से युक्त होकर शंख, चक्र सुशोभित होंगे। महती माया से युक्त तथा दुष्ट क्षत्रियों का नाश करनेवाले वे कंस आदि विविध पराक्रमी क्षत्रियों का संहार करेंगे।।43-45।। 

भगवान विष्णु भी अपने अंश से उत्पन्न होकर प्रचंड पराक्रम वाले महाबली पांडुपुत्र अर्जुन के रूप में प्रसिद्ध होंगे। साक्षात धर्मराज उनके बड़े भाई के रूप में युधिष्ठिर नाम से उत्पन्न होंगे और महान बल तथा पराक्रम से सम्पन्न पवन देव अपने अंश से उनके दूसरे महाबली भाई भीमसेन के रूप में प्रादुर्भूत होंगे। महान वीर अश्विनी कुमारों के अंश से प्रचंड पराक्रमी तथा अपराजेय माद्री पुत्र नकुल और सहदेव नामक उनके दो भाई उत्पन्न होंगे। सत्य पराक्रम वाले वे समस्त पांडव धर्म परायण वाले होंगे ।।46-49।। 

सभी के लिए कंटकतुल्य, दुर्बुद्धि तथा क्रूर दुर्योधन नामक राजा मेरे अंश से उत्पन्न कृष्णा (द्रौपदी) का अपमान करेगा। साथ ही वह दुर्जय तथा पापात्मा दुर्योधन महात्मा पांडवों के लिए अज्ञात-वनवास आदि कष्टकारक एवं सभी प्राणियों के लिए दु:खदायक कर्म करेगा।।50-51½।। तत्पश्चात मैं पांडुपुत्रों की विशेष सहायता करके और महान युद्ध संबंधी तैयारी करके युद्ध के लिए उत्सुक होऊँगी तथा संग्राम करने का इच्छुक वह दुर्गति दुर्योधन भी स्वयं कर्ण एवं शकुनि के परामर्श के वशीभूत होकर युद्ध के लिए अत्यधिक प्रयत्न करेगा। भरतवंशी उन दोनों वीरों (युधिष्ठिर, दुर्योधन) – की सहायता करने के लिए अनेक देशों में निवास करने वाले सभी राजागण वहाँ युद्ध क्षेत्र में आएंगे।।52-54½।।   

मैं युद्ध में महान माया फैलाकर समरक्षेत्र में सम्मुख उपस्थित होकर परस्पर मारने की इच्छा वाले उन वीरों का संहार कर दूँगी। मेरी ही माया से मोहित होकर दुष्ट बुद्धि वाले सभी राजा युद्ध में शस्त्रास्त्रों के प्रहार से एक-दूसरे को मार डालेंगे। कुरुक्षेत्र में अत्यंत भीषण संग्राम होने के उपरांत यह पृथ्वी बालकों तथा वृद्धों को छोड़कर श्रेष्ठ राजाओं से विहीन हो जाएगी। उस समय मेरी भक्ति में संलग्न रहने वाले महान भाग्यशाली, पुण्यात्मा तथा धर्मनिष्ठ पांडुपुत्र पांचों भाई बच जाएंगे।।55-58½।।

कौरवों तथा पांडवों के इस प्रकार के युद्ध में मैं दुष्ट विचार वाले सभी पापी राजाओं को प्रायः विनष्ट कर डालूँगी। कमलासन ! प्रचंड तेज वाले अन्य विशिष्ट क्षत्रियों को भी मैं उस संग्राम में मायापूर्वक मार डालूँगी। वहाँ स्थित रहकर पृथ्वीतल पर महान कीर्ति स्थापित करूँगी। बहुसंख्य यादव-संतति उत्पन्न कर और छलपूर्वक उनका संहार करके पृथ्वी को भार मुक्त कर पुनः यहाँ लौट आऊँगी।।59-62।। 

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार उस भगवती के कहने पर लोकपितामह ब्रह्मा जी महादेवी को साष्टांग प्रणाम करके शीघ्रतापूर्वक वैकुंठ के लिए चल दिए। वहां पर पद्मयोनि ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर पांडु पत्नी के गर्भ से मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिए विष्णु भगवान से प्रार्थना की। उसे सुनकर भगवान विष्णु ने कहा कि मैं इंद्रदेव के द्वारा कुंती के गर्भ से मानवरूप धारण कर पृथ्वीतल पर अवतीर्ण होऊँगा।।66-68।।       

मुनिश्रेष्ठ ! वह वचन सुनकर भगवान ब्रह्मा के मन में अपार हर्ष उत्पन्न हुआ और वे जगतपति विष्णु को साष्टांग प्रणाम करके अपने लोक को चले गए।।69।।         

।। इस प्रकार श्री महा भागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘ब्रह्मा-भगवतीका कथोपकथन’ नामक ऊंचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।