पाप-प्रशमन स्तोत्र का महत्व

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कई बार जाने-अनजाने मनुष्य से पाप हो जाता है अथवा होता रहता है. भूलवश अथवा जानकर किए गए पाप से मुक्ति के लिए पाप-प्रशमन स्तोत्र का पाठ किया जाता है. इस स्तोत्र का पाठ करने अथवा सुनने मात्र से मनुष्य के संचित पापों का निवारण हो जाता है. जब कभी भी व्यक्ति का मन परायी स्त्री अथवा पराये धन आदि की ओर ललचा जाए तब प्रायश्चित के रुप में इस स्तोत्र का पाठ कर प्रभु की शरण लेनी चाहिए. इस पाठ में भगवान विष्णु की आराधना की गई है और किए गए पापों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है.

वैसे तो इस स्तोत्र का पाठ कभी भी किया जा सकता है लेकिन वैसाख माह में इस स्तोत्र के पाठ का विशेष महत्व माना गया है. इसलिए वैशाख माह में प्रतिदिन नियमित रुप से इसका पाठ करना चाहिए.

 

पाप-प्रशमन स्तोत्र – Paap Prashaman Stotra

विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नम:। नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतं हरिम्।।

चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्। विष्णुमीड्यमशेषाणामनादिनिधनं हरिम्।।

विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्। योsहंकारगतो विष्णुर्यो विष्णुर्मयि संस्थित:।।

करोति कर्तृभूतोsसौ स्थावरस्य चरस्य च। तत्पापं नाशमायाति तस्मिन् विष्णौ विचिन्तिते।।

ध्यातो हरति य: पापं स्वप्ने दृष्टश्च पापिनाम्। तमुपेन्द्रमहं विष्णुं नमामि प्रणतप्रियम्।।

जगत्यस्मिन्निरालम्बे ह्यजमक्षरमव्ययम्। हस्तावलम्बनं स्तोत्रं विष्णुं वन्दे सनातनम्।।

सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज। हृ्षीकेश हृ्षीकेश हृ्षीकेश नमोsस्तु ते।।

नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव। दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाशु जनार्दन।।

यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना। आकर्णय महाबाहो तच्छमं नय केशव।।

ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण। जगन्नाथ जगद्धात: पापं शमय मेsच्युत।।

यच्चापराह्णे सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।

जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव। नामत्रयोच्चारणत:सर्वं यातु मम क्षयम्।।

शारीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष मानसम्। पापं प्रशममायातु वाक्कृतं मम माधव।।

यद् भुज्जान: पिबंस्तिष्ठन् स्वपण्जाग्रद् यदा स्थित:। अकार्षं पापमर्थार्थं कायेन मनसा गिरा।।

महदल्पं च यत्पापं दुर्योनिनरकावहम्। तत्सर्वं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ।।

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्। अस्मिन् संकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।

यत्प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शविवर्जितम्। सूरयस्तत्पदं विष्णोस्तत्सर्वं मे भवत्वलम्।।

 

पापप्रशमनं स्तोत्रं य: पठेच्छृृणुयान्नर:। शारीरैर्मानसैर्वाचा कृतै: पापै: प्रमुच्यते।।

मुक्त: पापग्रहादिभ्यो याति विष्णो:परं पदम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रं  सर्वाघनाशनम्।।

प्रायश्चित्तमघौघानां पठितव्यं नरोत्तमै:

 

उपरोक्त अंतिम श्लोक की पंक्तियों का अर्थ है – यह “पाप-प्रशमन” नामक स्तोत्र है. जो मनुष्य इसे पढ़ता और सुनता है वह शरीर, मन और वाणी द्वारा किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं वह पाप ग्रह आदि के भय से भी मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है. यह स्तोत्र सब पापों का नाश करने वाला तथा पाप राशि का प्रायश्चित है. इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न कर के इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए.

इस स्तोत्र के केवल श्रवण(सुनने) मात्र से पूर्व जन्म तथा इस जन्म के किए हुए पाप भी तत्काल नष्ट हो जाते हैं. यह स्तोत्र पापरुपी वृक्ष के लिए कुठार और पापमय ईंधन के लिए दावानल है. पापराशि रुपी अंधकार समूह का नाश करने के लिए यह स्तोत्र सूर्य के समान है.

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