महाभागवत – देवी पुराण – बावनवाँ अध्याय 

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श्रीनारद जी बोले – देवकी के गर्भ से बालकरूप में प्रादुर्भूत होकर साक्षात भगवती गोकुल में नंदगोप के घर में किस कारण से निवास करती थीं? पूर्व जन्म में ये नन्द जी कौन थे और इनकी पत्नी यशोदा जी कौन थीं? इन्होंने पूर्वकाल में ऐसा कौन सा तप किया था, जिससे श्यामसुंदर-रूपवाली महेश्वरी काली को बालक रूप से प्राप्त किया? यशोदा के गर्भ से अपने अंश से उत्पन्न ये देवी भगवती दुर्गा पैदा होते ही क्यों चली गईं? उन्हें न तो माता यशोदा ने देखा और न तो पिता नन्द ने जाना। प्रभो ! वे जिस तरह से उत्पन्न हुईं और उन्होंने जैसी लीला की; इन सबके पीछे क्या कारण है? पार्वतीनाथ ! जगतपते ! यह सब मुझे बताइए ।।1-5।। 

श्रीमहादेव जी बोले – वत्स ! महामते ! आपने जो पूछा है,  वह सब मैं आपको यथावत कहूँगा, मुनिश्रेष्ठ ! आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ।।6।। पूर्वकाल में दक्ष प्रजापति ने सती के विरह से दु:खी होकर उन्हें पराप्रकृति जानकर मन में ऐसा सोचा कि मैंने उग्र तप से जिन आद्या पराशक्ति को कन्या रूप में प्राप्त किया था, उन्हें अपने अविवेक के कारण न जानते हुए तथा शिवनिन्दा करने के कारण मैं उनसे वंचित हो गया। मैं तपस्या करके पुनः वैसा प्रयत्न करूंगा, जिससे वे भगवती पुनः मेरे यहाँ आविर्भूत हों ।।7-9।। मन में ऐसा निश्चय करके दक्ष प्रजापति ने हिमालय के उत्तम शिखर पर जाकर एक सौ दिव्य वर्षों तक भगवती की आराधना की। मुनिश्रेष्ठ ! उनकी पत्नी प्रसूति ने भी दीर्घकाल तक उसी प्रकार भक्तिपूर्वक परमेश्वरी से प्रार्थना की। उन दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती परमेश्वरी प्रसन्न हो गयी और बोली – ‘तुम दोनों का जो अभीष्ट हो, उसे माँग लो’।।10-11½।। तब प्रजापति दक्ष ने कहा – माता ! शिवे ! आप कृपापूर्वक मेरे यहाँ फिर से जन्म लीजिए। महेश्वरी ! मेरी आपसे यही प्रार्थना है। प्रसूति ने कहा – माता ! शिवे ! मैं वात्सल्य स्नेह से युक्त होकर आपका पालन करूँ। इसी अभीष्ट के लिए यही मेरी प्रार्थना है ।।12-13½।। 

देवी जी बोली – प्रजापते ! मैं द्वापर के अंत में पृथ्वी तल पर आपसे जन्म लेकर आपकी कन्या होऊँगी; इसमें संदेह नहीं है, किन्तु भगवान शिव के प्रति पूर्व में आपके द्वारा किए गए अत्यंत निन्दापरक कृत्य का स्मरण कर कन्या स्वरूपिणी मैं आपके घर में नहीं रहूँगी। मेरे जन्म की घटना को न जानने वाले मेरे पितारूप आपके घर से मैं देवताओं का कार्य सिद्ध करने के बहाने शीघ्र ही स्वर्ग चली जाऊँगी। माता प्रसूति ! आपने मुझसे यह जो प्रार्थना की है, वह भी निश्चित रूप से पूर्ण होगी; इसमें संशय नहीं है। मैंने प्रजापति कश्यप और अदिति को भी वर प्रदान किया था की मैं द्वापर के अंत में आप दोनों के घर में स्वयं पुत्र रूप में जन्म लूँगी। उस समय मैं आपके उस तपस्या का फल प्रदान करने के लिए कुछ दिन लीलापूर्वक आपके घर में निवास करूंगी ।।14-19½।।       

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर सृष्टि, पालन और संहार करने वाली वे भगवती उन दोनों के देखते-देखते अचानक अन्तर्धान हो गयीं। वे ही दक्ष नन्द हुए और उनकी पत्नी भी यशोदा हुई। इसी कारण से यशोदा के गर्भ से उत्पन्न वे देवी भगवती जन्म लेते ही अंतरिक्ष में चली गईं। महामुने ! साथ ही देवकी के गर्भ से उत्पन्न होकर भी श्याम-सुंदर रूप वाली उन भगवती ने कुछ समय तक सुरम्य गोकुल में निवास किया था।।20-23।।   

।।इस प्रकार श्री महा भागवत महा पुराण के अंतर्गत ‘दक्षप्रसूतिनन्दयशोदाजन्मवर्णन’ नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।। 

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महाभागवत – देवी पुराण – तरेपनवाँ अध्याय