
श्रीराम जी बोले – त्रिलोकवंदनिया ! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनी ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें। सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करने वाली भगवती ! संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। आप ही सभी प्राणियों में निवास करने वाली पराशक्ति हैं, संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। युद्ध प्रिये ! शरणागत की पीड़ा हरने वाली ! [जगदम्बा ! ] युद्ध में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है ।।1-4।।
हाथ में खटवाङ तथा खड्ग धारण करने वाली एवं मुंडमाला से सुशोभित विग्रह वाली भगवती ! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुख हरण कीजिए। शरणागतप्रिये ! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिए, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है, पुनः नमस्कार है। आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिचित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिंतन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिंत्य है। मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करने वाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दु::खी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है।।5-8।।
युद्ध में महिषासुर का मर्दन करने वाली तथा शरण ग्रहण करने योग्य हिमालयसुता ! आप मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। चंडासुर का नाश करने वाली प्रसन्नमुखी चंडिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। रक्तवर्ण की नेत्र वाली, रक्तरंजित दंतपंक्तिवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करने वाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। निशुंभ तथा शुंभ का संहार करनेवाली, जगत की सृष्टि करने वाली सुरेश्वरी ! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। । 9-12 । ।
भवानी ! आप सर्वदा इस जगत का पालन करती हैं। माता ! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिए। दुष्टों का संहार करने वाली भगवती ! आप सबमें विद्यमान रहने वाली शक्ति स्वरूपा हैं। जगन्माता ! प्रसन्न होइए, मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक पालन करने वाली भगवती ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिए और मुझे विजय प्रदान कीजिए, आपको नमस्कार है। शरणागतों का दु:ख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करने वाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिए और भय से सदा रक्षा कीजिए।।13-16।।
श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार उन महात्मा श्रीराम के द्वारा भगवती की स्तुति किए जाने पर सहसा आकाशवाणी हुई – ।।17।। रघुश्रेष्ठ ! आप भय मत कीजिए। शीघ्र ही आप महाबलशाली और पराक्रमी राक्षसों को मारकर लंका को जीतेंगे। शत्रुसूदन ! सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने बिल्ववृक्ष की छाया में मेरी पूजा की है, अतः मैं आपको अभीष्ट वर प्रदान करूँगी।।18-19।। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर रघुश्रेष्ठ श्रीराम अपनी विजय को सुनिश्चित समझने लगे ।।20।। इस प्रकार भगवान श्रीराम के सोचते-ही-सोचते कुछ ही समय में राक्षसों के साथ महाबलशाली कुंभकर्ण युद्धभूमि में आ गया। उसकी घोर गर्जना से वन और पर्वत सहित सम्पूर्ण पृथ्वी कांपने लगी तथा समुद्र विक्षुब्ध हो उठा। उन राक्षसों के रथ, घोड़ों और हाथियों की घोर गर्जना तथा वायुवेगशाली योद्धाओं के बलप्रयोग से उठी हुई वायु से पृथ्वी कांप उठी। हाथ में अस्त्र लिए हुए उस महाबली दुर्धर्ष कुंभकर्ण को देखकर सभी वानर भय से व्याकुल हो उठे दिशा-विदिशाओं में स्थित हो गए।।21-24।।
तदनंतर श्रीराम ने भयदायक उस राक्षस को आते हुए देखकर देवी को प्रणाम कर बाएं हाथ में धनुष ले लिया ।।25।। वह राक्षस भी पैर तथा हाथ के प्रहार से वानरों का मर्दन करके और अन्य वानरों का भक्षण करते हुए श्रीराम के सामने आ गया। वह बलवान राक्षस भी दूर्वादल के समान आभावाले, श्यामवर्ण वाले, राक्षसों का नाश करने वाले, महान भुजावाले, हाथ में अस्त्र लिए हुए तथा नीलकमल दल के समान नेत्रवाले, क्षोभरहित, अनुजसहित रघुश्रेष्ठ को युद्ध क्षेत्र में देखकर युगांतकारी बादल की तरह गर्जना करने लगा ।।26-28।। मुनिश्रेष्ठ ! रघुश्रेष्ठ श्रीराम भी प्रसन्न होकर ब्रह्मांड को क्षुब्ध करने वाली घोर गर्जना करने लगे, तदनंतर युद्ध आरंभ हो गया ।।29।।
एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से छोड़े गए ब्रह्मास्त्रजालों से उन दोनों में महान युद्ध हुआ, जो देवताओं तथा राक्षसों के लिए अत्यंत दुर्लभ था। संग्राम में विजय की इच्छा रखने वाले महापराक्रमी वानरों का बलशाली राक्षस-सैनिकों के साथ घोर युद्ध हुआ ।।30-31।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीराम-कुंभकर्णयुद्धवर्णन’ नामक चवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
