महाभागवत – देवी पुराण – तैंतालीसवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! ब्रह्माजी के मुख से इस प्रकार की बात सुनकर प्रसन्नात्मा विमल बुद्धिवाले रघुश्रेष्ठ श्रीराम ने पुनः उनसे पूछा – ।।1।। 

श्रीराम जी बोले – महामते ! ब्रह्मन ! यह सत्य है कि वे ही देवी विजय प्रदान करने वाली हैं, इसलिए महायुद्ध में विजयी होने की इच्छा से मैं भक्तिपूर्वक उन्हीं की पूजा करूँगा। प्रभो ! अब आप बताएं कि वे देवी जयदुर्गा महेश्वरी इस समय कहाँ है और उनका रम्यरूप किस प्रकार का है ?।।2-3।। 

ब्रह्मा जी बोले – राजन ! सुनिए, यद्यपि आप स्वयं जानते हैं; फिर भी आपसे यह प्रसंग कहूँगा, क्योंकि सुनने तथा कहने वालों के लिए यह चरित्र पावन और पुण्यप्रद है।।4।। वे देवी सर्वत्र गमन करने वाली, सर्वत्र निवास करने वाली, समस्त शक्तिपीठों में रहने वाली, ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित तथा ब्रह्मांड से बाहर भी रहने वाली हैं। स्वर्ग, मृत्युलोक, हिमालय पर्वत तथा भगवान शंकर के समीप कैलास पर्वत पर जो भगवती की मूर्ति विराजमान हैं, वही पौराणिकी मानी गयी है। जो मूर्ति ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित है वह विशेष तांत्रिकी मूर्ति है; वे नित्यानंदमयी महादुर्गा अत्यंत गोपनीया हैं। उनका स्थान जिस प्रकार का है, उसे कहने में कौन समर्थ है? फिर भी राम ! मैं कुछ वर्णन करूंगा; आप ध्यानपूर्वक मेरी बातें सुनें ।।5-8।।

राघव ! पाताल, भूतल, स्वर्ग तथा ब्रह्मलोक ये सभी ब्रह्माण्ड में उत्तरोत्तर क्रम से ऊपर की ओर बहुत दूर तक स्थित है। ब्रह्माण्ड के बाहरी भाग में स्थित दिव्य ब्रह्मलोक से ऊपर की ओर एक लाख योजन की दूरी पर निर्विकार शिवलोक अवस्थित है, जहाँ अपने प्रमथगणों के साथ आदिपुरुष अनिर्वचनीय भगवान सदाशिव नित्य उत्सव में संलग्न होकर सदा प्रमुदित रहते हैं। जो भगवान शंकर के भक्त हैं, वे उस सुंदर शिवलोक को प्राप्त कर करुणानिधि देवाधिदेव भगवान शंकर की कृपा से आनंदित रहते हैं ।।9-12।। 

शिवलोक से एक लाख योजन ऊपर विष्णुलोक अवस्थित है, जहाँ शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। भगवान कमलापति का वह लोक भी अवर्णनीय है। वह दिव्य ज्योति से प्रकाशमान रहता है और नाना प्रकार के रत्नराशि से शोभायमान है। जो भगवान विष्णु की भक्ति में संलग्न हैं, वे भगवान विष्णु के प्रभाव से उनका सालोक्य प्राप्त करके देवता, गंधर्व तथा किन्नरों के साथ उस विष्णुलोक में नित्य परम आनंदित रहते हैं। वहाँ पक्षिराज गरुड़ भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं।।13-16।। 

शिवलोक के वामभाग में मनोरम गौरीलोक है, जो विचित्र मणि-माणिक्य के समूहों से अति शोभित है ।।17।। वहाँ जो भगवती जगदम्बा की वैदिकी मूर्ति है, वह दस भुजाओं से युक्त, अतसी (अलसी) के पुष्प के समान प्रभावाली और सिंह के पीठ पर आसीन है। वे देवी सोलह द्वारों से सुशोभित रम्य मंदिर में अवस्थित हैं। उस मंदिर के स्तम्भ विभिन्न रत्नों से जटित तथा वह मंदिर पताकाओं से सुशोभित है। स्तुति करते हुए देवता और मुनिन्द्रो से वह सदा सुशोभित रहता है तथा असंख्य सेविकावृंद और भैरव उसकी रक्षा करते हैं। सभी ब्रह्माण्डवासी ब्रह्मादि देवता तथा भगवान शंकर और विष्णु वहाँ आकर उन जगदंबिका की पूजा करते हैं ।।18-21।। 

सभी वैकुंठ लोकों से विशिष्ट, दिव्य ज्योति से सम्पन्न प्रभावाले गोलोक में जहाँ भगवान कृष्ण भगवती राधा के साथ विहार करते हैं, वह गोलोक श्रेष्ठ रत्नराशि से सुशोभित तथा कल्प वृक्षों से आच्छादित है और वह ब्रह्मर्षिगणों के द्वारा चारों ओर की गयी वेदपाठ की प्रतिध्वनियों से निनादित है। उस लोक में रत्न जटित स्तंभों से सुशोभित मंदिर में द्विभुज भगवान हरि स्वयं अपनी इच्छा से देवी राधा के साथ रमण करते हैं ।।22-24।। 

रघुश्रेष्ठ ! उससे पचास करोड़ योजन ऊपर महादेवी का दिव्य लोक है, जहाँ देवी जगदम्बा अत्यंत गुप्त रूप से विराजमान रहती हैं। भगवान श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी राधा जी जिनकी कला के करोडवें के करोडवें अंशवाली हैं, वे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रादि देवताओं के लिए भी दुर्लभ देवी स्वयं वहाँ विहार करती हैं ।।25-26।। वेद, आगम, स्मृतियों तथा वेदान्त आदि विविध दर्शनों में अनेक प्रमाणों से निश्चित जो एक परिपूर्ण ब्रह्मतत्त्व है, वही साक्षात नित्या भगवती हैं ।।27।। 

रघुपते ! वे नित्य अति सुखदायिनी, एकांतवासिनी तथा सभी देहों में नित्य विराजमान हैं। वे ही विश्व की आश्रयदात्री और पराशक्ति हैं। सभी जन विविध कठोर तपस्या से उनके चरण कमल की नख ज्योति का दर्शन करते हैं ।।28।। आश्चर्य है कि जिन जगदम्बा का समस्त योग साधनाओं के द्वारा निरंतर वंदन और ध्यान किया जाता है, उन्हें ही योगिजन निराकार ब्रह्म भी कहते हैं। उनके निजांश से उत्पन्न भगवान शिव और विष्णुतत्त्व की जो श्रुतियों में चर्चा है, उनका भी भगवती के अंश से उत्पन्न होना आश्चर्य का ही विषय है। रघुपते ! यह पारंपरिक व्यवस्था है साक्षात तत्त्व नहीं ।।29-30।।  

जिस प्रकार गंगा जी सागर में मिलकर सागर से अलग नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म के अंश से उत्पन्न वे ब्रह्मादि देव भी उस ब्रह्मा से अलग नहीं होते। वे ही जगदम्बा विश्व के रूप में प्रकट होती हैं, वे ही उसका पालन करती हैं और अंत में वे ही संहार करती है, इसमें दूसरा कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार काष्ठ के बने कृत्रिम हाथी आदि में हिलने-डुलने की प्रतीति ऐंद्रजालिक के प्राधान्य से होती है, उसी प्रकार इस जगत की समस्त चेष्टाओं में वे भगवती ही एकमात्र कारण हैं ।।31-33।। 

जो लोग महामोहरूपी घोर अंधकार में फँसकर सभी की मूल कारण स्वरूपा ब्रह्मादि देवताओं की भी देवता, अति दुर्गम ब्रह्म स्वरुपा देवी जगदम्बा को नहीं जानते हैं; रघुनन्दन ! वे लोग केवल ब्रह्मादि देवताओं को ही सृष्टि आदि में प्रधानरूप से कारण मानते हैं। जिस प्रकार मूढ़ व्यक्ति दोष के कारण घट के निर्माण में मूलभूत कारण उस कुम्हार को छोड़कर प्रधानरूप से उसके अन्य कारक – जैसे मिट्टी, चाक – को ढूंढते रहते हैं, उसी प्रकार रघुश्रेष्ठ ! इस जगत में माया से मोहित होने के कारण विमूढ़ व्यक्ति जगत के सृष्टि, पालन एवं संहार में प्रधानता से अन्यत्र कारण की कल्पना करते हैं।।34-36½।। 

इस संसार की आधारस्वरूपा, सभी की रक्षा करने वाली जो जगदंबा श्रेष्ठ मोक्ष प्रदान करने वाली हैं; वे ही मोहपाश में बांधने वाली भी हैं। उन्हीं जगदम्बा ने सागर में निमग्न भगवान विष्णु की रक्षा के लिए बरगद के पत्ते के रूप में होकर उस महासमुद्र में उन्हें धारण किया ।।37-38½।। रघुद्वह ! वे ही देवी जगदम्बा चेतनारूपा हैं। उनसे रहित सम्पूर्ण जगत शव के समान प्रतीत होता है, उनसे युक्त होकर यह जगत वैसे ही चेतनायुक्त प्रतीत होता है, जैसे की यंत्री की चेतना से यंत्र चेतनायुक्त प्रतीत होता है ।।39-40।।    

वे ही देवी जगदम्बा नित्य अपनी इच्छा से लीलापूर्वक देवाधिदेव भगवान शिव के रूप में होकर सदा अपने में ही विहार करती हैं। वे ही देवी जगदम्बा दुर्गति प्राप्त लोगों का निस्तारण करती हैं, इसलिए वे संसार में वे दुर्गा दुर्गतिनाशिनी के नाम से कही जाती हैं ।।41-42।। 

मन्दभाग्य वाला व्यक्ति भी उनके नाम के श्रेष्ठ अक्षरों का स्मरण कर सौभाग्य प्राप्त करता है, इसीलिए वे परमेश्वरी के नाम से जानी जाती हैं। वेदज्ञों के द्वारा वे मन्दभाग्य वालों का परित्राण करने वाली कही जाती हैं। रघुनन्दन ! वे ही देवी पराविद्या हैं और प्राणियों को चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – देने वाली तथा सभी विरोधियों का नाश करने वाली हैं ।।43-44½।।

वत्स ! उनका लोक जैसा है, उसका सम्यक वर्णन कर रहा हूँ, सुनिए ! महाबाहो ! उनका लोक रत्नद्वीपमय है और अमृतसागर से घिरा हुआ है। वह कल्पवृक्षों से व्याप्त तथा सुंदर बाजारों से सुशोभित है। वहाँ सर्वदा वसंत ऋतु ही रहती है, दूसरी ऋतु वहाँ नहीं आती। सुख प्रदान करने वाले जल का रूप धारण करके गंगा नदी वहाँ बहती हैं।।45-46।। महामते ! वहाँ मनोहर ध्वनि करने वाले विभिन्न प्रकार की मणियों के समान प्रतीत होने वाले पक्षी, देवांश से उत्पन्न पुण्यात्माजन तथा असुरगण मधुर ध्वनियों से समयोचित राग में वेदों के अंतर्गत वर्णित देवी के गुणों का आनंदित होकर सर्वदा गान करते रहते हैं।।48-49।। रघुश्रेष्ठ ! वहाँ मलय पर्वत से उठी हुई परम सुखदायक शीतल, सुगंधित वायु सर्वदा मन्द-मन्द बहती रहती है।।50।।     

अपने पुण्य के अनुसार जिन्होंने उनकी सालोक्य मुक्ति प्रदान कर ली है, वे ही प्राणी इस देवीलोक में निवास करते हैं, वे नित्य आनंदस्वरूप तथा नित्य विज्ञान से परिपूर्ण रहते हैं। उनमें स्त्रियाँ देवी के समान और पुरुष भैरव के समान हैं ।।51-52।। देवीलोक में रहने वाले सभी के भवन सुंदर रत्न और सुवर्ण से अलंकृत हैं, वे भवन मनोहर रत्नों के जालों से रचित, अनेक तोरणों से सुशोभित हैं।।53।। 

 

जिन लोगों ने गीत, नृत्य और वाद्य से देवी जगदम्बा को संतुष्ट किया है, वे उनके धाम को प्राप्त कर नित्य आनंदित होकर उत्सुकतापूर्वक नाचते-गाते तथा बजाते हैं। इस प्रकार रघुद्वह ! वह लोक आनंदराशिमय है।रत्न निर्मित प्राकार तथा तोरणों से युक्त भगवती का वह अद्भुत लोक अवर्णनीय हैं।।54-56।। वह चंद्रकांत आदि मणियों से और पर्याप्त कौस्तुभ मणियों से प्रकाशमान है, चारों दिशाओं में चार द्वार हैं जहाँ रत्नमय दंड तथा शूल धारण किए हुए भयानक नेत्रों वाले भैरवगण विद्यमान रहते हैं। देवी जगदम्बा के द्वार की रक्षा में तत्पर सैकड़ों भैरवियाँ गाल बजाती हुई हाथ में दण्ड लेकर दौड़ती रहती हैं। राघव ! वहाँ मनोहर तथा स्वच्छ विभिन्न पताकाएं और ध्वजाएं फहराती हुई सुशोभित हैं।।57-59 ½।। 

नगर के मध्य में बहुत से सुंदर चबूतरे बने हुए हैं और वे ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं से घिरे हुए हैं। उन अट्टालिकाओं पर भी द्वारपाल स्थित हैं। उनके मध्य में देवी का अंत:पुर विद्यमान है। रघुकुलोद्भव ! वहाँ द्वार पर स्थित गणों के स्वामी गणेश तथा षडानन – देवी के वे दोनों पुत्र देवी के दर्शन की इच्छा करते हुए ध्यानमग्न रहते हैं ।।60-62।। 

राम ! महाबाहो ! उस देवी लोक में वहाँ करोड़ों-करोड़ ब्रह्मांडों में स्थित रहने वाले करोड़ों-करोड़ ब्रह्मा, करोड़ों बलराम, करोड़ों विष्णु और करोड़ों शिव हैं। आपसे और अधिक क्या कहूँ ?।।631½।। रघुद्वह ! उस रमणीय अंत:पुर में विचित्र मणियों से जटित मण्डप सुशोभित है, जिसके स्तम्भ रत्नों से प्रकाशित हैं और मोतियों की उज्जवल प्रभा जिसके तोरणों पर बिखर रही है। रत्न दीप मालिकाओं से जहाँ दिशाएं उद्भासित हैं, वहाँ तप्त सुवर्ण, चमकते हुए सूर्य और विद्युतपुंज के समान प्रभा वाला रत्नमय रमणीय सिंहासन है जिस पर देदीप्यमान, शरतकालीन करोड़ों चंद्रमाओं के समान कान्ति से युक्त मुखवाली त्रिलोक जननी महादुर्गा विराजमान हैं।।64-67।। 

चमकते हुए सुवर्ण से रचित, हजारों स्यमन्तक तथा असंख्य कौस्तुभमणियों से खचित किरीटी को धारण करने वाली वे महादेवी सुशोभित हैं।।68।। श्रेष्ठ माणिक्यों से जड़े हार समूहों की कान्ति से वक्ष:स्थल सुशोभित है तथा श्याम आभा से युक्त नेत्रप्रांतवाली उन भगवती का सुंदर मुखमंडल दंतपंक्ति तथा मुस्कान से सुशोभित है।।69-70।।

महामते ! वे शुद्ध रत्नों से निर्मित विभिन्न प्रकार के अलंकारों से सुशोभित तथा चार भुजाओं वाली हैं और विशाल सिंह पर आसीन हैं। उन्होंने लाल रंग के वस्त्र धारण कर रखे हैं और उनकी सुंदर कमर में करधनी झंकृत हो रही है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनके सुंदर चरण कमलों की वंदना कर रहे हैं। उनके सामने खड़े होकर हाथ जोड़े महाब्रह्मा, महाविष्णु और महेश्वर सुंदर स्तुति वाक्यों से उनका स्तवन कर रहे हैं।।71-73।। 

उनके वामभाग तथा दक्षिण भाग में जया और विजया अत्यंत शुभ्र चँवर डुलाती हुई खड़ी रहती हैं। उनके दक्षिण भाग में देवी लक्ष्मी सुंदर पंखा हाथ में लिए स्थित हैं और कुमकुम आदि अरुणवर्ण के सुगंधित द्रव्य उन्हें प्रदान करती हैं। देवी जगदम्बा के वामभाग में स्थित होकर स्वयं वाग्देवी सरस्वती अपनी वीणा से वेदागमसम्मत देवी के गुणों को गायन के रूप में प्रस्तुत करती हैं। राघव ! इस प्रकार सरस्वती आदि देवियाँ भगवती की प्रसन्नता प्राप्ति की कामना से शुद्ध रत्नमय पात्र में अमृत भरकर देवी जगदम्बा को प्रदान करती हैं। नारदादि मुनिगण भक्तिपूर्वक गदगद स्वर में देवी जगदम्बा की वेदोक्त रहस्यात्मक पूजा विधान का उनके समक्ष खड़े होकर गान करते हैं। चौंसठ योगिनियाँ महा माणिक्य मणि से निर्मित ताम्बूलयुक्त तांबूलपात्र लेकर देवी जगदंबा को यत्नपूर्वक प्रदान करती हैं। करोड़ों भैरव आदि प्रमुख अनेक देवगण रत्नखचित दण्ड और खड्ग हाथ में लेकर वहाँ द्वारपाल के रूप में खड़े रहते हैं।।74-80।।     

रघुनन्दन ! प्रभो ! इस प्रकार देवी जगदम्बा के अतुलनीय ऐश्वर्य का वर्णन मैं चार मुखों से कहाँ तक करूँ। जिसे कहने में करोड़ों हजार वर्षों में भी भगवान त्र्यंबक समर्थ नहीं हुए। श्रुतियाँ उनके गुणों की महिमा छंदोबद्ध करके प्रस्तुत करती हैं।।81-82।। उनके अंश से उत्पन्न सावित्री तथा गायत्री और इंद्रादि लोकपाल एवं अनेक ब्रह्मांडों में निवास करने वाले उनके दर्शन की इच्छा से देविलोक के बाहर एकत्रित रहते हैं। जो उनकी भक्ति और पूजा में संलग्न हैं, वे शीघ्र ही उनका दर्शन प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु राम ! उनका पुण्यदायक दर्शन दूसरे के लिए अत्यंत दुर्लभ है। उनके दर्शन में आधिपत्य अथवा वर्णाश्रम का कोई विचार नहीं है। जिनकी पुण्यमयी बुद्धि उन देवी की भक्ति में लगी रहती है; उनके लिए ही वे सुलभ हैं।।83-85½।। 

रघुश्रेष्ठ ! प्रभो ! तंत्रों में वर्णित उनकी दिव्य मूर्ति तथा उनके दिव्य लोक के विषय में जिस प्रकार आपने पूछा था, उसे मैंने बता दिया ।।86½।। दस भुजाओं से युक्त तथा सिंह पर आसीन देवी की जो पुराणों में वर्णित दूसरी मूर्ति है, मैं उसे मिट्टी की प्रतिमा के रूप में बनाकर युद्ध में आपकी विजय की कामना से निश्चय ही पूजा करूंगा ।।87-89।। 

राम ! देवी के पूजन के लिए आपने मेरा वरण कर लिया है, आज आर्द्रा नक्षत्र के योग में पूजन आरंभ कर कृष्ण पक्ष की नवमी को भगवती का प्रबोधन करके जब तक आप राक्षसराज रावण का वध नहीं करेंगे, तब तक युद्ध में आपकी विजय की कामना से प्रतिदिन उनकी पूजा करूंगा।।90-91।। राम ! राघव ! आप पवित्र होकर ध्यानपूर्वक देवी का भक्ति से स्तवन करके राक्षसों के साथ युद्ध करें, आपकी विजय होगी ।।92।।             

श्री महादेव जी बोले – इस प्रकार कहे जाने पर भगवान श्रीराम देवी के प्रबोधन के लिए समुद्र के उत्तरी तट पर पितामह ब्रह्मा तथा अन्य सभी देवताओं के साथ बिल्व वृक्ष के निकट गए। तब भगवान श्रीराम ने युद्ध में विजयी होने के लिए उत्तराभिमुख हो हाथ जोड़कर जयदायिनी माँ जगदम्बा की स्तुति की ।।93-94।। 

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘दुर्गालोकवर्णन’ नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।