
श्रीमहादेव जी बोले – तब भगवान ब्रह्मा जी ने महात्मा श्रीराम से संक्षेप में पूर्व वृतांत को कहना प्रारंभ किया – ।।1।।
ब्रह्मा जी बोले – भगवान विष्णु ! इस दुष्ट के वध के लिए जब मैंने आपसे प्रार्थना की थी कि प्रभो ! आप मनुष्य रूप में अवतार लें, तब आप इसकी रक्षा में भगवती जगदम्बा को स्थित जानकर उनकी प्रार्थना करने के लिए स्वयं कैलाश पर्वत पर आए थे। मैं और भगवान शंकर भी आपके प्रति अनुग्रह के कारण इसी के वध के लिए वहाँ एक साथ आ गए ।।2-4।।
तब आपने महामाया जगदंबिका को बार-बार साष्टांग प्रणाम करके कहा था – देवि ! शिवे ! आप मुझ पर प्रसन्न हों। मैं सभी देवताओं तथा विशेषरूप से ब्रह्मा के द्वारा प्रार्थना करने पर रावण के वध के लिए मनुष्यरूप में अवतार ले रहा हूँ। आपमें उसकी दृढ़ भक्ति है; इसलिए आप उसे नित्य वरदान देती हैं तो फिर उस महाबली को मैं युद्ध में कैसे मार पाऊँगा? ।।5-7।। राम ! जब आपने देवी से यह बात तथा अन्य जो बातें विस्तारपूर्वक बताईं; उसे सुनकर जगदम्बा ने जो कहा, वह मुझसे सुनिए ।।8।।
श्रीदेवी जी बोली – जब आप अपनी माया से मनुष्यरूप में अवतार लेकर लंकेश रावण से युद्ध करेंगे, तब युद्धभूमि में आप सर्वदा मेरा स्मरण करें। इससे आपको अत्यंत भीषण बाण भी नहीं वेध पाएंगे, तथा न राक्षसों के पराक्रम को देखकर आप भयभीत ही होंगे। असमय में भी वहाँ मेरी विधिपूर्वक पूजा करके मेरी कृपा से आप युद्ध में वीर रावण को जीत लेंगे ।।9-11।।
ब्रह्माजी बोले – महाबाहो राम ! इसलिए आप रावण को युद्ध में जीतने की इच्छा से उन जयप्रदा भगवती का स्मरण करते हुए युद्ध कीजिए ।।12।।
राघव ! मेरे पुत्र मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ आपके गुरु हैं। देवी का जो मंत्र उन्होंने आपको प्रदान किया है, महान संग्राम में उस मंत्र का स्मरण करते हुए युद्ध करके उस राक्षसराज रावण को बंधु सहित मार डालिए। रघुनन्दन ! आप उन महादेवी की पूजा के लिए प्रयत्न कीजिए; क्योंकि उनको प्रसन्न किए बिना आप किसी प्रकार विजयी नहीं होंगे। शुक्लपक्ष के प्रारंभ हो जाने पर यदि रावण उन जगदम्बा की पूजा करेगा तो उसकी मृत्यु नहीं हो सकेगी। इसीलिए रघुद्वह ! आप इस असमय में भी इन राक्षसों के नाश के लिए उनकी पूजा प्रारंभ कर दीजिए।।13-17।।
श्रीमहादेव जी बोले – लोकोपकारी इस समस्त बात को जानते हुए भी उनकी बात सुनकर श्रीराम ने उन्हें उत्तर दिया – ।।18।।
श्रीराम जी बोले – वे साक्षात परात्परा जगदम्बा देवी निश्चय ही विजय प्रदान करने वाली हैं और युद्ध में जीतने की आकांक्षा वाले को अवश्य ही उनका स्मरण और पूजन करना चाहिए, किन्तु देवताओं के पूजन के लिए यह उचित समय नहीं है। इस समय महादेवी त्रिदशेश्वरी शयनावस्था में हैं। पितामह ! यह कृष्णपक्ष है, शुक्लपक्ष नहीं है। इस समय सोयी हुई महादेवी की मैं कैसे पूजा करूँ ? ।।19-21।।
ब्रह्माजी बोले – अमंगलकारी दुरात्मा राक्षसराज रावण के वध के लिए और युद्ध में आपकी विजय के लिए मैं उन्हें जगाऊँगा। राघव ! आप असमय में भी महादेवी की पूजा कर सकेंगे और युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करेंगे। इसके लिए आप चिंता न करें।।22-23।।
श्रीराम जी बोले – ब्रह्मन ! आपका कल्याण हो, यह बात सत्य है कि आपके पुत्र वसिष्ठ जी मेरे गुरु हैं। आप ही उनके पिता है और इस संसार के पितामह भी आप ही हैं। इसलिए देव ! आप भी मेरे गुरु हुए। मैं भगवती चंडिका की पूजा करूंगा; क्योंकि मैं युद्ध करने में स्वयं अशक्त हूँ और मेरे लिए युद्ध जीतना संभव भी नहीं है। फिर भी जगदंबा की कृपा से मैं रावण को जीत सकता हूँ। यदि वह रावण भी शुक्ल पक्ष में देवी सुरेश्वरी की पूजा करेगा और यदि देवी जगदंबा उसकी पूजा से प्रसन्न होकर स्वयं उसे वर दे देती हैं; तब फिर मैं युद्ध में उस भयंकर पराक्रमी को कैसे मार पाऊँगा? ।।24-27।।
ब्रह्माजी बोले – उन भगवती ने पूर्व में ही बतला दिया है कि युद्धक्षेत्र में आपके हाथ से उसकी मृत्यु अवश्य होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। राम ! आपके द्वारा पूजा करने के बाद भी यदि देवी जगदम्बा पुनः वही वर प्रदान करती हैं तो भी युद्ध में निश्चित ही आपकी विजय होगी।।28-29।। जब वह पापात्मा साक्षात लक्ष्मीस्वरूपिणी पतिव्रता सीता की छायामूर्ति को रमणेच्छा से बलपूर्वक उठा लाया; तब वे ही उस दुष्ट आत्मा रावण के विनाश के लिए रुष्ट होकर विपत्ति रूप में स्वयं उसके नगर में प्रवेश कर गईं ।।30-31।। जहाँ धार्मिक बुद्धि में वहीं शांति, समृद्धि और कान्ति का निवास है, किन्तु जहाँ अधर्म है वहाँ वे शिवा स्वयं विपत्ति के रूप में आ जाती हैं। अहंकार के वशीभूत होकर जो धर्म का उल्लंघन करता है; महामते ! वे ही भगवती उसके घमंड को चूर कर देती हैं।।32-33।। रघुद्वह ! भगवती जगदंबा ने इस विषय में मुझे जो स्वयं बतलाया था, इतिहास सहित उसे मैं अब कहूँगा, आप सुनें -।। 34।।
रघुत्तम ! जिस प्रकार महामति भगवान महेश्वर पंचानन हैं, उसी प्रकार मैं भी पूर्व में पाँच मुखवाला था। रघुनन्दन ! तब मैंने पूर्वकाल में एक बार अहंकार के वशीभूत होकर क्रोधपूर्वक भगवान शिव से ऐसा कहा, जिसे सुनकर उन भगवान शंकर ने भयानक क्रोध करते हुए देखते ही देखते उसी क्षण मेरा पाँचवां सिर काट डाला।।35-37।। तदनंतर मैं चतुर्भुज होकर एक बार भगवान विष्णु के साथ उन सुरेश्वरी जगदम्बा को प्रणाम करने के लिए उनके नगर में गया। महामते ! उसी समय भगवान महारुद्र भी उन महादुर्गा को प्रणाम करने हेतु वहीं आए। राम ! इस प्रकार वहाँ मैं, ब्रह्मा, महाविष्णु और भगवान महेश्वर – तीनों देवता उन महादुर्गा के समीप एकत्र हुए ।।38-40।।
महामते ! उसी समय मैनें उन त्रिदशेश्वरी को प्रणाम करके भगवान शंकर के समीप में ऐसा कहा – माताजी ! आपकी कृपा से गर्वित इन शिव ने देवताओं की सभा में मेरा पाँचवाँ सिर पकड़कर काट डाला। सुरेश्वरवंदित जगन्माता ! मेरे किस अपराध से इन शिव ने मेरा सिर काटा ? ।।41-43।।
श्रीदेवी जी बोली – वत्स ! इसे जान लो कि कर्म ही शुभ फलों और अशुभ भोगों को देने वाले हैं। पद्मसम्भव ! शुभ और अशुभ कर्मों का फल देने वाली एकमात्र मैं ही स्वतंत्र हूँ; अन्य कोई नहीं। जो जिस प्रकार का शुभ अथवा अशुभ कर्म करता है; उसी प्रकार उसको शुभ अथवा अशुभ फल मिलता है। अन्यथा कभी नहीं होता ।।45-47।। मेरा कोई प्रिय अथवा अप्रिय नहीं है। अपने किए हुए कर्म का फल मनुष्य अवश्य ही भोगता है, इसमें कोई संदेह नहीं हैं ।।48।।
अपनी पुत्री संध्या को देखकर काम के वशीभूत हो आपने रमण करने के लिए जो विचार किया, उसी से आपको यह फल प्राप्त हुआ। ब्रह्मन ! भगवान शंकर का यह क्रोध तथा दूसरी सभी बाते भी निमितमात्र हैं। वस्तुत: निश्चितरूप से यह उस कर्म का ही फल है। ब्रह्मन ! जो भी व्यक्ति अपनी पुत्री को देखकर काम चिंतन करता है, मेरी इच्छा के कारण ही उसका सिर विच्छिन्न हो जाता है। महामते ! इसलिए मुझ अधिष्ठात्री के द्वारा ही त्रिशूल से आपका यह सिर काटा गया है, इसमें भगवान शंकर का क्या दोष है? यह निश्चित जानिए की तीनों लोकों में धर्माधर्म विरोधियों की मैं ही एकमात्र नियंत्री हूँ, अन्य कोई नहीं है। ब्रह्मन ! आपका पाँचवाँ मुख हव्यवाहन (अग्नि) – के रूप में बना दिया गया है, जिसमें आहुति देने पर सभी देवता शाश्वत तृप्ति को प्राप्त करते हैं।।49-54।।
ब्रह्मा जी बोले – तब तीनों ही श्रेष्ठ देवताओं (ब्रह्म, विष्णु और महेश) – ने त्रिलोकजननी को भूमि पर गिरकर प्रणाम किया और वे भक्तिपूर्वक उनका स्तवन करने लगे । । 55 । ।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश बोले – जगन्माता हम (ब्रह्मा, विष्णु और शंकर) तीनों देवता आपके पुरुष से उत्पन्न हुए हैं; फिर भी आपकी सनातन और अद्भुत महिमा को हम नहीं जानते हैं। आपकी महिमा और ऐश्वर्य आदि से अनजान हम देवगण आपके अचिंत्यरूप की स्तुति कैसे करें। महेश्वरी ! आप प्रसन्न हों ।।56।।
शिवजी बोले – सुरेश्वरि ! आपके चरण कमल की रेणु को भक्तिपूर्वक सिर पर धारण करने का मैनें प्रयत्न किया, तब उसके कितने ही कण गंगा में गिर गए, जिनसे वे गंगा जी सालोक्य मुक्ति को प्रदान करने वाली बन गईं। जिन आपके चरण कमलों की रेणु को ऐसी महिमा है, उन आप का स्तवन मैं कैसे करूँ? जगद्धात्री ! आप अपने स्वभावगत गुणों से जगत का परित्राण करें, अंबिके ! आप प्रसन्न हों ।।57।।
देवि ! आपका चरण कमल मैनें ह्रदय में धारण किया। उसी के प्रभाव से बलपूर्वक मृत्यु को जीतकर मैं समस्त लोकों को भय प्रदान करने वाले कालकूट विष को मक्खन की तरह पी गया। वह कालकूट आज भी मेरे गले में कांतिमान जामुन की आभा लिए शोभायमान है। सुरेश्वरी ! जगद्धात्री ! अंबिके ! आप प्रसन्न हों ।।58।।
विष्णु जी बोले – माता ! शिवे ! आपके श्रीविग्रह से रिसते हुए बिंदुमात्र से उत्पन्न हुआ तथा लक्ष्मी और सरस्वती के अनुमोदन से उत्पन्न हुआ तथा लक्ष्मी और सरस्वती के अनुमोदन से क्षीरसमुद्र में शेष शैय्या पर निरंतर सोया रहने वाला मैं भी आप के वास्तविक स्वरूप को न जानते हुए प्रयत्नपूर्वक आपका स्तवन करता हूँ। जगद्धात्री ! आप अपने स्वाभाविक गुणों से जगत का परित्राण करें, अंबिके ! आप प्रसन्न हों ।।59।। शिवे ! आप परात्परतरा सूक्ष्मा प्रकृति हैं और जगत की एकमात्र कारण हैं। आपको विज्ञजन संसार की सृष्टि आदि शक्तियों से भी परे जानते हैं। आप समस्त जगत की माता हैं और हम त्रिदेव भी आपके ही पुत्र हैं। आप हम पर कल्याणमयी दृष्टि से कृपा करें। जगद्धात्रि ! जगत का परित्राण करें, अंबिके आप प्रसन्न हों ।।60।।
ब्रह्मा जी बोले – मैं न आपका स्तोत्र जानता हूँ और न ही आपके श्रेष्ठ रूप को जानता हूँ और न ही आपके शील आदि गुणों को सम्यक और इदमित्थं रूप से जानता हूँ। मैं तो आपके किंचित गुणगण जो वेदों द्वारा वर्णित हैं, उन्हें ही जानता हूँ तथा दूसरे भी वही जानते हैं। उन आपके गुणगणों को करोड़ों मुखों से दीर्घकाल तक कहने में मैं समर्थ नहीं हूँ। शिवे ! आप अपने स्वाभाविक सद्गुणों से जगत का परित्राण करें। जगद्धात्रि ! अंबिके ! आप प्रसन्न हों ।।61।।
श्रीमहादेव जी बोले – रघुनन्दन ! इन स्तुति-वचनों के द्वारा भगवती की स्तुति तथा भक्तिपूर्वक नमस्कार करके वे ब्रह्मादि तीनों देवता अपने-अपने स्थान पर चले गए ।।62।। राजेन्द्र ! उन्होंने स्वयं ही मेरे सामने ऐसा कहा है कि यह रावण भी दुष्टात्मा है और वे इसकी रक्षा नहीं करेंगी ।।63।। रघुत्तम ! मनोहर रूपिणी सीता मंदोदरी के गर्भ से उत्पन्न हुई थीं, इस प्रकार वे उस रावण की क्षेत्रजा पुत्री भी थी; काम के वशीभूत होकर रमण की इच्छा वाला वह रावण लोभपूर्वक उन्हीं सीता का अपहरण करके जब लंका ले आया, तभी लंका नष्ट हो गयी ।।64-65।।
धर्मनिष्ठजनों को विजय दिलाने वाली तथा पापियों का नाश करने वाली एकमात्र वे ही अतिश्रेष्ठ भवानी भुवनेश्वरी हैं। रघुत्तम ! उन भगवती की जो लोग नित्य अर्चना करते हैं; उनको स्वर्गलोक, मृत्युलोक तथा रसातल – तीनों लोकों में कहीं कोई हानि नहीं होती, यह सत्य है, सत्य है ।।66-67।। इसलिए शत्रुसूदन राम ! आप भय त्यागकर विभिन्न उपचारों के द्वारा युद्ध में शत्रुओं को मारने की इच्छा से विधिपूर्वक असमय में भी महादेवी जगदम्बा की पूजा कर युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को जीतेंगे। अतः आप चिंता न करें।।68-69।।
रघुत्तम ! जहां देवी जगदम्बा की सम्यक रूप से पूजा होती है; वहाँ धर्म विकसित होकर विजय प्रदान करता है तथा जहाँ अधर्म होता है वहाँ यह देवी जगदंबा विपत्ति के रूप में अवस्थित रहती हैं ।।70।। आप सात्विक प्रकृत्ति के हैं, सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने वाले हैं तथा न्याय के पथ पर चलने वाले हैं; इसलिए आपकी विजय निश्चित है। उस रावण के द्वारा जो शुभ कर्म किया गया है, उसका फल उसने प्राप्त कर लिया है, अब उसमें कुछ शेष नहीं बचा है। इस समय उसके कुकृत्य का फल उपस्थित हो गया है। इसलिए आपकी ही बाण-वृष्टि से आहत होकर वह गिरेगा। राम ! आप स्थिर होकर देवी जगदम्बा की भक्तिपूर्वक पूजा कर लंकापति रावण को मारेंगे, इसमें चिंता की कोई बात नहीं ।।71-74।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीरामब्रह्मामंत्रणावर्णन’ नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
