महा भागवत – देवी पुराण – पैंतालीसवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी बिल्ववृक्ष की छाया में भगवती जगदंबिका का असमय में भी भक्तिपूर्वक पूजन करके और बार-बार उन्हें साष्टांग प्रणाम करके वेदोक्त स्तुति तथा देविसूक्त के द्वारा भगवान श्रीराम की विजय के लिए भगवती सुरेश्वरी का प्रबोधन करने लगे – ।1-2।। 

ब्रह्माजी बोले – ॐ विमल वदनवाली को नमस्कार है। भूरलोक, भूवरलोक तथा स्वर्लोक में व्याप्त परम कमला स्वरूपिणी, एकमात्र परमानन्द राशिस्वरूपा, तीनों लोकों के अंधकार को दूर करने वाली, परम ज्योति स्वरुपा, असत अभिलाषा से युक्त संदूषित दोषों को दूर करने वाली, परम अमृत स्वरूपिणी, मूर्तिमान करोड़ों चंद्रमा के समान मुखवाली, सभी वेदों में उद्भववाली नारायणी, शरीरमात्र में परमात्मरूप से अवस्थित दुर्गादेवी ! आप प्रसन्न हों, आपको बार-बार नमस्कार है।।3।। 

ॐ विकरालरुपे ! प्रणवस्वाहास्वरूपे ! ह्रीं स्वरूपिणी ! अंबिके ! त्रिगुणप्रसूते ! अम्ब ! भगवती ! आपको बार-बार नमस्कार है।।4।। सिद्धिकरी, स्फ्रें-स्फ़्रोंस्वरूपिणी, स्वाहारूपिणी, स्वधारूपा, निर्मलमुखी, चंद्रमुखी, कोलाहलमुखी, शर्वा ! आप प्रसन्न हों।।5।। जगत को हर्षित करने वाली, मधुर दृष्टि वाली, क्रीडा स्थान में स्वयं आयी हुई आप महेश्वरी भुवनेशी को मैं प्रणाम करता हूँ। आप शत्रुरूपा और मित्ररूपा भी हैं, आप दुर्गकी दुर्गा हैं, आप योगिनियों के अंत:स्थल में स्थित रहती हुई एकरूपा, अनेकरूपा, सूक्ष्मरूपा, निर्विकारा और करोड़ों-करोड़ ब्रह्मांडों को प्रकट करने वाली हैं।।6।। 

एकमात्र मैं, विष्णु अथवा शिव तथा अन्य देवता – हम सभी आपकी स्तुति करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? आप स्वाहा, स्वधा, वौषट, ओंकार और लज्जादिबीजरूपा हैं, आप ही स्त्री, पुरुष तथा सर्वरूपवाली हैं। आपको नमस्कार है, आपको हम प्रबोधित कर रहे हैं। आप हम लोगों पर प्रसन्न होइए ।।7।। 

आप ही देवर्षि, देवता तथा कालरूपा हैं, मास, ऋतु, दो अयन – उत्तरायण और दक्षिणायन – भी आप ही हैं। देवी ! आप स्वधास्वरूपा होकर कव्य का भोग करती हैं। उसी प्रकार स्वाहा स्वरूपा होकर स्वयं हव्यभोक्त्री हैं।।8।।

आप ही शुक्ल पक्ष में देवता के रूप में तथा कृष्ण पक्ष में पित्रादि के रूप में प्रपूजित हैं। आप ही सत्यस्वरूपा और अखंड स्वरूपा हैं। मैं आपको नमस्कार कर आपका प्रबोधन करता हूँ। आप प्रसन्न हों।।9।। 

चंद्र, सूर्य तथा अग्नि – इन तीन नेत्रों वाली देवी ! आप निम्न-से-निम्न व्यक्ति को उच्च बना देती हैं तथा वह आपको नमस्कार करके तथा आपके चरण कमल का ध्यान करके मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। आपके श्रेष्ठ पदकमल का पूजन करके कौन उत्तम मुक्ति को नहीं प्राप्त कर लेता है ।।10।। 

आप उच्च को निम्न तथा निम्न को उच्च करने में समर्थ हैं। भवानी ! आप समय पर शक्ति रूपा हैं। आपको नमस्कार करके मैं आपका प्रबोधन करता हूँ। आप हम पर प्रसन्न होइए। श्रीराम, रुद्रादि तथा इस संसार में शक्तिरूप से जो विराजमान हैं वे आप ही हैं, आप जो हैं सो हैं अर्थात अगम्य स्वरूपा हैं। शुद्धाचारी श्रीराम का वाममार्ग से त्वरित अभ्युदय कीजिए। आपको नमस्कार कर मैं आपका प्रबोधन करता हूँ। आप हम पर प्रसन्न होइए।।11।। 

ॐ तत्सत ब्रह्म को नमस्कार है । 

श्री महादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस वेदसूक्त तथा स्तोत्र से ब्रह्माजी ने जब देवी की स्तुति की तब भगवती चंडिका प्रबुद्ध हो गईं। देवी के प्रबुद्ध हो जाने पर वे लोक पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ हाथ जोड़कर अपने मनोवांछित की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने लगे – ।।12-13।। 

ब्रह्माजी बोले – देवि, सुरोत्तमे ! सभी प्राणियों के कल्याण, अत्यंत भीषण संग्राम में श्रीराम की विजय तथा राक्षसों के नाश के लिए हमने असमय में आपको प्रबोधित किया है। महादेवी ! जब तक जगत शत्रु दशानन अपने पुत्र तथा बाँधवों के साथ युद्ध में नहीं मारा जाएगा, तब तक श्रीराम के विजय की इच्छा वाले हम लोग आपकी पूजा करते रहेंगे। शिवे ! देवी ! यदि आप प्रसन्न हैं तो प्रतिदिन हम लोगों की पूजा ग्रहण कर महाशत्रुसमूह का विनाश करते रहिए।।14-17।। 

श्रीदेवी जी बोली – महाबलशाली एवं पराक्रमी वीर कुंभकर्ण अपने भयंकर सैनिकों के साथ आज ही युद्ध में मारा जाएगा। इस कृष्ण पक्ष की शुद्ध नवमी से आरंभ होकर जब तक शुक्ल पक्ष की नवमी आएगी, तब तक प्रत्येक दिन युद्ध क्षेत्र में राक्षस मारे जाएंगे। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। अमावस्या तिथि की रात्रि में मेघनाद के मारे जाने पर संत सहृदय रावण भी युद्ध हेतु भगवान श्रीराम के पास आ जाएगा।।18-20½।। 

ब्रह्माजी पुनः बोले – आनन्द – राशिस्वरूपा तीनों लोकों के अंधकार को दूर करने वाली, परम ज्योतिस्वरूपा, असत अभिलाषा से युक्त संदूषित दोषों को दूर करने वाली, परम अमृतस्वरूपिणी,मूर्तिमान करोड़ों चंद्रमा के समान मुखवाली, सभी वेदों में वर्णित उद्भव वाली नारायणी, शरीरमात्र में परमात्मरूप से अवस्थित दुर्गादेवी ! आप प्रसन्न हों, आपको बार-बार नमस्कार है।।21।। ॐ विकरालरुपे ! प्रणव -स्वाहास्वरूपे ! ह्रींस्वरूपिणी ! अंबिके ! त्रिगुणप्रसूते ! अम्ब ! भगवती ! आपको बार-बार नमस्कार है। सिद्धिकरी स्फ्रेंस्वरूपिणी ! को नमस्कार है।।22।। 

देवी जी ने पुनः कहा – देवांतकप्रभृति महाबली और पराक्रमी वीर राक्षसों को साथ लेकर क्रोध के वशीभूत हुआ रावण रणभूमि में आएगा। तत्पश्चात युद्ध भूमि में देवांतक आदि राक्षसों के मारे जाने पर वह लोकपीड़क, क्रोध से लाल आँखों वाला महावीर रावण स्वयं युद्ध करेगा।।23-24।। तब श्रीराम और रावण का ऐसा कठिन युद्ध होगा, जैसा न किसी ने देखा है और न कहीं सुना ही होगा। उसमें भी आश्विन शुक्ल सप्तमी से आरंभ होकर नवमी तिथि तक उन दोनों योद्धाओं में महान भयंकर संग्राम होगा।।25-26।। 

युद्ध में श्रीरामचंद्र की विजय की आकांक्षा वाले आप लोगों को उस शुक्ल सप्तमी से प्रारंभ करके नवमी तिथि पर्यंत सर्वप्रथम मृण्मयी प्रतिमा में विशुद्ध पूजनोपचारों से मेरी विधिवत पूजा करनी चाहिए तथा वेद-पुराणोक्त स्तोत्रों से भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करना चाहिए।।27-28 ½।। देवगण ! आश्विन मास में शुक्ल पक्ष में मूल नक्षत्र से युक्त सप्तमी तिथि को पत्रिका-प्रवेशन तथा श्रीराम के धनुष-बाण का विधिवत पूजन करना चाहिए।।29½।।           

अष्टमी को प्रतिमा में पूजित होने पर मैं अष्टमी तथा नवमी के उत्तम संधिकाल में दुरात्मा दुष्ट रावण के सिर से रणभूमि में आ जाऊँगी, तदनंतर उस संधि के क्षण में विधि विधान से विपुल उपचारों से बारम्बार मेरी पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात नवमी तिथि को भी विविध प्रकार के उपचारों से पूजित होने पर मैं अपरान्ह में युद्ध क्षेत्र में उस वीर रावण का संहार करूँगी।।30-33½।।  

श्रेष्ठ देवगण ! दशमी तिथि – विजयादशमी – में प्रातः ही मेरी पूजा कर महोत्सव पूर्वक नदियों में मेरी मृण्मयी मूर्ति विसर्जित करनी चाहिए।।34-35।। इस प्रकार इन – आश्विन कृष्ण नवमी से शुक्ल नवमी तक – पंद्रह दिन में मेरी पूजा का महोत्स करके उस दुरात्मा रावण के मारे जाने पर आप लोगों को शांति मिलेगी।।36।।  

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘ब्रह्मा के द्वारा देवीसूक्तस्तुतिवर्णन’ नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।