महाभागवत – देवी पुराण – सोलहवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में भगवती गीता के वर्णन में ब्रह्मविद्या का उपदेश है, आत्मा का स्वरूप, अनात्मपदार्थों में आत्मबुद्धि का परित्याग, शरीर की नश्वरता का प्रतिपादन तथा अनासक्त योग का वर्णन है. 

हिमालय बोले – माता ! वह कैसी विद्या है, जिससे मुक्ति प्राप्त होती है? महेश्वरी ! आत्मा क्या है तथा उसका स्वरुप क्या है? यह मुझे बताइए।।1।।

श्रीपार्वतीजी बोलीं – तात ! महामते ! सुनिए, संसार से मुक्ति दिलाने वाली जो विद्या है, उसके स्वरूप का मैं संक्षेप में वर्णन कर रही हूँ।।2।। बुद्धि, प्राण, मन, अहंकार और इन्द्रियों से अलग शुद्ध और अद्वित्तीय चित्स्वरुप आत्मा मैं ही हूँ, ऎसा पूर्णत: निश्चित है. जिस ज्ञान के द्वारा आत्मस्वरुप का सम्यक् अवबोध होता है, वही विद्या है और उसी विद्या को ध्यान भी कहा जाता है. आत्मा निर्विकार, विशुद्ध तथा जन्म-मरण आदि से रहित है।।3-4।।

वह आत्मा बुद्धि आदि उपाधियों से रहित, चिदानन्दस्वरुप, आनन्दमय, परम प्रभायुक्त, पूर्ण तथा सत्य-ज्ञान आदि लक्षणों वाला है. वही एकमात्र अद्वित्तीय सर्वश्रेष्ठ आत्मा अपने प्रकाश से सभी प्राणियों के सूक्ष्म देहादि को प्रकाशित करते हुए सम्यक् रूप से सब के भीतर विराजमान है।। गिरिराज ! इस प्रकार मैंने आपसे आत्मा के स्वरूप का वर्णन कर दिया. मनुष्य को एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार के लक्षण वाले आत्मा का नित्य चिन्तन करना चाहिए।।7।। देह आदि अनात्म पदार्थों में आत्मबुद्धि का परित्याग कर देना चाहिए, क्योंकि वैसी बुद्धि राग-द्वेष आदि दोषों का मूल कारण है. राग-द्वेष आदि दोषों से दोषयुक्त कर्म ही सम्भव है. उनसे प्राणी जन्म-मरण की प्रक्रिया से निरन्तर बँधा रहता है, अत: शरीरादि अनात्म पदार्थों में उस आत्मबुद्धि का परित्याग कर देना चाहिए।।8-9।। 

हिमालय बोले – शिवे ! राग-द्वेष आदि से पापात्मक अशुभ अदृष्ट पैदा होता है उसका परित्याग लोग किस प्रकार करें, इसे आप कृपा करके मुझे बताइए. जो लोग दूसरे मनुष्य का अपकार करते हैं, उनके प्रति वह व्यक्ति सहिष्णुता का भाव किस प्रकार रखे और उनके प्रति उस व्यक्ति में किस प्रकार से इष्टानिष्टविषयक राग तथा द्वेष न हों।।10-11।।

श्रीपार्वजी बोलीं – “अपकार किसका किया गया” – इस पर शीघ्र विचार करना चाहिए. उस पर विचार करने से द्वेष उत्पन्न ही नहीं होगा. पाँच महाभूतों से मिलकर यह देह बना हुआ है, जिससे यह जीव स्वयं भिन्न है. यह शरीर या तो अग्नि के द्वारा जला दिया जाता है या शिवा (सियार) आदि के द्वारा भक्षित कर लिया जाता है, किंतु आत्मा नहीं. जो इस प्रकार का ज्ञान रखता है, उसका भला कौन-सा अपकार हो सकता है?।।12-13½।। अपने-आप में पूर्ण तथा सच्चिदानन्द स्वरूप वाला यह विशुद्ध आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है, न सुख-दु:खादि द्वन्द्वों में लिप्त होता है और न तो कष्ट ही भोगता है. अत: शरीर के काटे जाने पर भी इस आत्मा का कोई अपकार नहीं होता।।14-15।।

गिरिराज ! जैसे घर के अंदर अवस्थित आकाश पर घर के जलने का कोई प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार शरीर के अंदर अवस्थित आत्मा पर शरीर के छेदन आदि का कोई प्रभाव नहीं होता. जो मारने में इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो शरीर के मारे जाने पर आत्मा को मारा गया समझता है – ऎसा सोचने वाले वे दोनों ही लोग भ्रमित चित्त वाले हैं, क्योंकि यह आत्मा न तो मारता है और न मारा ही जाता है।।16-17।। अपने स्वरूप को इस प्रकार जानकर और द्वेष छोड़कर मनुष्य सुखी हो जाए. द्वेष मन के सन्ताप का मूल है, द्वेष सांसारिक संबंधों को भंग करने वाला है और द्वेष मोक्ष प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न करने वाला है, अत: प्रयत्नपूर्वक उसका परित्याग कर देना चाहिए।।18½।।

हिमालय बोले – देवि ! यदि यह देह तथा परमात्मास्वरूप जीव का इस लोक में  अपकार नहीं होता और ये दोनों दु:ख के भागी नहीं होते तो फिर जिस दु:ख का साक्षात् अनुभव होता है, वह किसे होता है? महेश्वरि ! इस शरीर में दु:ख भोगने वाला दूसरा कौन है? यदि मुझ पर आपकी कृपा है तो आप मुझे इस विषय को यथार्थ रूप से बताइए।।19-21।।

श्रीपार्वतीजी बोलीं – न तो इस देह को और न तो इस परमात्मस्वरुप आत्मा को ही दु:ख होता है, फिर भी यह निर्लेप (विशुद्ध) आत्मा मेरी माया से मोहित होकर स्वयं मैं सुखी हूँ, मैं दु:खी हूँ – ऎसा मान लेता है. वह माया अनादि, अविद्यास्वरूपिणी तथा जगत् को मोहित करने वाली है. पिताजी ! वह आत्मतत्व उत्पन्न होते ही उस माया से आबद्ध हो जाता है और उसी से वह राग-द्वेष आदि विकारों से व्याप्त होकर संसारी हो जाता है।।22-24।। 

महामते ! यह आत्मा अपने लिंगरूप मन, जिसमें वासना निहित रहती है – को धारण करके लाचार-सा बना हुआ इस संसार में व्यवहार करता है।।25।। रक्तवर्ण के पुष्प के समीप स्थित शुद्ध स्फटिक उसके सांनिध्य के कारण उसी के रंग से युक्त लाल प्रतीत होता है, जबकि वास्तव में उसमें रंग विद्यमान नहीं रहता है. बुद्धि, इन्द्रिय आदि के सांनिध्य के कारण आत्मा की भी वही गति होती है. मन, बुद्धि तथा अहंकार जीव के सहयोगी हैं. तात ! अपने-अपने कर्मों के अधीन होकर वे ही कर्म-फल का भोग करते हैं. वे सभी समस्त विषयात्मक सुखों तथा दु:खों का भोग करते हैं, आत्मा भोग नहीं करता, क्योंकि यह आत्मा प्रभुतासम्पन्न, विकार रहित तथा निर्लिप्त है।।26-28½।।

सृष्टि के समय यह जीव पूर्वजन्म की वासनाओं से युक्त अन्त:करण के साथ उत्पन्न होता है और इस प्रकार यह जीव प्रलयपर्यन्त सृष्टि में निवास करता है. इसलिए महाराज ! विद्वान पुरुष को चाहिए कि ज्ञान-विचार के द्वारा इच्छित तथा अनिच्छित पदार्थों की प्राप्ति में मोह का परित्याग कर सुखी हो जाए।।29-30।।

देह मन के संताप का मूल है और यह देह संसार का कारण भी है. यह देह कर्म से उत्पन्न होता है और वह कर्म पाप तथा पुण्य भेद से दो प्रकार का होता है. राजेन्द्र ! उन्हीं पाप-पुण्य के अंश के अनुसार जीव को सुख तथा दु:ख प्राप्त होते हैं. दिन एवं रात की भाँति इन सुख और दु:ख का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।।31-32।।   

स्वर्ग आदि की प्राप्ति की कामना करने वाला विधानपूर्वक पुण्य कर्म करके स्वर्ग प्राप्त करने के बाद भी शीघ्र ही कर्म से प्रेरित होकर पुन: मृत्युलोक में गिरता है. अतएव विद्वान को आसक्ति का त्याग करते हुए विद्याभ्यास में तत्पर रहकर तथा सत्संग करके परम सुख की अभिलाषा रखनी चाहिए।।33-34।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीभगवतीगीतोपनिषद् में ब्रह्मविद्या-योगशास्त्र के अन्तर्गत श्रीपार्वती-हिमालय-संवाद में “ब्रह्मविद्योपदेशवर्णन” नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।