महाभागवत – देवीपुराण – पंद्रहवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में हिमालय और मेना की तपस्या से प्रसन्न हो आद्यशक्ति का “पार्वती” नाम से हिमालय के यहाँ प्रकट होना और उन्हें दिव्य विज्ञानयोग का उपदेश प्रदान करना (भगवती गीता का प्रारम्भ) है. 

नारदजी बोले – महादेव ! परमेश्वरी सती जिस प्रकार अपने पूर्णावतार में पार्वती रूप से मेनका के गर्भ में आयीं, उस कथा को कृपापूर्वक बतायें।।1।। परमेश्वर ! यद्यपि उन जगदम्बा के जन्म, कर्मादि की कथा अनेक पुराणों मे सुनी गयी है तथा ज्ञात भी है तथापि उसे मैं आपसे अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ, क्योंकि आप इस वृत्तान्त को ठीक-ठाक जानते हैं. महामते ! महादेव ! इसलिए कृपाकर विस्तारपूर्वक वह कथा कहें।।2-3।।

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! गिरिराज और उनकी पत्नी मेना ने त्रैलोक्य माता, सनातनी और ब्रह्मरूपा दुर्गादेवी की महान उग्र तपस्या करके उन्हें पुत्रीरूप से पाने की प्रार्थना की थी. भगवान शिव ने भी सती के विरह से दु:खी होकर उन्हें प्राप्त करने का अनुरोध किया था. अत: ब्रह्मरूपा जगदम्बिका का स्वयं मेना के गर्भ में आयीं. तदनन्तर देवी मेना ने शुभ दिन में कमल के समान मुखवाली, सुन्दर प्रभावशाली, जगन्माता भगवती को पुत्रीरूप से जन्म दिया. मुनिवर ! उस समय सर्वत्र पुष्पवृष्टि होने लगी।।4-7।। 

दसों दिशाओं में प्रकाश फैल गया और सुगन्धित वायु बहने लगीं. जब पर्वतराज ने सुना कि उनके यहाँ सुन्दर कन्या ने जन्म लिया है, जो करोड़ों मध्यान्हकालीन सूर्य के समान तेजस्विनी, तीन नेत्रोंवाली, दिव्यस्वरूपा, बड़ी-बड़ी आँखोंवाली, आठ भुजाओं से युक्त और मस्तक पर अर्धचन्द्र को धारण किये है तो उन्होंने जान लिया कि सूक्ष्मा परा-प्रकृति ने ही अपनी लीला से उनके यहाँ अवतार ग्रहण किया है. मुने ! उन्होंने हर्षित होकर ब्राह्मणों को प्रचुर धन, वस्त्र और हजारों दुधार गौएँ प्रदान कीं. तत्पश्चात वे बन्धु-बान्धवों सहित शीघ्र ही कन्या को देखने पहुँचे।।8-11।।

गिरिराज को आया जानकर मेना ने उनसे कहा – राजन् ! अपनी कमलनयनी  पुत्री को देखिये, ये हम दोनों की तपस्या का फल है और सभी प्राणियों के कल्याण हेतु प्रकट हुई हैं. तब गिरिराज ने भी कन्या को देखकर उसे जगदम्बिका के रूप में जाना. भूमि पर सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक गद्गद् वाणी से वे देवी से कहने लगे।।12-14।।

हिमालय बोले – माता ! विशालाक्षी ! इस विलक्षण विचित्र रूप में आप कौन हैं? पुत्री ! मैं आपको नहीं जान पा रहा हूँ. मुझे यथावत् अपना वृत्तान्त बताइए।।15।। 

श्रीदेवी बोलीं – परमेश्वर शिव की आश्रिता मुझे पराशक्ति समझो. मैं सारी सृष्टि का संचालन करती हूँ तथा शाश्वत ज्ञान और ऎश्वर्य की मूर्त्ति हूँ. मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि की जन्मदात्री हूँ और सृष्टि, स्थिति, विनाश का विधान करने वाली मुक्तिदायिनी जगदम्बिका हूँ. मैं सबकी अन्तरात्मा के रूप में स्थित हूँ और संसार समुद्र से उद्धार करने वाली हूँ. मुझे नित्यानन्दमयी ब्रह्मरूपा नित्या महेश्वरी समझो. तात ! तुम दोनों की तपस्या से सन्तुष्ट होकर मैंने अपनी लीला से तुम्हारी पुत्री बनकर तुम्हारे घर में जन्म लिया है. तुम बहुत भाग्यशाली हो।।16-19।।

हिमालय बोले – माता ! आपने नित्या होकर भी कृपापूर्वक मेरे घर में पुत्री रूप से जन्म लिया है, यह मेरे अनेक जन्मों में किये पुण्यों का ही फल है तथा इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ. मैंने आपका यह रूप देख लिया. अब आप परात्पर भगवती का दिव्य शिवप्रियारूप मुझे कृपापूर्वक शीघ्र ही दिखायें. विश्वेश्वरी ! आपको नमस्कार है।।20।। 

श्रीदेवी बोलीं – पिताजी ! मैं आपको दिव्य चक्षु प्रदान करती हूँ, जिनसे मेरे ऎश्वर्यशाली रूप के दर्शन कर आप अपने हृदय का संशय मिटा लीजिए और मुझे ही सर्वदेवमयी समझिए।।21।।

श्रीमहादेवजी बोले – ऎसा कहकर गिरिराज हिमवान को दिव्य दृष्टि प्रदान कर जगदम्बा ने अपने अलौकिक माहेश्वर स्वरूप के दर्शन कराये।।22।।

उनका वह ज्योतिर्मय रूप करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त था, उनके मस्तक पर अर्ध चन्द्र की सुन्दर लेखा विराजमान थी. उनके हाथ में श्रेष्ठ त्रिशूल और मस्तक पर जटाएँ सुशोभित हो रही थीं. हजारों कालाग्नि की आभा के समान उनका रूप भयानक और उग्र था. उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे तथा उन्होंने सर्प का यज्ञोपवीत धारण कर रखा था. इस प्रकार व्याघ्रचर्म को धारण किए हुए तथा श्रेष्ठ सर्पों के आभूषण से सुशोभित उनके उस रूप को देखकर हिमवान बड़े चकित हुए।।23-25।। तब उनकी माँ मेना ने कहा कि मुझे अपना दूसरा रूप दिखाइए, तब जगदम्बा ने अपने उस माहेश्वर रूप को तिरोहित करके तत्क्षण ही दूसरा रूप प्रकट किया. 

मुनिश्रेष्ठ ! उन सनातनी विश्वरूपा जगदम्बा की आभा शरत्काल के चन्द्रमा के समान थी, सुन्दर मुकुट से उनका मस्तक प्रकाशमान था. वे हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए थीं. उनके तीन सुन्दर नेत्र थे. उन्होंने दिव्य वस्त्र, माला और गन्धानुलेप धारण कर रखा था. वे योगीन्द्रवृन्द से वन्दनीय थीं, उनके चरणकमल अति सुन्दर थे तथा अपने हाथ, पैर, आँख, मुख, सिर आदि दिव्य विग्रह से वे सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुए थीं. इस प्रकार के परम अद्भुत उस रूप को देखकर हिमवान ने अपनी कन्या को पुन: प्रणाम किया और विस्मयपूर्ण विकसित नेत्रों से उन्हें देखते हुए वे बोले – ।।26-30।।

हिमालय बोले – माता ! आपका यह श्रेष्ठ रूप भी परम ऎश्वर्य से सम्पन्न है, जिसे देखकर मैं चकित हूँ. मुझे तो कोई अन्य ही रूप दिखाइये. परमेश्वरी ! आप जिसकी आश्रय हैं, वह व्यक्ति निश्चय ही अशोच्य और धन्य है. माँ ! कृपापूर्वक मुझ पर अनुग्रह करें, आपको बारम्बार नमस्कार है।।31-32।।

श्रीमहादेवजी बोले – अपने पिता पर्वतराज के द्वारा ऎसा कहने पर जगदम्बा पार्वती ने अपने उस रूप को भी समेटकर एक दिव्य रूप धारण किया. नीलकमल के समान सुन्दर श्यामवर्ण एवं वनमाला से विभूषित उस रूप की चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे।।33-34।।उनके उस रूप को देखकर शैलराज हाथ जोड़कर अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूपा सर्वदेवमयी उन आदिशक्ति जगदम्बा का इस स्तोत्र से स्तवन करने लगे – ।।35-36।।

हिमालय उवाच 

मात: सर्वमयि प्रसीद परमेविश्वेशिविश्वाश्रये 

त्वं सर्वं नहि किंचिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे ।

त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्ति: परा 

किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया।।37।।

त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा 

पितृृणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका । 

हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा 

त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नम:।।38।।

रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया 

शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मात: सुदृप्तं तव ।

वाचा दुर्विषयं मनोSतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे 

भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहि माम् ।।39।।

उद्यत्सूर्यसहस्त्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया 

देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम् ।

उद्यत्कोटिशशांककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां 

भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननी देवि प्रसीदाम्बिके ।।40।।

रूपां ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं 

घोरं पंचमुखाम्बुजत्रिनयनैर्भीमै: समुद्भासितम् ।

चन्द्रार्धांकितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे 

भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननी त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके ।।41।।

रूपं शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं 

दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम् ।

दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे व्शिवे भक्तित: 

पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते।।42।।

रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं 

कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नांगदैर्भूषितम् ।

विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि 

भक्त्याहं प्रणतोSस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ।।43।।

मात: क: परिवर्णितुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं 

शक्तो देवि जगत्त्रये बहुगुणैर्देवोSथवा मानुष: ।

तत् किं स्वल्पमतिर्ब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयैर्गुणैर्नो

मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नम: ।।44।।

अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम । 

यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता।।45।।

धन्योSहं कृतकृत्योSहं मातस्त्वं निजलीलया ।

नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यत: ।।46।।

किं ब्रुवे मेनकायाश्च भाग्यं जन्मशतार्जितम् ।

यतस्त्रिजगतां मातुरपि माता भवेत्तव ।।47।।

 

उपरोक्त स्तोत्र का अर्थ – 

हिमालय बोले – माता ! आप प्रसन्न हों, आप परम शक्ति हैं, आपमें सब कुछ सन्निहित है, आप ही इस चराचर जगत की अधिष्ठात्री और परम आश्रय हैं. शिवे ! आप ही सब कुछ हैं, इस त्रिभुवन में आपके अतिरिक्त अन्य कोई तत्त्व विद्यमान नहीं है. आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा आप ही पराशक्ति हैं. आपकी अचिन्त्य लीला का वर्णन मैं कैसे करूँ? जिसका ब्रह्मादि भी पार नहीं पा सकते।।37।। विश्वेश्वरी ! आप ही स्वाहा रूप से सभी देवताओं की तृप्तिकारिका, स्वधा रूप से पितरों की तृप्ति का कारण और महादेवप्रिया हैं. आप ही हव्य और कव्य हैं. आप ही नियम, यज्ञ, तप और दक्षिणा हैं. आप ही स्वर्गादि लोकों को प्रदान करने वाली हैं तथा समस्त कर्मों का फल प्रदान करने में आप ही समर्थ हैं. महादेवी ! आपको प्रणाम है।।38।। 

माता ! जिस आपके परसे भी परतर सूक्ष्मतम रूप का योगिजन शुद्ध ब्रह्म के रूप में वर्णन हैं, शिवे ! वह आपका मोहक रूप मन और वाणी के लिए अगम्य तथा त्रैलोक्य का मूल कारण है. वरदायिनी भगवती ! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ. विश्वेश्वरी ! मेरी रक्षा करें।।39।। जगदम्बे ! आप सहस्त्रों उदीयमान सूर्यों के समान आभा वाली, आठ भुजाओं से युक्त, विशाल नेत्रों वाली एवं मस्तक पर चन्द्र रेखा से सुशोभित हैं तथा आप कल्याणकारिणी ने लीलापूर्वक स्वयं ही मेरे घर में जन्म लिया है. उदीयमान करोड़ों चन्द्रमाओं की शीतल कान्ति से युक्त नयनों वाली, त्रिनेत्रा, बालस्वरुपा आप भगवती जगन्माता को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों।।40।। 

शिवे ! आपका रूप चाँदी के पर्वत की कान्ति के समान उज्जवल है, आपने सर्पराज का सुन्दर आभूषण धारण किया है. दुर्जनों के लिए भय उत्पन्न करने वाले पाँच मुखकमलों और भयानक तीन नयनों से आप सुशोभित हैं. अर्धचन्द्र सहित जटाजूट को आपने मस्तक पर धारण कर रखा है. शरणदात्री विश्वजननी ! आपको भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ. अम्बिके ! आप प्रसन्न हों।।41।। भवानी ! कोटिशरच्चन्द्र के समान उज्जवल रूप और दिव्य वस्त्राभरणों से आप सुशोभित हैं. आपका जगन्मोहन रूप चार दिव्य भुजाओं से युक्त है, ब्रह्मादि समस्त देवगण आपकी स्तुति करते हैं. माता ! आपके चरणकमलों में मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों।।42।।

दुर्गे ! जलधर की आभायुक्त नवीन और खिले हुए कमल के समान उज्जवल नेत्रवाला आपका रूप अपनी कान्ति से विश्व को विमोहित करने वाला है. आपके मुख पर मुसकान सुशोभित है, आपके गले में वनमाला और अंगों पर रत्नजटित अंगद आदि आभूषण सुशोभित हो रहे हैं. जगत् का उद्धार करने वाली देवी ! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, अम्बिके ! कृपा करके आप प्रसन्न हों।।43।। जगदम्बे ! आपके विश्वात्मक रूप और गुण को सर्वात्मना वर्णन करने में तीनों लोकों में देवता अथवा मनुष्य कोई भी सक्षम नहीं है. फिर भी अल्पमति उसका कैसे वर्णन करूँ? आप अपने स्वाभाविक गुणों से मुझ पर दया करते हुए अपनी परम माया से मुझे मोहित न करें. विश्वेश्वरी! आपको नमस्कार है।।44।। 

आज मेरा जन्म और तप सफल हुआ, जो त्रिलोकजननी आप मेरी पुत्री के रूप में आयीं. माँ मैं धन्य और कृतार्थ हुआ, जो कि आपने नित्या प्रकृति होकर भी अपनी लीला से पुत्री भाव से मेरे घर में जन्म लिया. मैं मेना के भी भाग्य की क्या सराहना करूँ, जिन्हें अपने सैकड़ों जन्मों के अर्जित पुण्य के प्रभाव से त्रिलोक जननी की भी जननी होने का सौभाग्य मिला है।।45-47।। 

 

श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! इस प्रकार गिरिराज हिमालय के द्वारा प्रार्थना करने पर पर्वतराज पुत्री सहसा पूर्व के समान सुन्दर रूप में हो गयीं. मेना भी यह देखकर चकित हुईं और अपनी पुत्री को ब्रह्मस्वरुपिणी जानकर गद्गद वाणी से भक्तिपूर्वक ऎसा कहने लगीं – ।।48-49।।

मेनका बोलीं – माता जगदम्बिका ! मैं न तो आपकी स्तुति ही जानती हूँ एवं न भक्ति ही, फिर भी आप अपने करुणमय स्वभाव के कारण मुझ पर कृपा करती रहें. आप ही इस संसार की सृष्टि करती हैं. आप ही सभी कर्मों का फल प्रदान करती हैं. आप ही सभी का आधार हैं और आप ही सभी को व्याप्त करके स्थित रहती हैं।।50-51।। 

श्रीदेवीजी बोली – माता ! आपने और पिताजी ने उग्र तपस्या से मुझ परमेश्वरी को पुत्री रूप में पाने के लिए आराधना की थी. आप दोनों के उस तप का फल देने के लिए ही लीलापूर्वक मैंने नित्या प्रकृति होकर भी  हिमालय के द्वारा आपके गर्भ से जन्म लिया।।52-53।। 

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! तब गिरिराज हिमालय ने उन देवी को बारम्बार प्रणाम करके हाथ जोड़कर ब्रह्मविज्ञान (ब्रह्मविषयक अपरोक्षानुभूति संबंधी ज्ञान) की जिज्ञासा की।।54।।

हिमालय बोले – माँ आप बड़े भाग्य से मेरी पुत्री के रूप में आयी हैं, यह आपकी लीला ही है, क्योंकि आप ब्रह्मादि देवगण और योगियों के लिए भी अगम्य और दुर्लभ हैं. महेश्वरी ! मैं आपके चरणकमलों की शरण में हूँ. माँ ! चूँकि आप काल की भी काल हैं, इसलिए आपको लोग महाकाली कहते हैं. आप मुझे कृपापूर्वक उस उत्तम ब्रह्मविद्या की शिक्षा दें, जिससे मैं इस अपार संसार सागर को सरलतापूर्वक पार कर जाऊँ।।55-57।।

श्रीपार्वतीजी बोलीं – पिताजी ! महामते ! सुनिये, मैं उस योग का सार बताती हूँ, जिसके जानने मात्र से प्राणी ब्रह्मस्वरुप हो जाता है।।58।। सद्गुरु से मेरे मन्त्र को ग्रहण करके स्थिरचित्त हो साधक को शरीर, मन और वाणी से मेरा ही आश्रय ग्रहण करना चाहिए।।59।। मुमुक्षु उत्तम साधक को चाहिए कि वह मेरे में ही चित्त और प्राण को लगाये रखे, तत्परतापूर्वक मेरे नाम का जप करता रहे, मेरे गुण और लीला-कथाओं के श्रवण में लगा रहे, वह मुझसे वार्तालाप करने वाला हो और मुझसे शाश्वत संबंध बनाये रखे तथा राजेन्द्र ! वह उत्तम साधक मेरी भक्ति में परायण होकर अपना चित्त मेरी पूजा के प्रति अनुरक्त रखे।।60-61।।

उसे श्रुति तथा स्मृतियाँ बताये गये अपने वर्णाश्रम धर्म के अनुसार विधि-विधान से मेरी पूजा और यज्ञ आदि संपन्न करने चाहिए. सभी यज्ञ, तप और दान से मेरी ही अर्चना करनी चाहिए. ज्ञान से मुक्ति होती है और भक्ति से ज्ञान होता है. धर्म से भक्ति का उदय होता है और यज्ञ-यागादि धर्म के ही रूप है, इसलिए मोक्षार्थी को धर्मरूपी यज्ञार्चन आदि के लिए मेरे इस रूप का आश्रय लेना चाहिए।।62-64।।

पिताजी ! सभी आकारों में एकमात्र मैं ही विद्यमान हूँ और स्वर्ग के देवता मुझ सच्चिदानन्द रूपा के अंश से ही उत्पन्न हैं. इसलिए वेदोक्त सभी कर्मों से भक्तिपूर्वक मेरा ही अर्चन करना चाहिए. बुद्धिमान व्यक्ति को अन्य कोई विचार नहीं करना चाहिए ।।65-66।।

इस प्रकार अनासक्त भाव से कर्मों को संपन्न करके विशुद्ध अन्त:करण वाले मोक्षार्थी साधक को आत्मज्ञान की प्राप्ति में निरन्तर प्रयत्नशील होना चाहिए।।67।। पुत्र-मित्रादि से संबंधों में अनासक्त होकर वेदान्तादि शास्त्रों के अभ्यास में दत्तचित्त रहना चाहिए. ऎसे साधक को काम-क्रोधादि विकारों का तथा सभी प्रकार की हिंसा का पूर्णरूप से त्याग करना चाहिए. ऎसा करने से उसे नि:संदेह पराविद्या का ज्ञान प्राप्त हो जाता है. 

महाराज ! जब इस आत्मा की प्रत्यक्षानुभूति होती है, उसी क्षण मुक्ति हो जाती है. यह निश्चित सत्य बात आपके लिए मैं बता रही हूँ।।68-70।। किंतु पिताजी ! मेरी भक्ति से विमुख प्राणियों के लिए यह प्रत्यक्षानुभूति अत्यन्त दुर्लभ है. इसलिए मोक्षसाधकों को यत्नपूर्वक मेरी भक्ति में ही संलग्न रहना चाहिए।।71।। महाराज ! आप भी मेरे बताये अनुसार करेंगे तो संसार के समस्त दु:खों से कभी बाधित नहीं होगें।।72।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीभगवतीगीतोपनिषद में ब्रह्मविद्या-योगशास्त्र के अन्तर्गत श्रीपार्वती-हिमालय-संवाद में “विज्ञानयोगोपदेशवर्णन” नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।15।।