महाभागवत – देवीपुराण – नवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में सती का पिता के घर पहुँचना, माता प्रसूति द्वारा सती का सत्कार करना तथा यज्ञ-विध्वंस के भयंकर स्वप्न को सुनाना, दक्ष द्वारा शिव की निन्दा. क्रुद्ध सती द्वारा छाया सती का प्रादुर्भाव और उसे यज्ञ नष्ट करने की आज्ञा देकर अन्तर्धान हो जाना, छाया सती का यज्ञ कुण्ड में प्रवेश का वर्णन है. 

श्रीमहादेव जी बोले – [नारद !] इसके बाद सुन्दर वक्ष:स्थल तथा खुले हुए केशों वाली दक्षपुत्री भगवती सती रथ से उतरकर शीघ्रतापूर्वक अपनी माता के पास चलीं गई।।1।। अपनी पुत्री को बहुत दिनों बाद आया देखकर दक्षपत्नी प्रसूति उन्हें गोद में लेकर वस्त्र से उनका मुखकमल पोंछने लगीं और बार-बार उनका मुख चूमती हुई रो-रोकर कहने लगीं – ।।2½।।

माता ! सर्वदेवेश्वर सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करके आप सोचने योग्य नहीं रह गई हैं और आप हम लोगों को शोकरूपी महासागर में छोड़कर चली गईं. आप अत्यंत श्रेष्ठ, तीनों लोकों की माता तथा आदिशक्ति हैं. यह मेरा महान भाग्य है कि आप साक्षात् भगवती मेरे गर्भ से उत्पन्न हुई हैं. सती ! मेरे घर में कृपापूर्वक उपस्थित हुई आपको जो मैं देख रही हूँ, इससे बहुत दिनों से विद्यमान मेरा शोक आज दूर हो गया. आपके दुर्बुद्धि पिता भी परम शिव को न जानकर उनसे विशेष द्वेषभाव रखते हुए मोहवश महान यज्ञ कर रहे हैं. हमारे तथा विद्वान मुनियों के द्वारा अनेक तरह से कहे जाने पर भी इन्होंने न तो आपको और न ही परमेश्वर शिव को बुलाया।।3-7½।।

सती बोलीं – सभी देवताओं के देवता यज्ञेश्वर भगवान शिव का अपमान करके मेरे पिता समस्त देवताओं के साथ यज्ञ कर रहे हैं. कोई कुछ भी माने, किंतु मेरा तो ऎसा निश्चय है कि इस यज्ञ की समाप्ति निर्विघ्न नहीं हो सकेगी।।8-9½।।

प्रसूति बोलीं – मैंने रात में जो अत्यधिक भयानक, दारुण तथा अत्यन्त रोमांचक स्वप्न देखा है, उसे सुनो – ।।10½।।

उस महायज्ञ में जहाँ दक्षप्रजापति देवताओं के साथ स्थित थे, वहाँ कोई देवी महेश्वरी अकस्मात् आ गयीं. वे महान मेघों की कान्ति के समान श्यामवर्ण वाली थीं, उनके बाल खुले हुए थे, वे दिगम्बर थीं, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे अट्टहास कर रही थीं और जाज्वल्यमान तीन नेत्रों से प्रकाशित थीं. उन्हें देखकर दक्षप्रजापति आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने विनयपूर्वक कहा – “आप कौन हैं, किसकी पत्नी हैं और यहाँ क्यों आयी हैं? उन्होंने कहा – “क्या आप नहीं जानते कि मैं आपकी पुत्री सती हूँ.” इसके बाद दक्षप्रजापति ने शिव की निन्दा करते हुए बहुत तरह की बात कही. उसे सुनते ही वे बड़े क्रोध से यज्ञाग्नि में कूद पड़ी।।11-15।। 

उसके बाद भयानक कर्म करने वाले तथा भीषण आकार वाले करोड़ों प्रमथगण क्षण भर में ही वहाँ उपस्थित हो गए और फिर कालान्तक यमराज के समान महान उग्र कार्य करने वाला कोई महान पुरुष भी वहाँ आ गया. उसने विष्णु आदि प्रमुख देवताओं को जीतकर प्रमथगणों के साथ महायज्ञ का विध्वंस कर डाला और दक्षप्रजापति का सिर काट लिया. अब वे दक्ष प्रजापति मुखविहीन होकर यज्ञकुण्ड के किनारे पड़े रहे. कौपीन वस्त्र धारण किए तथा जटामुकुट से सुशोभित महान उग्र वाले वे सभी प्रमथगण क्रोधित होकर उन दक्ष प्रजापति को खाने को उद्यत हो गए. अपने समस्त अंगों में भस्म लपेटे तथा हाथों में शूल, पाश और खड्ग धारण किए हुए वे उनका रक्त पी रहे थे और हँस रहे थे. तब दक्ष के सभी नगरवासी ऎसा देखकर व्याकुल हो उठे और रोते हुए हाहाकार करने लगे।।16-21।।

तत्पश्चात ब्रह्माजी ने देवाधिदेव सदाशिव की विनयपूर्वक प्रार्थना करके उन्हें स्वयं बुलाकर कहा – “इन दक्ष प्रजापति को अवश्य ही जीवित कीजिए. विभो ! देवदेव ! इस यज्ञ का समापन कीजिए और मुझ पर प्रसन्न होइए,” उनकी वह बात सुनकर शिव की निन्दा किए जाने के कारण एक बकरे का सिर जोड़कर भगवान शिव ने दक्ष को जीवित कर दिया।।22-23½।।

रात के थोड़ा शेष रहने पर मैंने इस प्रकार का स्वप्न देखा था और आज वही श्यामवर्ण वाली तुम मेरे बगल में आई हुई हो. मैंने जैसा स्वप्न में देखा था, तुम वैसी ही दिखाई पड़ रही हो और दक्ष प्रजापति के विषय में जैसा देखा, वही होनेवाला है, क्योंकि जिस देवी को मैंने स्वप्न में देखा था, तुम्हें वैसी ही देख रही हूँ।।24-26।।माता ! क्या यह स्वप्न कभी विफल हो सकेगा? और शिवनिन्दा का समुचित फल प्राप्त कर वे दक्ष क्या अपनी मूर्खता का त्याग करेंगे? वे तत्त्वत: तुम दोनों को जानकर शीघ्र ही अपना द्वेष त्याग देंगे, पुत्री ! तुम चिरंजीवी होओ और तुम्हारी कभी भी कोई हानि न हो. यह वियोग स्वप्नमात्र ही हो, प्रत्यक्ष में तुम दोनों दीर्घायु प्राप्त करो. तुम जिसकी अपनी हो, वह निश्चय ही शोक करने योग्य नहीं है. वह धन्य है और भाग्यवान है. तुम कभी भी मेरा त्याग मत करना, क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ।।27-29½।।

श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार माता से सम्मान प्राप्त करके सती ने उन्हें प्रणाम किया तथा उनसे आज्ञा लेकर वे शीघ्र ही दक्षप्रजापति के पास चली गई।।30½।। उसी समय दक्ष के नगरवासी एकत्र होकर आपस में विचार करने लगे कि यह कैसा महान आश्चर्य है?।।31½।। सुवर्ण के समान गौर अंगों एवं शान्त रूपवाली सुन्दरी सती अब काले मेघ के समान वर्णवाली तथा भयंकर रूपवाली कैसे बन गयीं? इनके बाल खुले हुए हैं, ये भयानक दाँतों से युक्त हैं, क्रोध के मारे इनकी आँखें लाल-लाल हो गई हैं, इन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है और ये चार पराक्रमी भुजाओं से युक्त हैं. इस यज्ञ की देवसभा में इस तरह से इनका आगमन क्यों हुआ है?।।32-34।।

ऎसा मानता हूँ कि ये सम्पूर्ण जगत् को क्षणार्धमात्र में ग्रसित कर लेंगी. आज दक्षप्रजापति की न जाने क्या गति होगी? इनका अपमान करके ये दक्षप्रजापति देवताओं के साथ यज्ञ कर रहे हैं. निश्चय ही उसी का फल प्रदान करने के किए ये क्रुद्ध होकर आयी हुई हैं. संहार के समय जो ब्रह्मा तथा विष्णु का भी नाश कर देती हैं, वे ही ये यदि यज्ञ नष्ट कर दें तो विष्णु भी क्या कर सकेंगे?।।35-37।।

इसके बाद यज्ञशाला में आकर सती ने भगवान शिव के विद्वेषजनित हर्ष से परिपूर्ण उस दक्षप्रजापति को देखा. उन सती को देखते ही हव्य के भोक्ता देवता, ऋषि, बृहस्पति तथा अन्य देवगण भी भय से काँपने लगे. सभी देवता तथा महात्मागण अपना-अपना कार्य छोड़कर पट पर अंकित चित्र की भाँति स्थिर दृष्टि से उन पराशक्ति को देखने लगे. कुछ देवताओं ने दक्ष के भय से उस संहारकारिणी भगवती काली को प्रत्यक्ष प्रणाम कर लिया।।38-41।। तत्पश्चात दक्षप्रजापति ने पूर्वोक्त स्थिति वाले उन लोगों को देखकर सभी दिशाओं में दृष्टिपात करते हुए चारों ओर देखा।।42।। तदनन्तर दक्ष प्रजापति ने क्रोध से दीप्त नेत्रों वाली, खुले बाल वाली, वस्त्ररहित तथा काले धुएँ से निर्मित अंजनसमूह की कान्तिवाली उन भगवती काली को देखा।।43।।

दक्ष बोले – तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो तथा किसकी पत्नी हो? इस तरह निर्लज्ज होकर यहाँ क्यों आयी हो? तुम तो सती की तरह दिखाई पड़ रही हो. पुत्री ! क्या तुम मेरी पुत्री सती ही हो और शिव के घर से यहाँ आयी हो?।।44½।। 

सती बोलीं – पिताजी ! क्या आप अपनी इस पुत्री सती को नहीं पहचानते? आप मेरे पिता हैं और मैं आपकी पुत्री हूँ. आप पिता को मैं प्रणाम करती हूँ।।45½।।

दक्ष बोले – माता ! सती ! आप इस तरह कृष्णवर्ण की कैसे हो गई हैं. आप तो पहले मेरे घर में स्वर्ण के समान गौर अंगों वाली थीं, आपकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमा के समान थी और आप दिव्य वस्त्र धारण किए रहती थीं, वही आप आज निर्वस्त्र होकर मेरी सभा में क्यों आयी हुई हैं? आप इस तरह खुले बालों तथा भयानक नेत्रों वाली क्यों हो गई हैं? क्या अयोग्य पति पाने के कारण आप इस दशा को प्राप्त हैं? मैंने अपने यज्ञमहोत्सव में तुम्हें नहीं बुलाया, इसका कारण तुम्हारा शिवपत्नी होना है न कि तुम्हारे प्रति हमारे स्नेह आदि का अभाव. तुमने अच्छा किया जो स्वयं ही यहाँ चली आयी. तुम्हारे लिए वस्त्र, आभूषण आदि रखे हुए हैं, वह सब तुम ले लो. त्रैलोक्यसुन्दरी पुत्री सती ! तुम मेरे प्राण के समान प्रिय हो. सुन्दर नेत्रों वाली ! अयोग्य शंकर को पति के रूप में पाकर तुम बहुत ही दु:खित हो।।46-51½।।

शिव के प्रति दक्ष के द्वारा कहा गया यह निन्दा से परिपूर्ण वचन सुनकर क्रोध से प्रज्वलित समस्त अंगों वाली वे सती सोचने लगीं कि मैं मात्र आधे क्षण में सभी देवताओं तथा यज्ञ सहित अपने पिता को जलाकर राख कर सकती हूँ, किंतु पितृहत्या के भय से वैसा नहीं करूँगी. अपितु देवताओं के सहित इन्हें मोहित कर दे रही हूँ।।52-54।। इस प्रकार मन में विचार करने के बाद उन दक्षपुत्री सती ने क्षण भर में अपने ही समान रूप वाली एक छाया सत्ती की रचना कर दी।।55।। तब सती ने उस छाया सती से कहा – मेरी बात पर ध्यान दो. तुम मेरा एक काम कर दो, इस यज्ञ का विध्वंस कर डालो. सुलोचने ! मेरे पिता के साथ बहुत प्रकार की बातें करके तथा उनके मुख से शिव के प्रति अपमानजनक वाक्य सुनकर क्रोध से प्रज्वलित शरीर वाली तुम यज्ञाग्नि में प्रवेश कर जाना. 

मैं इसकी पुत्री हूँ – इसी से गर्वित होकर यह दक्ष शिव की निन्दा कर रहा है. इसलिए तुम शीघ्र ही दक्ष के उस गर्व को चूर-चूर कर दो. यज्ञाग्नि में तुम्हारे प्रविष्ट होने की बात सुनकर शोक से संतप्त हृदय वाले भगवान महेश्वर यहाँ निश्चित रूप से आयेँगे और सभी देवताओं तथा यज्ञ की रक्षा करने में संलग्न विष्णु को पराजित करके यज्ञ को नष्ट कर देंगे और पिता का वध कर डालेंगे।।56-60½।। छायाकाली से ऎसा कहकर मुसकान भरे मुख वाली महाकाली स्वयं अन्तर्धान होकर आकाश में स्थित हो गयीं।।61।। 

मुनिश्रेष्ठ ! उस समय भेरी, मृदँग और तुरही आदि बाजें बजने लगे, महोत्सव होने लगे और भारी पुष्पवर्षा होने लगी. उन देवी के निकट रहने पर भी उनकी माया से मोहित होने के कारण किसी देवता और महर्षि ने यह सब नहीं देखा।।62-63½।। इसके बाद छायासती ने क्रुद्ध होकर दक्षप्रजापति से कहा – तुम अज्ञानवश देवाधिदेव सनातन शिव तथा मुझ सती की निन्दा क्यों कर रहे हो? दुर्बुद्धि ! यदि कल्याण चाहते हो तो अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखो, अन्यथा महामूर्ख ! शिव की निन्दा करने वाली तुम्हारी इस जीभ को मैं काट दूँगी. जो तुम देवसभा में बहुत काल से परमेश्वर शिव की निन्दा करते रहे हो, उसका फल आज ही तुम्हें मिल जाएगा, ऎसा मुझे लगता है. जो मनुष्य सम्पूर्ण लोकों के एकमात्र कारण महेशान शिव की निन्दा करता है, वे परमात्मा सदाशिव उसका सिर काट देते हैं।।64-67½।।

दक्ष बोले – अल्प बुद्धिवाली बालिके ! मेरे सामने ऎसी बात फिर मत बोलना. श्मशान में रहने वाले उस दुराचारी को मैं जानता हूँ. दुर्मति ! तुमने स्वयं ही अपनी बुद्धि से भूतगणों के अधिपति शिव को पतिरूप में वरण किया है. अब उसी के पास जाकर अपने योग्य परम सुख प्राप्त कर रही हो. मैं प्रजापति दक्ष हूँ – ऎसा सभी देवताओं तथा देवियों को मालूम है. मेरे आगे तुम शिव की प्रशंसा क्यों कर रही हो, जिसे मैं सुन ही नहीं सकता।।68-70½।।

छायासती बोलीं – दक्ष मैं फिर कह रही हूँ कि यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो पापबुद्धि का त्याग कर दो और भक्तिपूर्वक भगवान सदाशिव की उपासना करो. यदि तुम पुन: अज्ञानवश परमात्मा शिव की निन्दा करोगे तो वे शम्भु निश्चित रूप से यज्ञसहित तुम्हें नष्ट कर डालेंगे।।71-72½।।

दक्ष बोले – कुपुत्री ! तुम बुरे चरित्रवाली हो, मेरे नेत्रों के सामने से हट जाओ. मेरे लिए तो तुम उसी समय से मत गई हो जब तुमने शिव को पतिरूप में प्राप्त किया था. तुम मुझे बार-बार अपने पति रुद्र की याद क्यों दिला रही हो? जिससे कि मेरे अंदर स्थित क्रोधाग्नि भूसी की आग की तरह बढ़ती जा रही है. कुपुत्री ! दुष्टबुद्धिवाली तुमने शिव को पति रूप में प्राप्त किया है. अत: तुम्हें देखने से मेरा शरीर शोकाग्नि से दग्ध हो रहा है. दूषित अन्त:करण वाली ! तुम शीघ्र ही मेरी आँखों से दूर हो जाओ. मेरे समक्ष अपने पति का गुणगान मत करो।।73-76½।।

श्रीमहादेवजी बोले – [नारद !] दक्ष के ऎसा कहने पर उन भगवती छायाकाली ने कोपाविष्ट होकर भयंकर रूप धारण कर लिया. उनके जाज्वल्यमान तीनों नेत्र अत्यन्त प्रकाशित थे, उनका मस्तक नक्षत्रलोक पहुँचा हुआ था, उनका मुख फैला हुआ था, पैरों तक लटकने वाले खुले हुए केशपाश से वे सुशोभित हो रही थीं, वे मध्यान्हकालीन हजारों सूर्यों की कान्ति से सम्पन्न थीं और प्रलयकाल के बादलों के समान प्रतीत हो रही थीं।।77-79।। 

 तत्पश्चात क्रोध से दीप्त अंगों वाली उन महेश्वरी ने बार-बार अट्टहास करके गंभीर वाणी में दक्ष से कहा – मैं केवल आपकी आँखों से ही दूर नहीं हो जाऊँगी, अपितु आप से उत्पन्न इस देह से भी अविलम्ब दूर हो जाऊँगी।।80-81।। इस प्रकार क्रोध से प्रदीप्त नेत्रों वाली छायासती सभी देवताओं के देखते-देखते यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयीं।।82।। उसके बाद पृथ्वी हिलने लगी, महाप्रचण्ड वायु बहने लगी और सूर्य को भेदकर बड़े-बड़े उल्कापिण्ड पृथ्वीतल पर गिरने लगे. सभी दिशाएँ विक्षुब्ध हो उठीं, मेघ रक्त बरसाने लगे, समस्त देवतागण विकृत वर्णवाले हो गए. यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझ गयी और सियार तथा कुत्ते यज्ञमण्डप में रखी हवनीय सामग्री खाने लगे. इस प्रकार वह यज्ञमण्डप मात्र आधे ही क्षण में श्मशान के रूप में परिवर्तित हो गया. इससे दक्षप्रजापति का मुख-मण्डल मलिन हो गया और वे बार-बार गहरी साँसें छोड़ने लगे. इसके बाद ब्राह्मणों ने जिस किसी तरह फिर से यज्ञ आरंभ किया।।83-86।।

मुने ! भगवान शिव के भय से देवता अत्यन्त घबराए हुए थे. सभी देवता तथा महर्षिगण आपस में कहने लगे कि यह अमंगलकारी बात क्षणभर में ही दूर तक फैल जाएगी और शिवजी आज ही सती के देहत्याग का समाचार सुन लेंगे. जगत का संहार करने वाले वे महाराज शम्भु क्रुद्ध होकर न जाने किसका क्या कर डालेंगे अथवा हो सकता है वे सृष्टि का ही लोप कर दें।।87-89।। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ महर्षि नारद सभा के बीच से चुपचाप उठकर शीघ्रतापूर्वक कैलास की ओर चल दिए।।90।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “छायासत्यग्निप्रवेश” नामक नवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।