महाभागवत – देवीपुराण – पहला अध्याय 

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श्रीगणेश जी को नमस्कार है।।

श्रीगणेश जी के चरण कमल के परागकण, जो देवेन्द्र के मस्तक पर विराजमान मन्दार-पुष्प के परागकणों के समान अरुणवर्ण के हैं, वे विघ्नों का नाश करें ।।1।। नारायण, नरश्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और व्यास जी को नमस्कार करके जय (पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थों) का पाठ करना चाहिए ।।2।। जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत के सृजनकर्ता हुए, भगवान विष्णु पालनकर्त्ता हुए तथा भगवान शिव संहार करने वाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और तत्त्वार्थ जानने वाले मुनिगण जिन्हें परा मूलप्रकृति कहते हैं – स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली उन जगज्जननी भगवती को मैं प्रणाम करता हूँ ।।3।। जिन्होंने स्वेच्छा से इस जगत की सृष्टि करके तथा स्वयं जन्म लेकर भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त किया और शम्भु ने कठोर तपस्या से जिन्हें पत्नी रूप में प्राप्त कर जिनका चरण अपने हृदय पर धारण किया, वे भगवती आप सबकी रक्षा करें ।।4।। 

एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि महर्षियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर सूत जी से पूछा – महामते ! अब आप स्वर्ग तथा मोक्ष का सुख प्रदान करने वाले उस पुराण का वर्णन कीजिए, जिसमें भगवती की उत्तम महिमा का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया गया है और जिसके यथाविधि श्रवण करने से दिव्य ज्ञान से रहित मनुष्यों में भी नवधा भक्ति उत्पन्न हो जाती है ।।5-7।।

सूतजी बोले – महाभागवत नामक इस अत्यन्त गोपनीय पुराण का वर्णन सर्वप्रथम भगवान शिव ने महात्मा नारद के लिए किया था ।।8।। पूर्वकाल में उसे फिर स्वयं भगवान व्यास ने भक्तिनिष्ठ महर्षि जैमिनि के लिए श्रद्धापूर्वक कहा था और फिर उसी को मैं आप लोगों से कह रहा हूँ. इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए तथा कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए. इसके श्रवण करने तथा पाठ करने में द्विज को जो पुण्य प्राप्त होता है, भगवान शिव भी सौ वर्षों में उस पुण्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं तो फिर मैं उसका वर्णन कैसे कर पाऊँगा? क्योंकि वह पुण्य़ असीम है ।।9-11।। यह सुनकर सभी ऋषिगण विस्मित एवं अत्यन्त हर्षित हुए. उन श्रेष्ठ मुनियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ सूत जी से पुन: कहा – ।।12।।

ऋषिगण बोले – मुनिवर ! जिस तरह से वह श्रेष्ठ पुराण इस पृथ्वी लोक में प्रकाशित हुआ, आप कृपा करके इसका यथार्थ रूप में वर्णन कीजिए.।।13।।

सूतजी बोले – समस्त धर्मशास्त्रों के वक्ता, सभी वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, ज्ञानसंपन्न, महान बुद्धि वाले, महामुनि भगवान महर्षि व्यास जी अठारह पुराणों की रचना करने पर भी किसी प्रकार से संतुष्ट नहीं हुए ।।14-15।। उन्हें चिन्ता हुई कि “यह महापुराण परम श्रेष्ठ है, जिससे बढ़कर दूसरा कुछ भी इस पृथ्वीतल पर नहीं है. भगवती का परम तत्त्व तथा विस्तृत माहात्म्य इसमें विद्यमान है, देवी तत्त्व से अनभिज्ञ मैं इसका वर्णन कैसे कर सकूँगा” – ऎसा सोचकर उनके मन में बड़ा क्षोभ हुआ. महाज्ञानी महेश्वर शिव जिनके तत्त्व को भली भाँति नहीं जानते हैं, जिनके परम तत्त्व को जान पाना अत्यन्त कठिन है – ऎसा विचारकर परम बुद्धिमान तथा दुर्गाभक्तिपरायण व्यासजी ने हिमालय पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की ।।16-19।।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तों से स्नेह रखने वाली भगवती शर्वाणी ने अदृश्य रूप से आकाश में स्थित होकर उनसे यह वचन कहा -।।20।। महामुने ! जहाँ ब्रह्मलोक में समस्त श्रुतियाँ विद्यमान थीं, आप वहाँ पर जाइए. वहाँ आप मेरे सम्पूर्ण परम तत्त्व को जान लेगें. वहाँ श्रुतियों के द्वारा मेरी स्तुति किए जाने पर मैं प्रकट होऊँगी और आपकी जो भी अभिलाषा होगी, उसे पूर्ण करूँगी।।21-22।। तदनन्तर भगवती की आकाशवाणी सुनकर महर्षि व्यास जी ब्रह्मलोक गये. वहाँ उन्होंने वेदों को प्रणाम करके पूछा – अविनाशी ब्रह्मपद क्या है? विनय से नम्र महर्षि का यह वचन सुनकर एक-एक करके सभी वेदों ने तत्काल मुनिश्रेष्ठ व्यास जी से कहा – ।।23-24।।

ऋग्वेद ने कहा – सभी प्राणी जिनके भीतर स्थित हैं और जिनसे सम्पूर्ण जगत प्रकट होता है तथा जिन्हें परम तत्त्व कहा गया है, वे साक्षात स्वयं भगवती ही हैं ।।25।।

यजुर्वेद ने कहा – सभी प्रकार के यज्ञों से जिनकी आराधना की जाती है, जिसके साक्षात हम प्रमाण हैं, वे एकमात्र भगवती ही हैं ।।26।।

सामवेद ने कहा – जो इस समग्र जगत को धारण करती हैं तथा योगिजन जिनका चिन्तन करते हैं और जिनसे यह विश्व प्रकाशित है, वे एकमात्र भगवती दुर्गा ही इस जगत में व्याप्त हैं ।।27।।

अथर्ववेद ने कहा – भगवती के कृपापात्र लोग भक्तिपूर्वक जिन देवेश्वरी का दर्शन करते हैं, उन्हीं भगवती दुर्गा को लोग परम ब्रह्म कहते हैं ।।28।।

सूतजी बोले – वेदों का यह कथन सुनकर सत्यवती पुत्र व्यास जी ने निश्चित रूप से मान लिया कि भगवती दुर्गा ही परम ब्रह्म है ।।29।। ऎसा कहकर उन वेदों ने महामुनि व्यास जी से पुन: कहा – जैसा हम लोगों ने कहा है, वैसा हम प्रत्यक्ष दिखाएँगे ।।30।। ऎसा कहकर सभी श्रुतियाँ सच्चिदानन्द विग्रहवाली, शुद्धस्वरूपा तथा सर्वदेवमयी परमेश्वरी का स्तवन करने लगीँ ।।31।।

वेदों ने कहा – दुर्गे ! आप सम्पूर्ण जगत पर कृपा कीजिए. परमे ! आपने ही अपने गुणों के द्वारा स्वेच्छानुसार सृष्टि आदि तीनों कार्यों के निमित्त ब्रह्मा आदि तीनों देवों की रचना की है, इसलिए इस जगत में आपको रचने वाला कोई भी नहीं है. माता ! आपके दुर्गम गुणों का वर्णन करने में इस लोक में भला कौन समर्थ हो सकता है ।।32।। भगवान विष्णु आपकी आराधना के प्रभाव से ही दुर्जय दैत्यों को युद्ध स्थल में मारकर तीनों लोकों की रक्षा करते हैं. भगवान शिव ने भी अपने हृदय पर आपका चरण धारण कर तीनों लोकों का विनाश करने वाले कालकूट विष का पान कर लिया था. तीनों लोकों की रक्षा करने वाली अम्बिके ! हम आपके चरित्र का वर्णन कैसे कर सकते हैं ।।33।। 

जो अपने गुणों से माया के द्वारा इस लोक में साकार परम पुरुष के देहस्वरूप को धारण करती हैं और जो पराशक्ति ज्ञान तथा क्रियाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं, आपकी उस माया से विमोहित शरीरधारी प्राणी भेदज्ञान के कारण सर्वान्तरात्मा के रूप में विराजमान आपको ही पुरुष कह देते हैं, अम्बिके ! उन आप महादेवी को नमस्कार है।।34।। स्त्री-पुरुष रूप प्रमुख उपाधि समूहों से रहित जो परब्रह्म है, उसमें जगत सृष्टि के निमित्त सर्वप्रथम सृजन की जो इच्छा हुई, वह स्वयं आपकी ही शक्ति से हुई और वह पराशक्ति भी स्त्री-पुरुष रूप दो मूर्त्तियों में आपकी शक्ति से ही विभक्त हुई है. इस कारण वह परब्रह्म भी मायामय शक्तिस्वरुप ही है. जिस प्रकार जल से उत्पन्न ओले आदि को देखकर मान्यजनों को यह जल ही है – ऎसा ध्रुव निश्चय होता है, उसी प्रकार ब्रह्म से ही उत्पन्न इस समस्त जगत को देखकर यह शक्त्यात्मक ब्रह्म ही है – ऎसा मन में विचार होता है और पुन: परात्पर परब्रह्म में जो पुरुषबुद्धि है, वह भी शक्ति स्वरुप ही है – ऎसा निश्चित होता है. 

जगदम्बिके ! देहधारियों के शरीर में स्थित षट्चक्रों (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र तथा आज्ञाचक्र) में ब्रह्मादि जो छ्: विभूतियाँ सुशोभित होती हैं, वे प्रलयान्त में आपके आश्रय से ही परमेशपद को प्राप्त होती है. इसलिए शिवे ! शिवादि देवों में स्वयं की ईश्वरता नहीं है, अपितु वह तो आप में ही है. देवि ! एकमात्र आपके चरणकमल ही देवताओं के द्वारा वन्दित हैं. दुर्गे ! आप हम पर प्रसन्न हों ।।35-37।।

सूतजी बोले – इस प्रकार श्रुतियों के द्वारा वेदवचनों से स्तुत की गई सनातनी जगदम्बा सती ने अपना स्वरुप दिखाया ।।38।। सभी प्राणियों के भीतर स्थित रहने वाली उन ज्योति स्वरुपिणी भगवती ने व्यास जी के संशय का नाश करने के लिए इच्छारूप धारण किया. उनकी आकृति हजारों सूर्यों की प्रभा से युक्त थी, करोड़ों चन्द्रमाओं की कान्ति से सुशोभित हो रही थी, हजारों भुजाओं से सम्पन्न थी, दिव्य शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित थी, दिव्य अलंकारों से शोभायमान थी एवं उनके शरीर पर दिव्य गन्धों का लेप लगा हुआ था, वे सिंह की पीठ पर विराजमान थीं और कभी-कभी शव पर सवार भी दिखाई पड़ती थी. ।।39-41।।

वे भगवती चार भुजाओं से सुशोभित थीं, उनके शरीर की प्रभा नवीन मेघ के समान थी, वे क्षण-क्षण में कभी दो, कभी चार, कभी दस, कभी अठारह, कभी सौ तथा कभी अनन्त भुजाओं से युक्त होकर दिव्य रूप धारण कर लेती थी ।।42-43।। वे कभी विष्णुरूप में होकर उनके वाम भाग में लक्ष्मी का रूप धारण करके विराजमान दिखाई पड़ती थीं, कभी राधासहित कृष्ण के रूप में हो जाती थीं, कभी स्वयं ब्रह्मा का रूप धारण करके उनके वाम भाग में सरस्वती के रूप में दृष्टिगत होती थीं और कभी शिव का रूप धारण कर उनके वाम भाग में गौरीरूप में स्थित हो जाती थीं. इस प्रकार उन सर्वव्यापिनी ब्रह्मस्वरुपिणी भगवती ने अनेक प्रकार के रूप धारण कर व्यास जी का संशय दूर कर दिया ।।44-46।।

सूत जी बोले – इस प्रकार पराशर पुत्र व्यासजी भगवती का दर्शन करके उन्हें परम ब्रह्म के रूप में जानकर जीवन्मुक्त हो गए ।।47।। तदनन्तर भगवती ने उनकी अभिलाषा जानकर उन्हें अपने चरणतल में स्थित कमल के दर्शन कराए. मुनि व्यास जी ने उस कमल के हजार दलों में परमाक्षरस्वरूप महाभागवत नामक पुराण को देखा. द्विजों ! तब सिर झुकाकर स्तुति करते हुए देवी को सादर प्रणाम करके कृतकृत्य होकर वे महर्षि व्यास जी अपने आश्रम चले गए ।।48-50।।  

उन्होंने भगवती के चरणों में स्थित कमल में परमाक्षर स्वरुप पवित्र महाभागवत पुराण का जिस रूप में दर्शन किया था, उसी रूप में उसे प्रकाशित किया. उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्वक मुझे वह पुराण सुनाया और मैंने उसे सुना तथा सम्यक रूप से हृदय में धारण किया. अब मैं स्नेह के कारण आप लोगों से उस पुराण का वर्णन करूँगा, आप लोग प्रयत्नपूर्वक इसे गुप्त रखियेगा ।।51-52।। हजारों अश्वमेधयज्ञ तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ इस महाभागवत पुराण की सोलहवीं कला के भी तुल्य नहीं हैं. इस प्रकार महापात की प्राणियों की भी रक्षा के लिए इस भूलोक में महाभागवतपुराण प्रकाशित हुआ ।।53-54।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीसूत-शौनक-वाक्य में “महाभागवतप्रकाशन” नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ।।

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https://chanderprabha.com/2020/01/26/mahabhagavat-devi-puran-dusra-adhyay/