महादेवी के विभिन्न स्वरूप

भगवती दुर्गा – Bhagawati Durga

विद्युतद्दामसमप्रभां   मृगपतिस्कन्धस्थितां  भीषणां

कन्याभि:       करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।

हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं     गुणं    तर्जनीं

बिभ्राणामनलात्मिकां   शशिधरां  दुर्गां  त्रिनेत्रां  भजे।।

अर्थ – मैं तीन नेत्रों वाली दुर्गा देवी का ध्यान करता हूँ, उनके श्री अंगों की प्रभा बिजली के समान है. वे सिंह के कन्धे पर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं. हाथों में तलवार और ढाल लिए अनेक कन्याएँ उनकी सेवा में खड़ी हैं. वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किए हुए है. उनका स्वरुप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं.

 

भगवती ललिता – Bhagawati Lalita

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां  माणिक्यमौलिस्फुरत्

तारानायकशेखरां      स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।

पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं   रक्तोत्पलं   बिभ्रतीं

सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्।।

अर्थ – सिन्दूर के समान अरुण विग्रह वाली, तीन नेत्रों से सम्पन्न, माणिक्य जटित प्रकाशमान मुकुट तथा चन्द्रमा से सुशोभित मस्तक वाली, मुस्कानयुक्त मुखमण्डल एवं स्थूल वक्ष स्थली वाली, अपने दोनों हाथों में से एक हाथ में मधु से परिपूर्ण रत्ननिर्मित मधु कलश तथा दूसरे हाथ में लाल कमल धारण करने वाली और रत्नमय घट पर अपना रक्त चरण रखकर सुशोभित होने वाली शान्त स्वभाव भगवती पराम्बिका का ध्यान् करना चाहिए.

 

भगवती गायत्री – Bhagawati Gayatri

रक्तश्वेतहिरण्यनीलधवलैर्युक्तां      त्रिनेत्रोज्ज्वलां

रक्तां रक्तनवस्त्रजं मणिगणैर्युक्तां कुमारीमिमाम्।

गायत्रीं  कमलासनां   करतलव्यानद्धकुण्डाम्बुजां

पद्माक्षीं च वरस्रजं च दधतीं हंसाधिरूढां भजे।।

अर्थ – जो रक्त, श्वेत, पीत, नील और धवल वर्णौं के श्रीमुखों से सम्पन्न हैं, तीन नेत्रों से जिनका विग्रह देदीप्यमान हो रहा है, जिन्होंने अपने रक्तवर्ण शरीर को नूतन लाल कमलों की माला से सजा रखा है, जो अनेक मणियों से अलंकृत हैं, जो कमल के आसन पर विराजमान हैं, जिनके दो हाथों में कमल और कुण्डिका एवं दो हाथों में वर तथा अक्षमाला सुशोभित है, उन हंस की सवारी करने वाली, कुमारी अवस्था से सम्पन्न भगवती गायत्री की मैं उपासना करता हूँ.

 

भगवती अन्नपूर्णा – Bhagawati Annapurna

सिन्दूराभां  त्रिनेत्राममृतशशिकलां   खेचरीं   रक्तवस्त्रां

पीनोत्तुंगस्तनाढ्यामभिनवविलसद्योवनारम्भरम्याम्।

नानालंकारयुक्तां सरसिजनयनामिन्दुसंक्रान्तमूर्तिं

देवीं पाशाड़्कुशाढ्यामभयवरकरामन्नपूर्णां नमामि।।

अर्थ – जिनकी अंग कांति सिन्दूर सरीखी हैं, जो तीन नेत्रों से युक्त, अमृतपूर्ण शशिकलासदृश, आकाश में गमन करने वाली, लाल वस्त्र से सुशोभित, स्थूल एवं ऊँचे स्तनों से युक्त, नवीन उल्लसित यौवनारम्भ से रमणीय, विविध अलंकारों से युक्त हैं, जिनके नेत्र कमल सदृश हैं, जिनकी मूर्ति चन्द्रमा को संक्रान्त करने वाली हैं, जिनके हाथ पाश, अंकुश, अभय और वरद मुद्रा से सुशोभित हैं, उन अन्नपूर्णा देवी को मैं नमस्कार करता हूँ.

 

भगवती सर्वमंगला – Bhagawati Sarvamangala

हेमाभां करुणाभिपूर्णनयनां माणिक्यभूषोज्ज्वलां

द्वात्रिंशद्दलषोडशाष्टदलयुक्पद्मस्थितां सुस्मिताम्।

भक्तानां धनदां वरं च दधतीं वामेन हस्तेन तद्

दक्षेणाभयमातुलुंगसुफलं श्रीमंगलां भावये।।

अर्थ – जिनकी कान्ति स्वर्णसदृश है है, जिनके नेत्र करुणा से परिपूर्ण रहते हैं, जो माणिक्य के आभूषणों से विभूषित, बत्तीस दल, षोडश दल, अष्टदल कमल पर स्थित, सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, भक्तों को धन देने वाली, बाएँ हाथ में वरद मुद्रा तथा दाएँ हाथ में अभय मुद्रा एवं बिजौरा नींबू का सुंदर फल धारण करने वाली है, उन श्रीमंगला देवी की मैं भावना करता हूँ.

 

भगवती विजया – Bhagawati Vijaya

शंखं चक्रं च पाशं सृणिमपि सुमहाखेटखड्गौ सुचापं

बाणं कह्लारपुष्पं तदनु करगतं मातुलुंग दधानाम्।

उद्यद्वालार्कवर्णां त्रिभुवनविजयां पंचवक्त्रां त्रिनेत्रां

देवीं पीताम्बराढ्यां कुचभरनमितां संततं भावयामि।।

अर्थ – जो अपने हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, पाश, अंकुश, विशाल ढाल, खड्ग, सुंदर धनुष – बाण, कमल पुष्प और बिजौरा नींबू धारण करती हैं. जिनका रंग उदय कालीन बाल सूर्य के सदृश है. जो त्रिभुवन पर विजय पाने वाली हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, जो पीताम्बर से विभूषित और स्तनों के भार से झुकी रहती हैं, उन विजया देवी की मैं निरन्तर भावना करता हूँ.

 

भगवती प्रत्यंगिरा – Bhagawati Pratyangira

श्यामाभां   च  त्रिनेत्रां  तां  सिंहवक्त्रां  चतुर्भुजाम्।

ऊर्ध्वकेशीं    च   सिंहस्थां  चन्द्रांकितशिरोरुहाम्।

कपालशूलडमरुनागपाशधरां      शुभाम्।

प्रत्यंगिरा    भजे   नित्यं   सर्वशत्रुविनाशिनीम्।।

अर्थ – जिनकी अंग कान्ति श्याम है, जिनके तीन नेत्र और चार भुजाएँ हैं, जिनका मुख सिंह के समान है, जिनके केश ऊपर उठे रहते हैं, जो सिंह पर आरुढ़ होती हैं, जिनके बालों में चन्द्रमा सुशोभित होते हैं, जो कपाल, शूल, डमरू और नागपाल धारण करती हैं तथा समस्त शत्रुओं का विनाश करने वाली हैं, उन मंगलकारिणी प्रत्यंगिरा का मैं नित्य भजन करता हूँ.

 

भगवती सौभाग्यलक्ष्मी – Bhagawati Saubhagya Lakshmi

भूयाद्भयो  द्विपद्माभयवरदकरा  तप्तकार्तस्वराभा

शुभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भिरासिच्यमाना।

रक्तौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढ्या

पद्माक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसति: पद्मगा श्री: श्रियै न:।।

अर्थ – जिन्होंने अपने दोनों हाथों में दो पद्म तथा शेष दो में वर और अभय मुद्राएँ धारण कर रखी हैं, तप्त कांचन के समान जिनके शरीर की कान्ति है, शुभ्र मेघ की सी आभा से युक्त दो हाथियों की सूँड़ो में धारण किए हुए कलशों के जल से जिनका अभिषेक हो रहा है, रक्तवर्ण के माणिक्यादि रत्नों का मुकुट जिनके सिर पर सुशोभित है, जिनके वस्त्र अत्यंत स्वच्छ है, ऋतु के अनुकूल चन्दनादि आलेपन के द्वारा जिनके अंग लिप्त हैं, पद्म के समान जिनके नेत्र हैं, पद्मनाभ अर्थात क्षीरशायी विष्णु भगवान के उर: स्थल में जिनका निवास है, वे कमल के आसन पर विराजमान श्रीदेवी हमारे लिये परम ऎश्वर्य का विधान करें.  

 

भगवती अपराजिता – Bhagawati Aparajita

नीलोत्पलनिभां  देवीं  निद्रामुद्रितलोचनाम्।

नीलकुंचितकेशाग्र्यां  निम्ननाभीवलित्रयाम्।

वराभयकराम्भोजां   प्रणतार्तिविनाशिनीम्।

पीताम्बरवरोपेतां    भूषणस्रग्विभूषिताम्।।

वरशक्त्याकृतिं  सौम्यां  परसैन्यप्रभंजिनीम्।

शंखचक्रगदाभीतिरम्यहस्तां     त्रिलोचनाम्।।

सर्वकामप्रदां  देवीं  ध्यायेत् तामपराजिताम्।।

अर्थ – जिनकी कान्ति नीलकमल सरीखी है, जिनके नेत्र निद्रा से मूँदे रहते हैं, जिनके केशों के अग्र भाग नीले और घुँघराले हैं, जिनकी नाभि गहरी और त्रिवली से युक्त है, जो कर कमलो में वरद है और अभय मुद्रा धारण करती हैं, शरणागतों की पीड़ा को नष्ट करने वाली हैं, उत्तम पीताम्बर धारण करती हैं, आभूषण और माला से विभूषित रहती है, जिनकी आकृति श्रेष्ठ शक्ति से युक्त और सौम्य है, जो शत्रुओं की सेना का संहार करने वाली हैं, जिनके हाथ शंख, चक्र, गदा और अभय मुद्रा से सुशोभित रहते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो समस्त कामनाओं को देने वाली हैं. उन अपराजिता देवी का ध्यान करना चाहिए.

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