ज्येष्ठ माह के व्रत तथा त्यौहार

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से तो ज्येष्ठ माह का कोई विशेष धार्मिक महत्व नहीं है लेकिन इस माह में गंगा दशहरा आता है इसलिए इस माह को ध्यान में रखा गया है. साथ ही इस माह में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है और इस भयंकर गर्मी में ही निर्जला एकादशी का व्रत भी आता है. इस निर्जला एकादशी का अत्यधिक महत्व होने से इस माह का कुछ महत्व बढ़ जाता है. इस एकादशी को श्रद्धालु लोगो द्वारा अत्यधिक दान-पुण्य किया जाता है विशेषकर पानी का दान बहुत किया जाता है.

 

ज्येष्ठ माह की गणेश जी की कथा – Story Of Lord Ganesha in Month Of Jyeshtha

प्राचीन समय में पृथ्वी पर पृथु नाम का राजा राज्य करता था और उसके राज्य में जयदेव नाम का एक ब्राह्मण रहता था. ब्राह्मण के चार पुत्र थे और चारों का ही विवाह हो चुका था. सबसे बड़ी पुत्रवधु गणेश चतुर्थी का व्रत करना चाहती थी. इसके लिए बहू ने अपनी सास से आज्ञा मांगी लेकिन सास ने मना कर दिया. जब भी बहू अपनी बात सास को कहती तो वह मना कर देती, इससे बहू परेशान सी रहने लगी. मन ही मन बहू अपने दुख को गणेश जी को सुनाती. बड़ी बहू का एक लड़का था जो अब विवाह योग्य हो गया था. गणेश जी ने अप्रसन्न होकर उस लड़के को चुरा लिया. जिससे घर में उदासी रहने लगी.

बड़ी बहूं ने एक बार फिर अपनी सास से विनती की – “माँ जी, यदि आपकी अनुमति हो तो मैं गणेश चतुर्थी का व्रत रख लेती हूँ. हो सकता है कि गणेश जी प्रसन्न होकर हम पर कृपा कर दें और हमारा बेटा वापिस आ जाए”. सभी जानते हैं कि बुजुर्गों का अपने नाती-पोतों से अत्यधिक स्नेह होता है इसलिए इस बार सास व्रत रखने की आज्ञा दे देती है. बहू गणेश चतुर्थी का व्रत रखती है इससे गणेश जी प्रसन्न होकर दुबले-पतले ब्राह्मण का वेश रखकर जयदेव के घर आ जाते हैं.

सास और बहू दोनो मिलकर श्रद्धा व प्रेम से उन्हें भोजन कराती हैं. गणेश जी ने अपनी कृपा देने के लिए ही ब्राह्मण का भेष बनाया था और अब उनके आशीर्वाद से बड़ी बहू का पुत्र घर वापिस आ जाता है.

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अचला (अपरा )एकादशी व्रत – Achala Or Apara Ekadashi Fast

अचला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है. इसे कई लोग अपरा एकादशी भी कहते हैं. इस व्रत को करने से ब्रह्महत्या, परनिन्दा, भूत योनि जैसे कर्मों से छुटकारा मिल जाता है. व्यक्ति को कीर्ति, पुण्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होती है.

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अचला एकादशी व्रत कथा – Story Of Achala Ekadashi Fast

प्राचीन काल में महीध्वज नाम का राजा राज करता था और वह बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का था. ठीक इसके विपरीत उसी का छोटा भाई वज्रध्वज बड़ी ही क्रूर प्रवृत्ति का अन्यायी तथा अधर्मी व्यक्ति था. बड़े भाई को वह अपना शत्रु समझता था. एक दिन अवसर मिलते ही वह अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर देता है और उसके शरीर को जंगल में पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ देता है. राजा की आत्मा अब पीपल के पेड़ पर वास करने लगती है और आते-जाते लोगों को सताना शुरु करती है.

एक दिन अचानक धौम्य ऋषि उस पीपल के पेड़ के नीचे से गुजरने लगे तो उन्हें अपने तपोबल से प्रेत के उत्पात का कारण पता चलता है और उसके जीवन के वृतांत को सुनकर परिस्थिति को समझते हैं. ऋषि प्रसन्न होकर प्रेत को पीपल के पेड़ से नीचे उतारकर परलोक विद्या का उपदेश देते हैं. अंत में ऋषि प्रेत योनि से मुक्ति के लिए अचला एकादशी का व्रत करने को कहते हैं. अचला एकादशी का व्रत करने से राजा दिव्य शरीर पाकर स्वर्गलोक को चला जाता है.

वट सावित्री व्रत – Vat Savitri Fast

इस व्रत को ज्येष्ठ माह की कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक किया जाता है अथवा पूर्णिमा तक भी कई स्थानों पर किया जाता है. ज्येष्ठ माह की अमावस्या को बड़ सायत अमावस के रुप में मनाया जाता है. इस दिन बड़(बरगद) के पेड़ की पूजा की जाती है. रोली, मौली, चावल, गुड़, भीगा हुआ चना, फूल, सूत, जल मिलाकर बड़ पर लपेटते हैं और चारों ओर चक्कर लगाते हैं. बड़ के पत्तों के गहने बनाकर पहने जाते हैं और बड़ सायत अमावस की कहानी कहीं व सुनी जाती है. भीगे हुए चनों में सामर्थ्यानुसार पैसे रखकर सीधा निकाला जाता है. फिर हाथ फेरकर सास के पैर छूकर सीधा दिया जाता है.

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वट सावित्री व्रत की कहानी – Story Of Vat Savitri Fast

भद्र देश में अश्वपति नाम का राजा राज्य करता था. इस राजा की कोई संतान नहीं थी. एक बार उसने बड़े-बड़े पंडितों को बुलाया और कहा, “मुझे संतान नहीं हुई है इसलिए आप मुझे ऎसा कोई उपाय बताएँ जिससे मुझे संतान सुख की प्राप्ति हो”. पंडित बोले, “हे राजन! आपकी कुण्डली में एक पुत्री योग है जो कि 12 वर्ष की आयु में विधवा हो जाएगी”. राजा ने कहा – “क्या मेरा नाम नहीं रहेगा?” राजा ने बहुत यज्ञ हवन आदि कराए. यज्ञ व होम करने से राजा की पत्नी गर्भवती हो गई तो पंडितों ने फिर कहा कि जिस दिन यह 12 वर्ष की हो जाएगी उसी दिन इसके विधवा होने का योग होगा. पंडितों ने राजा को सलाह दी कि आप अपनी बेटी से पार्वती जी की और बड़ सायत अमावस की पूजा नियमित रुप से कराना. राजा को कन्या की प्राप्ति हुई और उसने कन्या का नाम सावित्री रखा.

सावित्री बड़ी हुई तब उसका विवाह सत्यवान से करा दिया गया. सावित्री के सास-ससुर अंधे थे तो वह उनकी बहुत सेवा करती थी. सत्यवान जंगल से लकड़ियाँ तोड़कर लाया करता था. सावित्री को पता था कि जिस दिन वह 12 साल की होगी उस दिन उसके पति की मृत्यु निश्चित है. जिस दिन वह 12 वर्ष की हुई उस दिन पति से हाथ जोड़कर बोली कि “आज मैं भी आपके साथ चलूंगी”. सत्यवान ने कहा – “यदि तू मेरे साथ चलेगी तो मेरे अंधे माँ-बाप की सेवा कौन करेगा? अगर वह कहेगें तो मैं तुझे साथ ले चलूँगा”. फिर सावित्री अपने सास-ससुर के पास आई और बोली, “यदि आप कहें तो आज मैं जंगल देखने जाऊँ?” उसके सास-ससुर ने जाने की इजाजत दे दी.

जंगल में जाने के बाद सावित्री लकड़ी काटने लगी और सत्यवान पेड़ की छाया में सो गया. उस पेड़ में साँप रहता था और उसने सत्यवान को डस लिया. सावित्री मृत सत्यवान को देखकर उसका सिर गोदी में रख रोने लगी. महादेव जी और पार्वती जी वहीं से गुजर रहे थे. उनकी नजर जब सावित्री पर पड़ी तब पूछा कि पुत्री रो क्यों रही हो? सावित्री ने रोते हुए उनके पैर पकड़ लिए और बोली – “हे भगवान! आप मेरे पति को जीवित कर दो”. वे बोले कि आज बड़ सायत अमावस का दिन है तुम उसकी पूजा करोगी तो तुम्हारा पति जिन्दा हो जाएगा. यह सुनकर सावित्री ने बड़े ही प्रेम भाव से बड़ की पूजा की. बड़ के पत्तों के गहने बनाकर पहने तो वह पत्ते हीरे और मोती में बदल गए.

कुछ ही समय में धर्मराज का दूत आ गया और सत्यवान को ले जाने लगा. सावित्री ने उसके पैर पकड़ लिए. धर्मराज बोले कि तू वरदान माँग? सावित्री ने कहा कि मेरे माँ-पिता के पुत्र नहीं हैं, वे पुत्रवान हो जाएँ. धर्मराज बोले – सत्यवचन, हो जाएगा. फिर बोली – “मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उनके नेत्रों में प्रकाश भर दो”. धर्मराज ने तथास्तु कहा लेकिन सावित्री ने धर्मराज का पीछा नहीं छोड़ा. धर्मराज ने कहा कि अब तुझे और क्या चाहिए? सावित्री ने कहा – “मुझे सौ पुत्र हो जाएँ”. धर्मराज बोले – “तथास्तु” और फिर सत्यवान को ले जाने लगे. तब सावित्री ने कहा हे महाराज! आप मेरे पति को ले जाएंगे तो पुत्र कहां से होगे?

धर्मराज ने कहा कि हे सती तुझे सुहाग सुख नहीं था लेकिन बड़ सायत अमावस करने से और पार्वती जी की पूजा करने से तेरा पति जीवित हो जाएगा. उसके बाद ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि जब जेठ माह की अमावस आएगी तब सभी बड़ के पेड़ की पूजा करना और बड़ के पत्तों का गहना बनाकर पहनना और बायना निकालना.

कहानी के अंत में कहना कि हे महाराज! जैसे बड़ सायत अमावस ने सावित्री को सुहाग दिया उसी प्रकार सबको देना. जो भी इस कहानी को सुने या सुनाये उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करना. बड़ सायत अमावस को ही वट सावित्री, वट अमावस अथवा बड़ अमावस भी कहा जाता है.

गंगा दशहरा – Ganga Dussehra

ज्येष्ठ माह की शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन सुबह सवेरे गंगा स्नान करते हैं और गंगा जी में दूध तथा बताशे चढ़ाकर गंगा जी की पूजा की जाती है. इस दिन शिवलिंग की पूजा का भी विधान है.

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गंगा अवतरण की कथा – Story Of Holy River Ganga Landing

प्राचीन समय में अयोध्या में सगर नाम के राजा राज करते थे. उनकी दो रानियाँ थी केशिनी और सुमति. केशिनी से अंशुमान नामक पुत्र हुआ औए सुमति से साठ हजार पुत्र हुए. एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया. यज्ञ की पूर्त्ति के लिए एक घोड़ा छोड़ा. यज्ञ को भंग करने के इरादे से इन्द्र देव घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम में बांध आते हैं. राजा यज्ञ के घोड़े को ढूंढने के लिए अपने साठ हजार पुत्रों को भेजते हैं. घोड़े को ढूंढते हुए वह कपिल मुनि के आश्रम पहुंचते हैं और घोड़े को वहाँ बंधा पाते हैं. उस समय कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे, राजा के पुत्रों ने कपिल मुनि को चोर-चोर कहकर पुकारना शुरु किया. कपिल मुनि की तपस्या भंग हो गई और राजा के सारे पुत्र उनके क्रोध की अग्नि में जलकर भस्म हो गए.

केशिनी का पुत्र राजा की आज्ञा से अपने भाईयों को ढूंढता हुआ आश्रम पहुंचा जहाँ महात्मा गरुड़ ने उसके भाईयों के भस्म होने की बात बताई. गरुड़जी ने यह भी कहा कि यदि तुम अपने इन सभी भाईयों की मुक्ति चाहते हो तब गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर लाना होगा लेकिन अभी तुम अश्व को ले जाकर अपने पिता का यज्ञ पूर्ण कराओ, इसके बाद गंगा जी को धरती पर लाने का काम करना. अंशुमान यज्ञमंडप में घोड़े को ले जाता है और राजा सगर से सारी बात कहता है. महाराज सगर की मृत्यु के बाद अंशुमान गंगाजी को पृथ्वी पर लाने के लिए तप करते हैं लेकिन वह सफल नहीं होते. उनकी मृत्यु के पश्चात उनका पुत्र दिलीप भी गंगा जी को लाने के लिए तपस्या करता है लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिलती.

अंत में दिलीप के पुत्र भगीरथ गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में जाकर ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करते हैं. तपस्या करते-करते जब कई वर्ष बीत जाते हैं तब ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं और गंगा जी को पृथ्वी पर ले जाने का वरदान देते हैं. अब समस्या यह थी कि ब्रह्मा जी के कमण्डल से निकलने के बाद गंगा जी के वेग को कौन संभालेगा! ब्रह्माजी कहते हैं कि भूलोक पर भगवान शंकर के अतिरिक्त कोई नहीं है जो गंगा जी के वेग को संभाल सके. भगीरथ जी पैर के एक अंगूठे पर खड़े होकर भगवान शंकर की आराधना करते हैं. उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर गंगा जी के वेग को अपनी जटाओं में संभालने के लिए तैयार हो जाते हैं.

गंगा जी जब देवलोक से पृथ्वी की ओर बढ़ती हैं तब उनकी धारा को भगवान शंकर अपनी जटाओं में समेट लेते हैं और कई वर्षों तक गंगाजी को शिव की जटाओं से बाहर आने का मार्ग नहीं मिल पाता है. भगीरथ जी दोबारा शिवजी से विनती व आग्रह करते हैं तब वह गंगा जी को मुक्त करने के लिए तैयार हो जाते हैं. इस तरह से शव की जटाओं से छूटकर गंगा जी हिमालय की घाटियों में कल-कल करती हुई मैदानी इलाके की ओर बढ़ती हैं. जिस रास्ते से गंगा जी जा रही थी उसी राह में ऋषि जहनु का आश्रम था. तपस्या में विघ्न होता देख वे गंगा जी को पी जाते हैं. भागीरथ के प्रार्थना करने पर ऋषि अपनी जाँघ से गंगा जी को बाहर निकाल देते हैं. तभी से गंगा जी को जह्नपुत्री अथवा जाह्नवी भी कहा जाता है.

इस प्रकार अनेकों स्थलों को पार करती हुई जाह्नवी ने कपिल मुनि के आश्रम पहुंचकर सगर राजा के साठ हजार पुत्रों के भस्म अवशेषों को तारकर मुक्त किया. उसी समय ब्रह्माजी ने प्रकट होकर भगीरथ के कठिन तप तथा सगर के साठ हजार पुत्रों के अमर होने का वर दिया. साथ ही घोषित किया कि तुम्हारे नाम पर गंगा जी का नाम भागीरथी होगा. अब तुम जाकर अयोध्या का राज संभालो और ऎसा कहकर ब्रह्माजी अन्तर्ध्यान हो गए.  

निर्जला एकादशी – Nirjala Ekadashi 

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह की शुक्ल एकादशी को रखा जाता है. इस दिन सभी लोग निर्जल रहकर एकादशी का व्रत रखते हैं अर्थात जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है. यदि कोई व्यक्ति बिना खाए नहीं रह सकता है तब संध्या समय फलाहार करना चाहिए. इस निर्जल एकादशी को जल का दान करने के लिए मटके पानी से भरकर दिए जाते हैं. कई लोग जल का दान भी करते हैं. मटके में जल भरकर ढक्कन से ढकना चाहिए और ढक्कन में चीनी तथा दक्षिणा व फल अपनी सामर्थ्यानुसार रखने चाहिए. उसके बाद मंदिर अथवा ब्राह्मण को यह सब दान देना चाहिए. इसके अतिरिक्त अपनी श्रद्धानुसार दान करना चाहिए.

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निर्जला एकादशी की व्रत कथा – Story Of Nirjala Ekadashi Fast

प्राचीन समय में एक बार भीमसेन ने व्यास जी से कहा – “भगवन! युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्ती तथा द्रौपदी सभी एकादशी के दिन उपवास करते हैं तथा मुझसे भी व्रत रखने को कहते हैं लेकिन मैं कहता हूँ कि मैं भूख बर्दाश्त नही कर सकता. मैं दान देकर तथा वासुदेव भगवान की भक्ति करके उन्हें प्रसन्न कर लूंगा. बिना व्रत किए जिस तरह से हो सके मुझे आप एकादशी का व्रत करने का फल बताइए. मैं बिना काया क्लेश के ही व्रत करना चाहता हूँ”. इस पर वेद व्यास जी कहते है – “भीमसेन! यदि तुम्हे स्वर्गलोक प्यारा है तथा नरक से सुरक्षित रहना चाहते हो तव दोनों एकादशियों का व्रत रखना होगा”.

भीमसेन जी बोले – “हे देव! एक समय का भोजन करने से मेरी भूख शांत नहीं होगी क्योंकि मेरे उदर में वृक नामक अग्नि निरंतर जलती रहती है. पर्याप्त भोजन करने से भी मेरी क्षुधा शांत नहीं होती है. आप कृपया कर मुझे ऎसा व्रत बताएं जिसके करने मात्र से मेरा कल्याण हो जाए”. इस पर व्यास जी कहते हैं – “हे भद्र! ज्येष्ठ माह की एकादशी को निर्जल व्रत कीजिए. स्नान, आचमन में जल ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन अन्न बिलकुल ना ग्रहण करें. अन्नाहार लेने से व्रत खंडित हो जाता है. तुम जीवन पर्यन्त इस व्रत का पालन करो. इससे तुम्हारे पूर्वकृत एकादशियों के अन्न खाने का पाप समूल नष्ट हो जाएगा”.

व्यास जी कहते हैं – इस दिन “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गोदान करनी चाहिए. व्यास जी की आज्ञानुसार भीमसेन जी ने बड़े साहस के साथ निर्जला एकादशी का व्रत किया, जिसके परिणामस्वरुप प्रात: होते-होते वह संज्ञाहीन (मूर्छित) हो गए तब पांडवों ने गंगाजल, तुलसी, चरणामृत, प्रसाद देकर उनकी मूर्छा दूर की और तभी से भीमसेन पापमुक्त हो गए.  

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