राजयोग

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कई बार जब आप ज्योतिषी को कुंडली दिखाने जाते हैं तब “राजयोग“ शब्द उनके मुँह से सुनाई देता है. कुंडली की भाषा तो ज्योतिषी ही सही से समझ सकता है लेकिन इस शब्द से राजा जैसा योग तो समझ में आता ही है. प्राचीन मुनियों ने अनगिनत योगों की व्याख्या जन्म कुंडली में की है. उनमें से ही एक योग राजयोग है – राज + योग. राज देने वाला योग. इस योग के बनने में ग्रहों की युति शामिल होती है. जन्म कुंडली में केन्द्र स्थान को विष्णु स्थान कहा गया है और त्रिकोण भावों को लक्ष्मी स्थान कहा गया है. जब केन्द्र व त्रिकोण स्वामियों का कुंडली में परस्पर संबंध बनता है तब यह राजयोग बनता है. यदि जन्म कुंडली में कोई ग्रह एक साथ त्रिकोण व केन्द्र का स्वामी है तब उसे योगकारी ग्रह कहा जाता है जो व्यक्ति को अपनी दशा/अन्तर्दशा में अच्छे फल प्रदान करता है यदि वह शुभ स्थिति में है.

 

जन्म कुंडली में जब राजयोग में शामिल ग्रहों की दशा अथवा अन्तर्दशा आती है तब अनुकूल फलों की प्राप्ति होती है. त्रिकोणेश व केन्द्रेश का यह संबंध जन्म कुंडली में शुभ भावों में होना अधिक शुभ फल प्रदान करेगा लेकिन यही योग यदि बुरे भाव में बनता है तब कोई फल प्राप्त नहीं होगें. राजयोगकारी ग्रह जिस – जिस ग्रह के संपर्क में आता है शुभता देता है. यह ग्रह भौतिक सुख देने में सक्षम होते हैं. आइए देखे कि किस तरह से यह राजयोग बनते है –

 

1) यदि केन्द्र का स्वामी ग्रह त्रिकोण भाव में स्थित हो.

 

2) यदि त्रिकोण का स्वामी ग्रह केन्द्र में स्थित हो.

 

3) यदि केन्द्र व त्रिकोण के स्वामी ग्रहों का आपस में राशि परिवर्तन हो रहा हो.

 

4) यदि केन्द्र व त्रिकोण के स्वामी एक साथ युति कर रहे हों.

 

5) केन्द्र का स्वामी ग्रह, त्रिकोण के स्वामी ग्रह से दृष्ट हो.

 

6) त्रिकोण का स्वामी ग्रह केन्द्र के स्वामी से दृष्ट हो.

 

7) दोनो परस्पर एक – दूसरे को देख रहे हो.

 

8) राहु/केतु भी कई बार राजयोग देने वाले होते हैं यदि राहु केन्द्र में त्रिकोण के स्वामी के साथ हो.

 

9) राहु यदि त्रिकोण में केन्द्र के स्वामी के साथ स्थित हो.

 

10) राहु यदि केन्द्र या त्रिकोण के स्वामी के साथ एकादश भाव में स्थित हो. यही सब संबंध राहु के स्थान पर केतु से बन रहे हैं तब भी राजयोग बनता है.

 

जन्म कुंडली में 3,6,8,12 भावों को शुभ नहीं माना गया है. यदि राजयोग में शामिल ग्रहों का इन भावों से संबंध बन रहा है तब अनुकूल फलों की प्राप्ति नही होगी.

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