मंत्र जाप

भारतीय संस्कृति में मंत्र जाप की परंपरा पुरातन काल से ही चली आ रही है. मंत्र के जाप द्वारा आत्मा, देह और समस्त वातावरण शुद्ध होता है. छोटे से मंत्र अपने में असीम शक्ति का संचारण करने वाले होते हैं. इन मंत्र जापों के द्वारा ही व्यक्ति समस्त कठिनाईयों और परेशानियों से मुक्ति प्राप्त कर लेने में सक्षम हो पाता है. मंत्र शक्ति प्राण ऊर्जा को जागृत करने का प्रयास करती है. साधु और योगी इन्हीं मंत्रों के द्वारा प्रभु को प्राप्त करने में सक्षम हो पाते हैं. मंत्र गूढ़ अर्थों का स्वरुप होते हैं संतों ने मंत्र शक्ति का अनुभव करते हुए इन्हें रचा.

मंत्र जाप करते समय ध्यान योग्य बातें
मंत्र जाप में प्रयोज्य वस्तुओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए आसन, माला, वस्त्र, स्थान, समय और मंत्र जाप संख्या इत्यादि का पालन करना चाहिए. मंत्र साधना यदि विधिवत की गई हो तो इष्‍ट देवता की कृपा अवश्य प्राप्त होती है. मंत्र जाप करने से पूर्व साधक को अपन मन एवं तन की स्वच्छता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए. मन को एकाग्रचित करते हुए प्रभु का स्मरण करना चाहिए. जाप करने वाले व्यक्ति को आसन पर बैठकर ही जप साधना करनी चाहिए. आसन ऊन का,  रेशम का,  सूत, कुशा निर्मित या मृगचर्म का इत्यादि का बना हुआ होना चाहिए. मंत्र के प्रति पूर्ण आस्था होनी चाहिए. मंत्रों में शाबर मंत्र, वैदिक मंत्र और तांत्रिक मंत्र आते हैं. मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखना चाहिए.

मंत्र के प्रकार
मंत्र जाप तीन प्रकार से किया जाता है :- मन, वचन अथवा उपाशु.  मंत्रों को उच्चारण वाचिक जप कहलाता है, धीमी गति में जिसका श्रवण दूसरा नहीं कर पाता वह उपांशु जप कहलाता है और मानस जप जिसमें मंत्र का मन ही मन में चिंतन होता है. मंत्र पाठ करते समय मंत्रों का उच्चारण सही तरह से करना आवश्यक होता है तभी हमें इन मंत्रों का पूर्ण लाभ प्राप्त हो सकता है. मंत्रोच्चारण से मन शांत होता है, मंत्र जपने के लिए मन में दृढ विश्वास जरूर होना चाहिए तभी मंत्रों के प्रभाव से हम परिचित हो सकते हैं.

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