महाभागवत – देवी पुराण – सतासठवां अध्याय
भगीरथ बोले – पार्वतीनाथ, देवदेव,परात्पर,अच्युत, अनघ, पञ्चास्य, भीमास्य, रुचिरानन, ओंकारस्वरूप आपको नमस्कार है। व्याघ्राजिनधर, अनन्त, पारावारविवर्जित, पञ्चानन, महासत्त्व, महाज्ञानमय, प्रभु
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भगीरथ बोले – पार्वतीनाथ, देवदेव,परात्पर,अच्युत, अनघ, पञ्चास्य, भीमास्य, रुचिरानन, ओंकारस्वरूप आपको नमस्कार है। व्याघ्राजिनधर, अनन्त, पारावारविवर्जित, पञ्चानन, महासत्त्व, महाज्ञानमय, प्रभु
श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! देववन्दित पितामह ब्रह्माजी ने भगवती गंगा को भगवान् विष्णु के चरणकमल में स्थित जानकर अपने
श्रीनारद जी बोले – परमेश्वर ! आपने कृपापूर्वक महापापनाशक, पुण्यप्रद, धन्य करने वाला और दिव्य आख्यान मुझे सुनाया। मैंने जैसा
श्रीमहादेवजी बोले – कुछ समय बाद पुण्य चुनने वाली योगिनियाँ वहाँ आयीं। उन्होंने उन महापुरुषों से पूछा कि आप किस
श्रीमहादेवजी बोले – नारदजी ! कुछ देर मौन रहकर कमललोचन भगवान् विष्णु ने मीठी वाणी में देवराज इंद्र से कहा
श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! युद्ध में दुर्धर्ष वृत्रासुर का संहार करके ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर सभी देवगणों