कार्तिक माह माहात्म्य – आठवाँ अध्याय
जिसकी दया से सरस्वती, भाव रही उपजाय। कार्तिक माहात्म का ‘कमल’ लिखे आठवाँ अध्याय।। नारदजी बोले – अब मैं कार्तिक
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जिसकी दया से सरस्वती, भाव रही उपजाय। कार्तिक माहात्म का ‘कमल’ लिखे आठवाँ अध्याय।। नारदजी बोले – अब मैं कार्तिक
मंगलकारी श्री हरि का, सच्चा नाम ध्याऊं। कार्तिक मास माहात्म्य का, सातवाँ अध्याय बनाऊँ।। नारद जी ने कहा – हे
जिसके सुनने से सब पाप नाश हो जाये। कार्तिक माहात्म्य का, लिखूं छठा अध्याय।। नारद जी बोले – जब दो
प्रभु मुझे सहारा है तेरा, जग के पालनहार। कार्तिक मास माहात्म की, कथा करूँ विस्तार।। राजा पृथु बोले – हे
माता शारदा की कृपा, लिखूं भाव अनमोल। कार्तिक माहात्म का कहूं, चौथा अध्याय खोल।। नारदजी ने कहा – ऎसा कहकर
कार्तिक माह में दीपदान करने से स्त्रियों एवं पुरुषों द्वारा जन्म से लेकर अब तक अर्जित पाप कर्म नष्ट हो