श्रीमणिकर्णिकाष्टकम्
त्वत्तीरे मणिकर्णिके हरिहरौ सायुज्यमुक्तिप्रदौ वादं तौ कुरुत: परस्परमुभौ जन्तौ: प्रयाणोत्सवे। मद्रूपो मनुजोSयमस्तु हरिणा प्रोक्त: शवस्तत्क्षणात् तन्मध्याद् भृगुलाण्छनो गरुडग: पीताम्बरो निर्गत:।।1।।
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त्वत्तीरे मणिकर्णिके हरिहरौ सायुज्यमुक्तिप्रदौ वादं तौ कुरुत: परस्परमुभौ जन्तौ: प्रयाणोत्सवे। मद्रूपो मनुजोSयमस्तु हरिणा प्रोक्त: शवस्तत्क्षणात् तन्मध्याद् भृगुलाण्छनो गरुडग: पीताम्बरो निर्गत:।।1।।
जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जह्नु बालिका। बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि, त्रिपथगासि, पुन्यरासि, पाप-छालिका।।1।। अर्थ – हे भगीरथनन्दिनी! तुम्हारी
श्रीभगवानुवाच नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम:। कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम:।।1।। सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम:। पंचकृत्यविधात्र्यै
दशमयीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रम् श्रीकाली बगलामुखी च ललिता धूम्रावती भैरवी मातंगी भुवनेश्वरी च कमला श्रीवज्रवैरोचनी। तारा पूर्वमहापदेन कथिता विद्या स्वयं शम्भुना लीलारूपमयी च
{योगनिद्रास्तुति:} ऊँ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्। निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस: प्रभु:।।1।। अर्थ – जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण
वशिष्ठजी कहने लगे कि हे राजा दिलीप! बहुत से जन-समूह सहित अच्छोद सरोवर में स्नान करके सुखपूर्वक मोक्ष को प्राप्त