कार्तिक माह माहात्म्य – दूसरा अध्याय
सिमर चरण गुरुदेव के, लिखूं शब्द अनूप। कृपा करें भगवान, सतचितआनन्द स्वरूप।। भगवान श्रीकृष्ण आगे बोले – हे प्रिये! जब
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सिमर चरण गुरुदेव के, लिखूं शब्द अनूप। कृपा करें भगवान, सतचितआनन्द स्वरूप।। भगवान श्रीकृष्ण आगे बोले – हे प्रिये! जब
मैं सिमरूँ माता शारदा, बैठे जिह्वा आये। कार्तिक मास की कथा, लिखे ‘कमल’ हर्षाये।। नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी
कार्तिक माह में बहुत सी कहानियाँ कही जाती हैं लेकिन अब जो कहानी बताई जा रही है वह एक ही
उद्यद्भानुसहस्त्रकोटिसदृशां केयूरहारोज्ज्वलां विम्बोष्ठीं स्मितदन्तपड़्क्तिरुचिरां पीताम्बरालड़्कृताम्। विष्णुब्रह्मसुरेन्द्रसेवितपदां तत्त्वस्वरूपां शिवां मीनाक्षीं प्रणतोSस्मि सन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम्।।1।। मुक्ताहारलसत्किरीटरुचिरां पूर्णेन्दुवक्त्रप्रभां शिण्जन्नूपुरकिंकिणीमणिधरां पद्मप्रभाभासुराम्। सर्वाभीष्टफलप्रदां गिरिसुतां वाणिरमासेवितां।
रत्नै: कल्पितमासनं हिमजलै: स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदांकितं चन्दनम्। जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्।।1।।
जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे। यतो ब्रह्मादयो देवा: सृष्टिस्थित्यन्तकारिण:।।1।। नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे। नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।2।।