श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृत – श्रीहनुमत्पंचरत्न स्तोत्रम्

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इस स्तोत्र के जाप से पूर्व हनुमान जी के चित्र का इंतजाम कर लेना चाहिए क्योंकि उनके चित्र अथवा मूर्त्ति के सामने दीया जलाकर ही पाठ किया जाना चाहिए. स्वच्छ आसन ग्रहण कर के हनुमान जी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए. इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति के सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं. यदि किसी व्यक्ति को धन हानि अथवा व्यवसाय में परेशानी आ रही हो तब उसके लिए यह स्तोत्र अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा.

जब आदि शंकराचार्य जी द्वारा की गई हनुमान जी की सभी साधनाएँ निष्फल हो रही थी तब उन्होंने इस स्तोत्र की रचना की थी.

 

वीताखिलविषयेच्छं जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम्।

सीतापतिदूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम् ।।1।।

 

तरुणारुणमुखकमलं करुणारसपूरपूरितापांगम्।

संजीवनमाशासे मंजुलमहिमानमंजनाभाग्यम्।।2।।

 

शम्बरवैरिशराति गमम्बुजदलं विपुललोचनोदारम्।

कम्बुगलमनिलदिष्टं विम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे ।।3।।

 

दूरीकृतसीतार्ति: प्रकटीकृतरामवैभवस्फूर्ति: ।

दारितदशमुखकीर्ति: पुरतो मम भानुअहनुमतो मूर्ति: ।।4।।

 

वानरनिकराध्यक्षं दानवकुलकुमुदरविकरसदृशम्

दीनजनावनदीक्षं पवनतप: पाकपुंजमद्राक्षम्।।5।।

 

एतत् पवनसुतस्य स्तोत्रं य: पठति पंचरत्नाख्यम्।

चिरमिह निखिलान् भोगान् भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग् भवति ।।6।।

 

हनुमान जी ने शनि महाराज को रावण की कैद से आजाद किया था इसलिए हनुमान भक्तों पर शनि देव सदैव प्रसन्न रहते हैं. शनि देव को अनुकूल करने के लिए इस श्रीहनुमत्पंचरत्न स्तोत्रम का पाठ किया जाना चाहिए जिससे धन में वृद्धि होगी और साथ ही व्यवसाय भी दिनोदिन वृद्धि करेगा.

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