दशरथकृत शनैश्चराष्टकम
अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रमन्त्रस्य दशरथ ऋषिः। शनैश्चरो देवता। त्रिष्टुप् छन्दः। शनैश्चरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः। दशरथ उवाच कोणोन्तको रौद्र यमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः
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अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रमन्त्रस्य दशरथ ऋषिः। शनैश्चरो देवता। त्रिष्टुप् छन्दः। शनैश्चरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः। दशरथ उवाच कोणोन्तको रौद्र यमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः
राहु/केतु एक ही राक्षस था जिसका नाम स्वरभानु था. समुद्र मंथन के समय देवताओं को राक्षसों की सहायता लेनी पड़ी
राहु काल के समय में किसी नये काम को शुरु नहीं किया जाता है परन्तु जो काम इस समय से
भद्रा को कुछ कार्यों के लिए शुभ नहीं माना जाता है, लेकिन कुछ कार्य ऎसे भी हैं जिनमें भद्रा काल
यदि कोई काम आवश्यक है तो हरेक दिन गुलिक काल होता है जिसमें शुभ काम शुरु किए जा सकते हैं.
इस स्तोत्र का नियमित 11 बार रोज पाठ करने से शीघ्रातिशीघ्र कर्जों से छुटकारा मिल जाता है. विनियोग –