भद्रा काल विचार

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भद्रा को कुछ कार्यों के लिए शुभ नहीं माना जाता है, लेकिन कुछ कार्य ऎसे भी हैं जिनमें भद्रा काल को शुभ तथा ग्राह्य माना गया है. लेकिन यदि आवश्यकता पड़े तब भद्रा मुखकाल का त्याग कर उसके बाद के भाग का समय लिया जा सकता है. भद्राकाल में विवाह करना, बच्चे का मुंडन संस्कार कराना, गृहारंभ करना, गृह प्रवेश करना, रक्षा बंधन आदि काम निषेध अर्थात मना हैं.

प्राचीन शास्त्रों में कुछ ऎसे कार्यों का वर्णन भी है जिन्हें भद्रा काल में करने पर शुभ ही माना गया है. जैसे यज्ञ करना, शत्रु का उच्चाटन करना, अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करना, स्त्री प्रसंग में, स्नान करना, मुकदमा करना, आप्रेशन करना, अग्नि लगाना, किसी वस्तु को काटना, भैंस, घोड़ा, ऊँट, संबंधी कामों को करना अच्छा माना गया है.

 

भद्रा के परिहार पर विचार

वैसे तो विवाह आदि शुभ कर्म का करना भद्रा काल में निषेध ही माना गया है तभी सामान्य परिस्थितियों में विवाह आदि शुभ मुहूर्तों में भद्रा काल का त्याग किया जाता है, लेकिन कभी – कभी आवश्यकता पड़ने पर भद्रा काल को भी विशेष परिस्थितियों में ले लिया जाता है. ऎसे में भूलोक की भद्रा को छोड़कर और भद्रा मुख का त्याग कर भद्रा पुच्छ में शुभ काम किए जा सकते हैं.

एक अन्य मतानुसार अति आवश्यकता पड़ने पर रात्रि में तिथि के पूर्वार्द्ध की भद्रा, दिन में परार्ध की भद्रा को शुभ काम में ग्रहण किया जा सकता है.

 

भद्रा परिहार

कुछ और आवश्यक परिस्थितियों में भद्रा दोष का परिहार हो जाता है.

“तिथि पूर्वार्धजा भद्रा दिवा भद्रा प्रकीर्तिता । तिथिरूत्तरजा भद्रा रात्रिभद्रेति कथ्यते ।।

दिवा भद्रा रात्रौ रात्रिभद्रा यदा दिवा । तदाविष्टिकृतो-दोषो न, भवेत्सर्वं सौख्यद: ।।”

उपरोक्त कथन का अर्थ है कि तिथि के पूर्वार्द्ध भाग में प्रारंभ भद्रा अर्थात तिथि दिवस के पूर्वार्ध भाग में प्रारंभ भद्रायादि तिथ्यंत में रात्रिव्यापिनी हो जाए तो यह भद्रा दोषरहित हो जाती है अर्थात ऎसी भद्रा में कोई दोष नहीं होता है और यह सुखदायिनी हो जाती है.

पीयूषधारा के मतानुसार दिन की भद्रा रात में और रात की भद्रा दिन में आ जाए तो भद्रा दोषरहित हो जाती है और उसमें किसी तरह की अशुभता नहीं रहती है.

एक अन्य मतानुसार उत्तरार्ध की भद्रा दिन में और पूर्वार्द्ध की भद्रा रात्रि में शुभ होती है और ऎसी भद्रा का विचार विवाहादि शुभ कामों में किया जा सकता है.

 

भद्रा लोक वास

जब चंद्रमा मेष, वृष, मिथुन अथवा वृश्चिक राशि में होता है तब भद्रा स्वर्ग लोक में होती है. चंद्रमा का गोचर जब कन्या, तुला, धनु अथवा मकर राशि में होता है तब भद्रा का वास पाताल लोक में होता है. चंद्रमा जब कर्क, सिंह, कुंभ अथवा मीन राशियों में रहता है भद्रा का वास भू-लोक अर्थात पृथ्वी पर होता है इसलिए इसे इस समय में अशुभफल दायिनी और वर्जित माना जाता है. अन्य लोकों में इसे शुभ माना गया है.

 

भद्रा वास

लोक वास चंद्र राशि भद्रा मुख
स्वर्ग मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक उर्ध्वमुखी
पाताल कन्या, तुला, धनु, मकर अधोमुखी
पृथ्वी कर्क, सिंह, कुंभ, मीन सम्मुख

शुक्ल पक्ष की भद्रा का नाम वृश्चिकी माना गया है, तो कृष्ण पक्ष की भद्रा का नाम सर्पिणी है. मतान्तर से दिन की भद्रा को कुछ विद्वानों ने सर्पिणी माना है और रात की भद्रा को वृश्चिकी माना है. बिच्छू का विष डंक में अर्थात पीछे की ओर होता है और सांप का विष उसके मुख में होता है इसलिए वृश्चिकी भद्रा की पुच्छ और सर्पिणी भद्रा का मुख विशेष रुप से त्याज्य माने गए हैं.

भद्रा दोष, मंगल शनिवार जनित दोष, व्यतीपात, अष्टम भावस्थ एवं जन्म नक्षत्र दोष, मध्यान्ह के बाद शुभकारक मानी गई है.

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