कार्तिक स्नान का विधि-विधान
कार्तिक स्नान आश्विन माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अगले माह कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है. इस
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कार्तिक स्नान आश्विन माह की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अगले माह कार्तिक माह की पूर्णिमा पर समाप्त होता है. इस
शिव उवाच श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् । येन मन्त्रप्रभावेण चण्डिजाप: शुभो भवेत् ।।1।। अर्थ – शिवजी बोले – देवी! सुनो,
श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् । सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।1।। नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् । यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ।।2।।
अपराजिता की बेल दो प्रकार की पाई जाती हैं – नीले फूल वाली और सफेद फूल वाली. दोनों ही बेलों
सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकांकुशं वरप्रदाभयप्रदम् । चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजंगमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ।।1।। अर्थ – जो सुवर्ण के समान उज्जवल वर्ण
ऊँ भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजन्ना: । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ँ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायु:।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा