कामाक्षी माहात्म्यम
स्वामिपुष्करिणीतीर्थं पूर्वसिन्धुः पिनाकिनी। शिलाह्रदश्चतुर्मध्यं यावत् तुण्डीरमण्डलम् ।।1।। मध्ये तुण्डीरभूवृत्तं कम्पा-वेगवती-द्वयोः। तयोर्मध्यं कामकोष्ठं कामाक्षी तत्र वर्तते ।।2।। स एव
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स्वामिपुष्करिणीतीर्थं पूर्वसिन्धुः पिनाकिनी। शिलाह्रदश्चतुर्मध्यं यावत् तुण्डीरमण्डलम् ।।1।। मध्ये तुण्डीरभूवृत्तं कम्पा-वेगवती-द्वयोः। तयोर्मध्यं कामकोष्ठं कामाक्षी तत्र वर्तते ।।2।। स एव
कुंभ पर्व के स्नान का हिन्दु धर्म में बहुत महत्व माना गया है लेकिन यह पर्व क्यों आरंभ हुआ और
राहु/केतु एक ही राक्षस था जिसका नाम स्वरभानु था. समुद्र मंथन के समय देवताओं को राक्षसों की सहायता लेनी पड़ी
पीताम्बर: पीतवपु: किरीटी, चतुर्भुजो देवगुरु: प्रशान्त: । दधाति दण्डं च कमण्डलुं च, तथाक्षसूत्रं वरदोsस्तु मह्यम ।।1।। नम: सुरेन्द्रवन्द्याय देवाचार्याय
जो व्यक्ति वास्तव मे ज्योतिष के विषय की पारखी नजर रखता है वो महर्षि पराशर के नाम से अवश्य परिचित