कलियुग के पराशर

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जो व्यक्ति वास्तव मे ज्योतिष के विषय की पारखी नजर रखता है वो महर्षि पराशर के नाम से अवश्य परिचित होता है. बिना पराशरी ज्योतिष के ज्योतिष विज्ञान एकदम अधूरा है. उनके अलावा बहुत से विश्व विख्यात ज्योतिषी हुए हैं लेकिन ऋषि पराशर की ज्योतिष विज्ञान को एक बहुत बड़ी देन है.

इस कलयुग में जिस व्यक्ति ने ज्योतिष की जरा सी भी जानकारी पा ली ना तो बस बेचारा स्वयं को पराशर महाराज से कम बिलकुल भी नहीं समझता है. एक कहावत बहुत मशहूर है कि नीम हकीम खतरा ए जान. यही हाल इन आधुनिक पराशरों का होता है. कुंडली इनके हाथ में आनी चाहिए फिर तो उस कुंडली की माँ – बहन एक कर दी जाती है. गलती से अगर ज्योतिष की पढ़ी हुई कोई बात कुंडली में नजर आ जाए फिर तो बस नजारा देखने वाला होता है. ये आधुनिक पराशर ये नहीं देखते कि कुंडली के बाकी योग क्या कह रहे हैं या जो बात आप देख रहे है क्या उसी बात की पुष्टि वर्गों में भी हो रही है? इन्हें तो पूरी तरह से वर्ग भी नहीं पता होते कि यह किस चिड़िया का नाम होता है. वर्गों के नाम पर केवल नवांश कुंडली का पता होता है लेकिन वह भी पूर्ण रुप से कम्प्यूटर पर निर्भर करते हैं.

आपको यह बाते मैं हवा में ही नहीं बता रही हूँ. ये मेरा अपना अनुभव है जो मैंने ज्योतिष सीखने के बाद देखा. भारतीय विद्या भवन से ज्योतिष आचार्य करने के बाद हमारी छ: माह की रिसर्च क्लास आदरणीय गुरु के.एन. राव जी ने ली. जब हमारी क्लास होती थी तब उन्होने बहुत सी बाते सिखाई. उन्होने कहा कि आप लोग आरंभ में यदि 100 कुंडलियों में से 20 कुंडली भी सही देखते हैं तो बहुत अच्छा काम करते हैं और दूसरी बात मुझे उनकी जो बहुत अच्छी लगी वह यह थी कि आप लोग कुंडलियों को देखे और भविष्यवाणी करें. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ………गलत ही होगी ! तब मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी.

मेरा एक मित्र है जो दिल्ली के एक जाने माने आफिस में लाईव एस्ट्रोलोजी सर्विस में काम करता था. मैंने उसे कहा कि तुम मेरी नौकरी अपने यहाँ लगवा सकते हो? उसने अपने बॉस से बात की. जैसे तैसे करके मैंने इन्टरव्यू पास किया. इन्टरव्यू में जो पूछा गया वो कुंडली मैने सही नहीं देखी लेकिन उन्होंने वर्ग कुंडली और ग्रहों के उच्च नीच की बात पूछी वह सब मुझे अच्छी तरह पता थी तो मेरा सलेक्शन हो गया. मुझे बहुत खुशी भी हुई और बहुत डर भी लगा कि कैसे बात करुंगी………आफिस में फोन उठाते ही कम्प्यूटर की तरह बोलना आरंभ करना पड़ता था. लेकिन मैने फोन भी उठाया और पूरे विश्वास के साथ बात भी की. मेरे मस्तिष्क में केवल एक ही बात थी जो के.एन. राव सर ने कही थी कि आप लोग कुंडलियाँ देखना आरंभ करें. मैने यही सोचा कि अगर फोन करने वाला मुझसे संतुष्ट नहीं होगा तो क्या हुआ दुबारा किसी और से बात कर लेगा लेकिन वास्तव में मेरे रिजल्ट बहुत अच्छे रहे. कई लोग थे जो मुझसे संतुष्ट थे और रोज एक बार बात जरुर करते थे.

ओहो !!!! इस आफिस में मैने देखा कि अरे यहाँ तो थोक में ज्योतिषी उपलब्ध हैं और लोग इन पर विश्वास करके इन्हें फोन कर रहे हैं ………बाप रे ! ये लोग बाद में उनका भद्द्दा मजाक उड़ाते थे और किस कद्र वाहियात बातें करते थे जो शब्दों में कहना शायद कठिन हो. अधिकतर व्यक्तियों ने अपने आफिस के साथ गद्दारी करके कॉलर के साथ पर्सनल सैटिंग्स कर रखी थी. लोगों की भावनाओं को भुनाना इन्हें बहुत ही अच्छे से आता था और सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी समस्या ऎसी नहीं थी जिसका उपाय इन कलियुगी पराशरों के पास ना हो……….व्यक्ति बहुत ही विश्वास के साथ अपनी बात बताता है पर उसकी धज्जियाँ उड़ाना मर्यादा के खिलाफ समझना चाहिए. यहाँ एक बात अच्छी यह थी कि कॉल करने वाला और कॉल सुनने वाला दोनों ही एक – दूसरे को बिलकुल भी नहीं जानते थे और ना ही कभी शक्ले देख सकते थे इसलिए कॉलर बिना किसी खौफ के हर तरह से अपना दिल खोल के रख देते थे. हर त्तरह के प्रश्न पूछे जाते थे. सभी का जवाब देना अनिवार्य था.

सबसे नाजुक प्रश्न यहाँ प्रेम प्रसंगों को लेकर थे और उससे भी खतरनाक बेडरुम सीन. यही एक दुखती रग थी जिसे हमारे ज्योतिषी दबाने से बाज नहीं आते थे. सबसे ज्यादा तो हद पार तब हो हुई जब हमारी कम्पनी किन्हीं अन्य व्यक्तियों के हाथों में चली और उन्होंने सैलरी देना अपनी इज्जत के खिलाफ समझा. कम से कम सैलरी पर नए ज्योतिषियों की भर्ती आरंभ हो गई. एक दिन मेरे कान में कुछ शब्द पड़े मुझे उन्हें सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि स्वयं को ज्योतिषी कहने वाला व्यक्ति यह भी नहीं जानता कि “अस्त”शब्द क्या है? और वक्री ग्रह किसे कहते है? जानते है कि वह क्या कह रहा था? वह कह रहा था कि आपकी कुंडली में सूर्य वक्री और अस्त है. इसी कारण आपके कार्य नहीं बन रहे हैं. अब मुझे लगा कि यदि मैं कुछ दिन और यहाँ रही तो मैं पागल हो जाऊंगी. बस मैने एक – दो दिन के बाद ही अपना रिजाईन दे दिया.

इसी दौरान मैने एक लड़्के से बात की. मैने पूछा कि तुमने ज्योतिष कहाँ से सीखी (इस लड़के की उम्र मुश्किल से बीस वर्ष भी नहीं थी और पढ़ाई ना के बराबर थी.) अन्य लड़को की तुलना में यह कुछ तमीजदार था. इसने मुझे सभी कुछ सच बताया. इसने एक अन्य आफिस का जिक्र किया पर मै उस आफिस का नाम यहाँ नहीं लुंगी. (मै जानती हूँ उस आफिस को भी) इसने बताया कि पिछले आफिस का मालिक महज 15 दिन में एक व्यक्ति को कुशल ज्योतिषी बना देता है और वह कम उम्र के लड़को ही पकड़ता है क्युंकि वह दिन – रात एक करके “मिनट” बनाकर देते हैं. (कॉलर जो फोन कॉल करते हैं उसका मूल्य 9 रुपए पर मिनट होता है) उसने कहा कि हमारा बॉस केवल मोटे तौर पर पूछने वाली बातों को रटा देता है. दशा कैसे देखते हैं? ग्रह कौन से हैं? केवल बोलना सीखा देता है कि कॉल कैसे खींचनी है! बस देखते ही देखते बिजनेस शुरु. लोगों की भावनाओं को बेचने और खरीदने का बिजनेस…..

वोडाफोन में नौकरी करने वाले लोग बहुत वर्षों से नौकरी करते चले आ रहे थे. उनका एक मायाजाल सा बिछा हुआ था. कई पुराने लड़के ऎसे थे कि कॉल करने वाली लड़कियाँ उन्हीं से बात करना चाहती थी. हद तो तब पार हो गई जब मुझे पता चला कि बहुत से लड़को ने कई अमीर लड़कियों को पटा रखा था. वह उनसे बाते करते – करते उन्हीं से इनवॉल्व हो गई थी. कई व्यक्तियों ने एक से अधिक लड़कियों से शारीरिक संबंध तक स्थापित कर रखे थे. उन्होने कोई भी मौका चूकने नहीं दिया. हर तरह से लाभ उठाने का प्रयास किया. इसी कारण इन सभी कलियुगी ज्योतिषियों के मस्तिष्क में एक बात बहुत गहरी बैठी हुई थी कि सभी महिलाएँ एक सी होती हैं. लेकिन यह लोग भूल रहे थे कि उनकी भावनाओं को उकसाने का काम किसने किया ! उसका जिम्मेदार कौन है ! यदि यह आग को हवा नहीं देगें तो वह भड़केगी नहीं ! लेकिन नहीं ये तो अपना घर खर्च चलाने के लिए किसी भी सीमा को पार कर सकते थे. नैतिक जिम्मेदारी क्या होती है……….इन्हें पता ही नहीं था. मुझे तो संदेह था कि “नैतिक” शब्द कभी इन्होने सुना भी हो !!!!!

शायद स्वर्गलोक से ऋषि पराशर भी इन आधुनिक पराशरो को देख कर परेशान हो रहे हो और सोच रहे हो कि ये काश मैने यह विद्या जन – जन तक ना पहुंचाई होती ………………!

 

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  1. Rahul Deo कहते हैं:

    Aap kya kalyugi Jyotish nahi hain.

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