बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ संक्रान्तिजन्मशान्त्यध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 92वें अध्याय में संक्रान्ति समय में जन्मे जातकों की ग्रह शान्ति के विषय में बताया गया है। आइए विस्तार से जानें। 

 

पराशर उवाच – श्लोक 1,2,3,4 का अर्थ 

पराशर बोले – बालक के जन्मसमय व्यतीपात, वैधृति संक्रान्ति हो तो परम अशुभ है। संक्रान्ति से ठीक संक्रान्ति समय से 16 घड़ी पहले व इतनी ही घड़ियाँ, बाद तक समझें। संक्रान्ति शान्ति में नवग्रहों का यज्ञ करके शान्ति विधान करें, तब कुछ भी दोष नहीं होता। अन्यथा दारिद्रय की अधिकता होती है। रविवारादि क्रम से जिस वार को संक्रान्ति हो, तब उस संक्रांति के नाम क्रमशः घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मंदाकिनी, मिश्रा, राक्षसी होते हैं। इनमें भयंकर नाम वाली संक्रान्ति विशेष दोषदायिनी है।

 संक्रान्ति समय में उत्पन्न जातक दुःख व दरिद्रता का भागी होता है। सर्वत्र अलक्ष्मी व अश्री को प्राप्त करके मृत्यु जैसे परम अनिष्ट का भागी भी हो सकता है। 

विशेष – संक्रांति का जो समय पंचांग में दिया होता है, वह सूर्य केंद्र का अगली राशि में जाने का समय है। इसके आसपास अधिक कुप्रभाव माना जाता है। इस केंद्रस्पर्श समय में 6 घंटे 24 मिनट घटाने से संक्रान्ति का आरम्भ व इतने ही घंटे जोड़ने से समाप्तिकाल आता है। इसी आधार पर पुण्यकाल का निश्चय किया जाता है।

 

श्लोक 5,6,7,8 का अर्थ 

घर में पूर्व दिशा में गोबर से लीपकर, सुसज्जित मंडप में पाँच द्रोण तोल से धान, ढाई द्रोण तिल से तीन ढेर बनाएं। पृथक, तीन अष्टदल कमल बनाकर, पुण्याहवाचन करके, आचार्य का ववरण करें। आचार्य, धर्मज्ञ, मंत्रशास्त्री व शान्ति कार्य का विशेषज्ञ होना चाहिए। आचार्य को वरण में पांच वस्त्र या पाँच भूषण, रेशमी वस्त्र व अंगूठी अवश्य दें। 

चौथा वारुण कलश अलग से ईशान कोण में स्थापित करें। 

 

घटस्थापन विधि – श्लोक 9,10,11 

इन तीनों धान्य राशियों पर बिना छेद के सुन्दर कलश स्थापित करें। उनमें तीर्थजल, मृत्तिका, औषधियाँ, पांच रत्न, पंचगव्य, पल्लव आदि लगाकर जोड़ा वस्त्रों से लपेटें। कलश के ऊपर बारीक वस्त्र से लपेटकर एक-एक पात्र भी रखें। उन पात्रों में वक्ष्यमाण देवताओं की मूर्त्तियाँ स्थापित करें। सूर्य को अधिदेव के रूप में व् चन्द्रमा की मूर्त्ति प्रत्यधिदेव के रूप में स्थापित करें। 

श्लोक 12 का अर्थ 

कुल तीन स्थापित कलशों में अगल-बगल के दो कलशों पर सूर्य व् चन्द्रमा की मूर्त्ति रखकर पूजें तथा मध्य कलश में संक्रान्ति का पूजन करें। पूजन के उपरान्त उन्हें यथाशक्ति 2-2 वस्त्र भेंट करें या रक्त सूत्र, कलावे से ही वस्त्र युग्मों को अर्पण करें। सभी शान्ति कार्यों में सामर्थ्य होने पर लोभ करना अनुचित है तथा कार्य साधन की हानि होती है। 

 

श्लोक 13,14,15,16,17,18,19,20 का अर्थ 

सूर्य, चन्द्रमा के मन्त्रों से व्याहृति पूर्वक (ॐ भूर्भुवः स्वः) अर्थात तीनों व्याहृतियों से युक्त अपने-अपने मन्त्रों से पूजा करें। 

प्रधान प्रतिमा की पूजा ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादि मंत्र से करें। सूर्य की पूजा के लिए ‘उत्सूर्य’ इत्यादि मंत्र का प्रयोग करें। चन्द्रमा की पूजा में पूर्वोक्त ‘आप्यायस्व’ इत्यादि मंत्र का प्रयोग करें। 

सब पूजा षोडशोपचार या पंचपचार से करें। नैवेद्य गुड़ युक्त समर्पित करें। तत्पश्चात प्रधानदेव की पूजा हेतु उसकी प्रतिमा को स्पर्श करते हुए ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ मंत्र का 1008 या 108 या 28 बार जप करें। 

पश्चात ‘आनोभद्रा: क्रतवो’ इत्यादि पूर्वोक्त मंत्र का जप करें। 

तत्पश्चात पुरुषसूक्त का जप करके पुनः त्र्यम्बकं मंत्र का जप करें। अथवा चार ब्राह्मण चारों दिशाओं में बैठकर कलशों का स्पर्श करते हुए बारी-बारी से या समवेत रूप से कर लें। 

कलशों में पश्चिम में स्थण्डिल (रेत की वेदी) पर अग्नि प्रज्वलित करें। तब सब देवताओं के मंत्रों से 108 या 28 घी की आहुतियाँ दें। मृत्युंजय मंत्र के हवन में तिल की आहुतियाँ दें। 

सूर्य मंत्र – 

उत्सूर्यो बृहदर्चीष्यश्रेत पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम। 

समो दिवा ददृशे रोचमान: क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत।।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

श्लोक 21,22, 23,24 का अर्थ 

इसके बाद ‘समुद्रज्येष्ठा:’ इत्यादि सूक्त से ‘आपोहिष्ठामयो भुवः’ इत्यादि तीन ऋचाओं से, ‘अक्षिभ्यामित्यादी’ सूक्त से ‘पवमान सूक्त’ से त्र्यम्बकं, मंत्र से ‘उत्सूर्य’ इत्यादि मंत्र से ‘आप्यायस्व’ इत्यादि मंत्र से, ‘सुरास्त्वामभिर्षिचतु’ इत्यादि पौराणिक मंत्रों से यजमान का सपत्नीक अभिषेक करें। 

छायापात्र दान घी से करें। गोदान, वस्त्रदान, सुवर्णदान, 100 ब्राह्मणों को मीठा भोजन कराएँ। इस प्रकार शान्ति विधान करने से मनुष्य सब प्रकार के दोष से मुक्त होता है।