
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 91वें महर्षि पराशर ने भद्रा, तिथिक्षय, व्यतीपात आदि दुर्योगों की शान्ति के उपाय बताये हैं, आइए जानें।
पराशर बोले – श्लोक 1,2,3 का अर्थ
अब मैं भद्रा (विष्टिकरण), तिथिक्षय, व्यतीपात आदि पूर्वोक्त दुर्योगों में जन्म होने के अशुभ फल की निवृत्ति हेतु शान्ति विधि कहता हूँ। ऐसे योगों में जन्म होने पर बुद्धिमान दैवज्ञ को शान्ति विधान के लिए अवश्य बताना चाहिए। शान्ति के लिए शुभ दिन, शुभ लग्न में देव पूजन व ग्रहों का यज्ञ करना चाहिए।
(वैधृति, व्यतीपात आदि क्रांतिसाम्य योगों व संक्रांति जन्म में शान्ति की विधि विशेषतया अगले अध्याय में बताई गई है)
श्लोक 4,5,6,7 का अर्थ
भद्रा, तिथिक्षय व अन्य दुर्योगों (कुलिक, मृत्यु आदि)में गाय के घी से शिवालय में दीपदान करें। शंकरजी का अभिषेक, पीपल के वृक्ष की पूजा के बाद 108 प्रदक्षिणाएँ पुनः गणपति सूक्त, पुरुषसूक्त, सूर्य सूक्त, मृत्युंजय मंत्र का यथाशक्ति जप करके शान्ति पाठ करें, तब मृत्यु का निवारण होता है।
उसके बाद विष्णु भगवान् के मंत्र से 108 आहुतियाँ दें। यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराएँ।
यदि उक्त दुर्योगों के साथ गण्ड नक्षत्र, लग्न गण्ड, तिथि गण्ड या मूल अश्लेषा नक्षत्र भी पड़े तो विशेष शान्ति करानी चाहिए। (मूल शान्ति के साथ ही यह शान्ति विधान भी करें।)
गाणपत्य सूक्त में ‘गणानां त्वा गणपतिं हवामहे’ इत्यादि गणेश मंत्रों एवं ‘नमो गणेभ्यो’ आदि का पाठ करें।
पुरुष सूक्त रुद्राष्टाध्यायी का द्वितीय अध्याय है। मृत्युंजय मंत्र पहले कह चुके हैं। शान्ति पाठ में ‘द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष शांति:’ इत्यादि शान्ति पाठ या रुद्री का शान्त्यध्याय पढ़ें।
सौरसूक्त रुद्राष्टाध्यायी का ‘विभ्राड बृहतपिबतु’ इत्यादि अध्याय है। इसमें 14 मंत्र हैं। अथवा ऋग्वेदीय ‘सवितृ सूक्त’ का पाठ करें। विष्णु मंत्र ‘इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम’ इत्यादि मंत्र या ‘विष्णो रराटमसि विष्णो’ इत्यादि है।
रुद्राभिषेक में ‘नमस्ते रुद्र मन्यव’ इत्यादि 16 यजु: मंत्रों का प्रयोग करें। रुद्रिय पंचमाध्याय में ये मन्त्र हैं। इन्हीं का नाम रुद्रसूक्त भी है।
