
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 86 में महर्षि पराशर ने पूर्व जन्म के शापों का जो फल व्यक्ति विशेष को मिलता है, उन सभी योगों का वर्णन किया है। आइए जानें :-
भातृशाप – श्लोक 51,52,53,54
51) अब मैं भातृशाप से सन्ताहीनता कहता हूँ। इन योगों में प्रयत्नपूर्वक शान्ति करनी चाहिए।
52) तृतीयेश पंचम में मंगल व राहु के साथ हो, लग्नेश, पंचमेश अष्टम में हों।
53) लग्न व पंचम भाव में मंगल व शनि हो तथा नवम में तृतीयेश हो और गुरु अष्टम में हो।
54) तृतीय भाव में गुरु नीचगत हो, पंचम में शनि, अष्टम में चंद्र मंगल हो।
उपरोक्त इन योगों के कारण संतान नहीं हो पाती है।
श्लोक 55,56,57,58 का अर्थ
55) लग्न के दोनों ओर पाप ग्रह हों, पंचम भाव भी पाप मध्य में हो। लग्नेश, पंचमेश अष्टम भाव में हो।
56) लग्नेश, अष्टम में हो, पंचम में मंगल व अष्टम में पापयुक्त पंचमेश हो।
57) दशमेश तृतीय भाव में हो, नवम भाव में पापग्रह हो, पंचम में मंगल हो।
58) पंचम में मिथुन या कन्या राशि हो तथा पंचम में शनि राहु हों। द्वादश में बुध मंगल हों।
उपरोक्त इन योगों में भ्रातृशाप से पुत्रहीनता होती है।
श्लोक 59,60,61 का अर्थ
59) लग्नेश तृतीय में, तृतीयेश पंचम में व लग्न,तृतीय,पंचम में पापग्रह हों।
60) तृतीयेश अष्टम में, पंचम में गुरु हो तथा बृहस्पति, राहु शनि से युत/दृष्ट हो।
61) अष्टमेश पंचम में, तृतीयेश के साथ हो तथा अष्टम में शनि व मंगल हो तो भ्रातृशाप से पुत्र नहीं होता है।
शापमुक्ति का उपाय – श्लोक 62,63,64
62) भ्रातृशाप से मुक्त होने के लिए हरिवंश पुराण का श्रवण शालग्राम के सामने, चांद्रायण व्रत करें। अथवा
63) पीपल के वृक्ष की स्थापना व पूजा करें तथा दस गायों या दशमहाधेनु का दान करें। साथ ही पुत्रेच्छुक व्यक्ति पत्नी के हाथ से भूमि का दान करे।
64) इस प्रकार धर्मपत्नी सहित जो उपरोक्त उपायों को करता है, उसे अवश्य ही पुत्र होता है उसकी वंशवृद्धि होती है।
मातुल शाप योग – श्लोक 65,66,67,68 का अर्थ
65) पंचम भाव में बुध, गुरु, मंगल व राहु एक साथ हों, लग्न में शनि हो।
66) लग्नेश, पंचमेश पंचम भाव में बुध, मंगल, शनि के साथ हो।
67) पंचमेश अस्त हो, लग्न/सप्तम भाव में शनि हो, लग्नेश व बुध साथ हों।
68) चतुर्थेश लग्न में द्वादशेश के साथ हो, पंचम में चंद्र, बुध व मंगल हों।
इन उपरोक्त योगों में मामा के शाप से पुत्र नहीं होता है।
शाप का उपाय – श्लोक 69,70
इस दोष की शान्ति के लिए विष्णु भगवान् की प्रतिमा की स्थापना करें। बावड़ी, कुंआ, प्याऊ अथवा किसी भी प्रकार से सार्वजनिक जलस्थान बनवाएं। परोपकार के लिए पुल बनवाना चाहिए। तब पुत्र व सम्पति की वृद्धि होती है।
ब्रह्म (ब्राह्मण) शाप योग – श्लोक 71,72,73,74,75 का अर्थ
71) जो व्यक्ति बल के गर्व से ब्राह्मणों का अपमान करता है, तब ब्रह्म शाप के कारण संतान नहीं होती।
72) राहु 9/12 राशि में हो, पंचम में गुरु, मंगल व शनि हों, नवमेश अष्टम में हो।
73) नवमेश पंचम में, पंचमेश अष्टम में गुरु, मंगल व राहु के साथ हो।
74) नवमेश नीच राशि में हो, द्वादशेश पंचम में हो, राहु से युक्त या दृष्ट हो।
75) गुरु नीच राशि में हो, राहु लग्न में या पंचम में हो, पंचमेश 6/8/12 में हो।
इन उपरोक्त योगों में ब्रह्मशाप से संतान नहीं होती है।
श्लोक 76,77,78 का अर्थ
76) पंचमेश होकर गुरु अष्टम में पापयुक्त हो अथवा पंचमेश सूर्य चंद्र के साथ हो।
77) शनि के नवांश में शनि के साथ गुरु व मंगल हों तथा पंचमेश द्वादश में हो।
78) लग्न में शनि व गुरु हो, नवम में राहु हो, अथवा द्वादश में गुरु हो।
उपरोक्त इन योगों से संतान नहीं होती है।
शाप निवारण विधि – श्लोक 79,80,81 का अर्थ
ब्रह्मशाप के निवारण के लिए चांद्रायण व्रत करना चाहिए और उसके बाद तीन प्रायश्चित ब्रह्मकूर्च करके दक्षिणा सहित गोदान करें। साथ ही सुवर्ण व पंचरत्नों का दान, ब्राह्मण भोजन यथाशक्ति करें। ऐसा करने से सत्पुत्र होता है तथा मनुष्य शापमुक्त होकर शुद्धात्मा व सुखी होता है।
ब्रह्मकूर्च व्रत – पूर्णिमा के दिन 24 घंटे का निरंतर व्रत करके, अगले दिन प्रातः पंचगव्य पीकर व्रत खोलना “ब्रह्मकूर्च” व्रत है।
‘प्रायश्चित तत्व’ में इसके विकल्पों के लिए पुराणों का दान भी कहा गया है। यह व्रत तीन पूर्णिमाओं को लगातार करने से ‘ब्रह्मकूर्चत्रय’ संपन्न होता है। अथवा पाठान्तर से ‘ब्रह्मकृच्छ्र’ पाठ मानने से इसका अर्थ सान्तपन होता है, तब इसका अर्थ इस प्रकार होगा : –
पहले दिन केवल गाय का दूध, दही, गाय का घी व कुशाओं का जल मिलाकर पी लें। अगले दिन निराहार व्रत रखें। तीसरे दिन प्रातः चुल्लू भर पंचगव्य पीकर व्रत की पारणा कर लें। यह व्रत पहले मास में चांद्रायण पूरा करके अगले तीन मासों में पूर्णमासी को करना अधिक उचित है।
पत्नीशाप के योग – श्लोक 82,83,84,85 का अर्थ
82) सप्तमेश पंचम में व सप्तमेश के नवांश में शनि हो, पंचमेश अष्टम में हो।
83) सप्तमेश अष्टम में, पंचमेश भी अष्टम में व गुरु पापयुक्त हो।
84) शुक्र पंचम में हो, सप्तमेश अष्टम में व पंचम में कई पाप ग्रह हों।
इन उपरोक्त योगों में पत्नी के शाप से संतानहीनता होती है।
श्लोक 86,87,88,89 का अर्थ
86) नवम में शुक्र, सप्तमेश अष्टम में, लग्न, पंचम में पाप ग्रह हों।
87) नवमेश शुक्र हो, पंचमेश षष्ठ स्थान में हो, गुरु, लग्नेश व सप्तमेश 6/8 /12 में हो।
88) पंचम में शुक्र की राशि हो, राहु व चंद्र पंचम में ही हो, लग्न, द्वितीय,बारहवें भाव में पाप ग्रह हों।
इन उपरोक्त योगों में भी पत्नी के शाप से संतानहीनता होती है।
श्लोक 90,91,92 का अर्थ
90) द्वितीय में मंगल, द्वादश में गुरु, पंचम में शुक्र हो तथा पंचम पर शनि राहु का योग या दृष्टि हो।
91) दूसरे, सातवें भाव के स्वामी अष्टम में हों, लग्न,पंचम में मंगल शनि हों व गुरु पापयुक्त हो।
92) लग्न, पंचम, नवम में राहु, शनि, मंगल क्रमशः हों, पंचमेश व सप्तमेश अष्टम में हो।
इन योगों के होने पर भी पत्नी शाप से संतान हानि अथवा संतानहीनता होती है।
पत्नी शाप के दोष का निवारण – श्लोक 93,94
इस दोष के निवारण के लिए कन्यादान करें। यदि कन्या न हो तो लक्ष्मी व विष्णु जी की सोने की मूर्त्ति, दस गायें, शैय्या, आभूषण व वस्त्र किसी गरीब गृहस्थी ब्राह्मण को दान करें। ऐसा करने से निश्चय से संतान होती है व भाग्यवृद्धि होती है।
प्रेतादिशाप के योग – श्लोक 95,96,97,98,99,100 का अर्थ
95,96) पितृकार्य श्राद्ध तर्पणादि न करने से पितर प्रेत रूप को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके शाप से वंश नहीं चलता है। जन्मलग्न में इन वक्ष्यमाण योगों को देखकर यह योग कहें।
97) पंचम में सूर्य व शनि, सप्तम में क्षीण चन्द्रमा, लग्न व द्वादश में राहु गुरु हों।
98) पंचमेश शनि अष्टम में हो, लग्न में मंगल, गुरु अष्टम में हो।
99) लग्न में पाप ग्रह, द्वादश में सूर्य, पंचम में मंगल, बुध व शनि हों, पंचमेश अष्टम में गया हो।
100) लग्न में राहु हो, पंचम में शनि हो, अष्टम में बृहस्पति हो।
इन योगों में प्रेतशाप से सन्तान हानि होती है।
श्लोक 101,102,103,104,105 का अर्थ
101) लग्न में राहु, शुक्र व गुरु हों, चन्द्रमा व शनि साथ में हों, लग्नेश अष्टम में हो।
102) पंचमेश नीच में हो, गुरु भी नीच में हो, नीचस्थ ग्रह से गुरु दृष्ट हो।
103) लग्न में शनि, पंचम में राहु, अष्टम में सूर्य हो, द्वादश में मंगल हो।
104) सप्तमेश 6/8/12 में हो, पंचम में चन्द्रमा, लग्न में शनि व गुलिक हो।
105) अष्टमेश पंचम में शनि व शुक्र के साथ हो, गुरु अष्टम में हो।
इन सब योगों में प्रेत शाप से संतान हानि होती है।
प्रेत शाप दोष शान्ति के उपाय – 106,107,108 का अर्थ
इस दोष की शान्ति के लिए गया श्राद्ध व रूद्राभिषेक कराएं। अथवा ब्रह्मा जी की सुवर्णमयी मूर्त्ति, गोदान, चांदी का बर्तन, नीलम, दान करें व ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। ऐसा करने से शाप मुक्ति होती है तथा पुत्रोत्पत्ति एवं वृद्धि होती है।
ग्रह बाधा की शान्ति के उपाय – श्लोक 109,110,111
109) यदि उक्त योग पूरे ना घटते हों तथा किसी भी प्रकार से योगायोग से संतानहीनता दिखे तो बुध शुक्र बाधक हो तो शिवपूजन करें।
110) गुरु चन्द्रकृत दोष हो तो मन्त्र, यंत्र व औषधि प्रयोग करें। राहु बाधक हो तो कन्यादान करें। सूर्य का दोष हो तो विष्णु जी का जप या हरिवंश पुराण का श्रवण करें।
111) सामान्यतः अच्छी संतान प्राप्त करने के लिए व सब दोषों को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण का भक्तिपूर्वक श्रवण करना चाहिए।
एक नियमानुसार ग्रह योग शान्ति उतनी ही बार करनी चाहिए, जितनी संख्यक राशि में बाधक ग्रह हों। यदि उससे पूर्व ही सफलता मिल जाए तो कोई हानि नहीं है।
ग्रहयोगों से नि:संतान योग – श्लोक 112,113,114,115 का अर्थ
112) दूसरे, पांचवें, सातवें भाव के स्वामी पाप राशि में पापयुक्त एकत्र हों या इनके नवांशेश पापराशि के नवांश में पापयुक्त हों।
113) द्वादशेश का नवांशेश यदि अष्टम में हो, पंचमेश क्रूरषष्टयांश में हो।
114) लग्नेश, पंचमेश 6/8/12 में हो, गुरु नीचगत हो, पंचम में कोई नपुंसक ग्रह (बुध या शनि) हो।
115) गुरु क्रूर षष्टयांश में हो, पंचमेश अष्टम में व अष्टमेश पंचम में हो।
इन सब योगों में संतान नहीं होती है। इस प्रकार के योगों में उपरोक्त लिखित ग्रह शान्ति करानी चाहिए (श्लोक109,110,111)।
