पंच महापुरुष लक्षण अध्याय 

Posted by

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 77 में महर्षि पराशर जी द्वारा पंच महापुरुष योगों के लक्षणों के बारे में बताया गया है। पराशर जी इस अध्याय में कहते हैं कि यदि मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि बलवान होकर अपनी उच्च राशि अथवा स्वराशि में केंद्र स्थान में स्थित है तो मंगल से रुचक, बुध से भद्र, गुरु से हंस, शुक्र से मालव्य और शनि से शश नामक पंचमहापुरुष योग बनता है। इस योगों में उत्पन्न सभी व्यक्ति प्रतिष्ठित तथा प्रसिद्ध आदि होते हैं। अब हम इन पाँचों योगों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। 

 

रुचक योग 

जन्म कुंडली में अगर मंगल केंद्र स्थान में अपनी उच्च राशि (मकर) अथवा स्वराशि (मेष या वृश्चिक) में बली अवस्था में स्थित है तब “रुचक” महापुरुष योग बनता है। पराशर जी लिखते हैं रुचक योग में उत्पन्न व्यक्ति बड़े मुँह वाला, अधिक उत्साही, गोरी चमकदार त्वचा वाला, कान्तिवान, सुन्दर भौहों वाला, काले बालों वाला, सुंदरता और कलात्मकता से प्रेम करने वाला, आक्रामक या युद्धप्रिय भी कहा जा सकता है, ताँबे जैसी रंगत वाला, शत्रुओं को परास्त करने वाला, मन्त्रों का जानकार, दबंग और कठोर प्रशासक, कठोर स्वभाव वाला, लोगों का पालन-पोषण करने वाला, पतली पिंडली व पतली जाँघों वाला, ब्राह्मणों का सत्कारकर्ता, हाथ में वीणा, वज्र, धनु, पाश, वृष या चक्र के निशान वाला, मन्त्र प्रयोग में कुशल, अपनी अंगुली के नाप से 100 अंगुल ऊँचा, मुँह की लम्बाई-चौड़ाई समान सी अर्थात चौकोर सा मुँह, कमर चौड़ी, शरीर का वजन 1000 तुला होता है। विंध्य या सह्यांचल (नीलगिरि) का राजा या उन प्रदेशों से लाभ कमाने वाला होता है। 

 

भद्र योग 

बुध यदि जन्म कुंडली के केंद्र स्थान में मिथुन या कन्या राशि में हो तब “भद्र” नामक योग होता है। बुध अपनी ही राशि कन्या में उच्च के होते हैं इसलिए बुध के पास अपनी ही दो राशियां है भद्र योग बनाने के लिए।  इस योग में उत्पन्न व्यक्ति चीते की तरह फुर्तीला, चौड़ी छाती, हाथी जैसे मस्तानी चाल, मोटे अर्थात मजबूत व घुटनों तक लम्बे हाथ, बुद्धिमान, चौकोर-सा शरीर, मनोबल से युक्त तथा योगशास्त्र का जानकार, सात्विक आचार-विचार वाला, सुन्दर पैरों वाला, सुन्दर व कोमल मूंछों व दाढ़ी वाला, हाथ में शंख, चक्र, बाण, सिंह के चिन्ह वाला अथवा झंडा, हल के चिन्हों से युक्त हाथ-पैर वाला। सुन्दर नाक वाला, शास्त्रों का जानकार, धैर्यशाली, काले व घुंघराले बालों वाला, सब कामों में स्वतंत्र रूप से आचरण करने वाला अर्थात स्वयं निर्णायक शक्ति से युक्त, अपने लोगों को प्रसन्न करने में समर्थ, मित्र व दूसरे लोगों को ऐश कराने वाला, वजन एक भार या 20 तुला के बराबर, स्त्री व पुत्रों से युक्त, कुशलतापूर्वक रहने वाला, राजा, मध्य देश पर शासन करने वाला होता है।  

 

हंस योग 

गुरु ग्रह अगर केंद्र में स्वराशि (धनु या मीन) अथवा उच्च राशि (कर्क) में स्थित है तब “हंस” नामक महापुरुष योग बनता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति हंस के समान आवाज वाला, सुन्दर मुखाकृति वाला, ऊँची नाक वाला, गौर वर्ण वाला, कफ प्रधान प्रकृति वाला, सुनहरी सी आँखों वाला, लाल नाखूनों वाला, विद्वान् व बुद्धिमान, भरे हुए गालों वाला, गोलाकार मस्तक वाला, सुन्दर पैरों वाला, राजा होता है। उसके पैरों में मछली, अंकुश, धनुष, शंख, कमल, ढाल (युद्ध सामग्री) के चिह्न होते हैं। अत्यधिक कामुक स्वभाव वाला, 96 अंगुल लम्बाई वाला, पानी में क्रीड़ादि करने में रूचि रखने वाला, सुखी, गंगा-यमुना के बीच के प्रदेश में 100 वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन बिताने वाला या हल प्रदेश का राजा, जंगल प्रदेश या बस्ती से दूर के प्रदेशों में देहांत पाने वाला तथा संसार में सब प्रकार के सुख भोगने वाला होता है। 

 

मालव्य योग 

शुक्र ग्रह यदि जन्म कुंडली में केंद्र स्थान में स्वराशि (वृषभ या तुला) अथवा अपनी उच्च राशि (मीन) में स्थित है तब “मालव्य” महापुरुष योग बनता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति बराबर आकार वाले होंठ वाला, पतली कमर वाला, चन्द्रमा के समान लावण्यमयी कान्ति, सुगन्धित शरीर वाला, अधिक लालिमा न रखने वाला, मध्यम कद, न बहुत लंबा न बहुत नाटा, बराबर व साफ़ दाँतों वाला, हाथी के सामान आवाज वाला, घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाला, पतले व अंडाकार मुख वाला, लम्बाई व चौड़ाई में 2:1 के अनुपात वाला, लम्बाई बीस अंगुल तो चौड़ाई 10 अंगुल, मालव देश (उज्जैन आदि) व सिंध का शासक, वर्षों तक भूमि पर सुख भोगकर स्वर्ग सिधारने वाला होता है। 

 

शश योग 

शनि ग्रह यदि जन्म कुंडली में केंद्र स्थान में स्वराशि (मकर या कुम्भ) अथवा अपनी उच्च राशि (तुला) में स्थित हों तब “शश” महापुरुष योग बनता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति छोटे दाँतों वाला, छोटे मुँह वाला, शूरवीर, अधिक नाटा नहीं, पतली कमर, पतला पेट अर्थात तोंद नहीं होती है, जांघें व पिंडलियाँ मजबूत, बुद्धिमान, दूसरे के दोषों को जानने वाला, वन्य व पर्वतीय प्रदेशों में विशेष रमने वाला, दुर्गम प्रदेशों व किले आदि का प्रेमी, सेनापति के लक्षणों से युक्त, चंचल स्वभाव, धातुओं का व्यवसाय करने वाला,चिकत्सक, औषध निर्माता, सर्राफा, रत्न विक्रेता आदि व्यवसाय से जुड़ा रहने वाला, स्त्रियों पर विशेष रूप से आसक्त, दूसरों का धन पाने वाला होता है। व्यक्ति के हाथ या पैर में माला, वीणा, मृदंग, अस्त्र आदि के सदृश रेखा होती है। यह राजा या राजतुल्य साधिकार होता है।

 

वराहमिहिर की बृहत्संहिता सभी मानव आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों में सबसे पुरानी है। उसमें भी अध्याय संख्या 69 में इस विषय (पंचमहापुरुष योग) का संग्रह किया है। वराहमिहिर इसे होरा की अपेक्षा संहिता में पुरुषलक्षण प्रसंग में रखना अधिक उपयुक्त समझते होंगे। सम्प्रति पंचमहापुरुषों के विषय में वक्तव्य है :- 

1) महापुरुष का तात्पर्य अच्छे तन व मन वाले, उत्तम भाग्य वाले पुरुषों से है। योगकारक ग्रह बलाबल के तारतम्य से अपना फल देते हैं। 

2) किसी-किसी ग्रन्थ में 1, 4, 7, 10 भावों में से 4, 7, 10 भावों का ही ग्रहण है। 

3) लग्न से केंद्र में उक्त ग्रह (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) उच्चगत अथवा स्वक्षेत्री हों तथा स्थानदिक्कालचेष्टादि बलों से युक्त हों तो प्रथम श्रेणी का योग होगा। 

4) केंद्र से केंद्र में उक्त ग्रह रहने पर भी उक्त योगों के फल मिलते हैं, लेकिन योग द्वितीय श्रेणी के रहेंगे अर्थात पूरे फल नहीं मिलेंगे। 

5) योगकारक ग्रह सूर्य के साथ अथवा चंद्र के साथ नहीं होने चाहिए अस्तंगत तथा समागम से रहित तथा युद्ध में विजयी हों। वैसे तो षडबली कहने से इन सब बातों का समावेश स्वयमेव ही है। 

6) पंच महापुरुष योग बनाने वाले ग्रहों की मुख्य शर्त इन ग्रहों का सूर्य व चन्द्रमा से सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। इसका उल्लेख सारावली में है। यदि योगकारक ग्रह सूर्य, चंद्र में किसी एक से युक्त हो तब भी मनुष्य महान न होकर स्त्री, पुत्र, धन से युक्त होता ही है। 

अब योगों के फलों में प्रोक्त कुछ शब्दों की व्याख्या की जाती है :- 

 

चतुरस्र 

चतुरस्र का अर्थ है चौकोर। दोनों हाथ फैलाकर खड़े होने से दायीं बीच की अंगुली से बायीं बीच की मध्यमा बड़ी अंगुली तक नापने से जितनी चौड़ाई हो, लगभग उतनी या उतनी ही लम्बाई (पैर के अंगूठे से कपाल तक) हो तो यह मान चतुरस्र कहलाता है। अर्थात लम्बाई व चौड़ाई में समानता सी हो। 

 

धातुवादी 

सोना, चांदी आदि धातु है। क्रियामूल या शब्दमूल पद, पठ, वद, लिख आदि धातु है। रक्त, अस्थि, वसा, मज्जा, वीर्य आदि शरीर धातु है। इनसे सम्बन्धी बातों का व्याख्याता, वक्ता या प्रयोगकर्ता – धातुवादी। 

 

तुला 

प्राचीन काल की ठोस वस्तु को तोलने की माप को तुला (जिसे वर्तमान में तराजू भी कह देते है) कहते है। 4 कर्ष = 1 पल है। अर्थात 64 ग्राम के लगभग 1 पल होता है। अतः 1 कर्ष 16 ग्राम के लगभग हो गया। 100 पल = 1 तुला है। पल के मान में कुछ मतान्तर हैं। 4 तोला या 48 ग्राम का पल तिथितत्व में कहा गया है। अतः 6400 ग्राम = 1 तुला या 4800 ग्राम की 1 तुला है। यदि कम वाला मान भी लें तो 4 किलो 800 ग्राम * 1000 = 4800 किलो वजन का आदमी भला कहीं होता है ! परन्तु यह माना जा सकता है कि महर्षि के युग में कुछ अन्य मान होता होगा अर्थात कुछ अलग कैलकुलेशन होती होगी। 

वराह ने 1 तुला मान कहा है। वह भी विचारणीय है। अगर कोष 100 पल की 1 तुला कहता है। 1 कर्ष = 1 तोला, 4 तोला = 1 पल, 100 पल = 1 तुला वाला मान अधिक प्रसिद्द है। अतः 400 तोला या 4800 ग्राम ही 1 तुला होती है। तब पाँच किलो व पाँच हजार किलो के बीच में कोई युक्तिसंगत मान मानना पडेगा। 

 

भार 

20 तुला का एक भार। भार का सामान्य अर्थ वजन माना जाता है। पुराने जमाने में पंसेरी या पाँच सेर वजन एक बार में रखकर हाथ की तराजू से तोला जाता था। अतः 1 तुला = 5 सेर लगभग पौने 5 किलो और 20 तुला = 100 सेर या 96 किलो के लगभग 1 भार हुआ। यह विश्वसनीय है और पुराने मानों से मेल भी खाता है। यह मनुष्य द्वारा एक बार में उठाये जाने योग्य भार है। अतः इसे मानव भार कहेगे। इसी तरह एक गाड़ी या शकट से उठाए जाने योग्य भार शाकटाभार होता था। इन सभी प्राचीन तुला मानों में क्षेत्र तथा समय भेद से भेद होता रहता था। 

1) इन महापुरुष योगों में परम उच्च, मूल त्रिकोण, स्वक्षेत्र में फल में अवश्य तारतम्य रहेगा।  

2) इसी तरह केंद्रों में भी उत्तरोत्तर बलवत्ता होने से दशम केंद्र में बनाने वाला योग सबसे श्रेष्ठ होगा।  

3) इन योगकारक ग्रहों पर दृष्टि व योग करने वाले ग्रहों का भी प्रभाव् होगा।