महाभागवत – देवी पुराण – छप्पनवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! बहुत काल तक भ्रमण करने के बाद वे महात्मा पांडव प्रत्यक्ष फल देनेवाली भगवती कामाख्या के दर्शन के लिए योनिपीठ में आए, जहाँ पूर्वकाल में देवाधिदेव भगवान शंकर ने ताप किया था ।।1-2।।

वहाँ उन धर्मपरायण पांडवों ने विधानपूर्वक देवी भगवती का पूजन करके राज्य प्राप्त करने तथा अत्यंत घोर युद्ध में पाप बुद्धि दुष्ट कौरव शत्रुओं का उनके मंत्रियों सहित संहार करने की उनसे प्रार्थना करने पर भगवती उनके समक्ष प्रकट होकर इस प्रकार बोलीं – ।।3-5।।  

देवी बोलीं – कुरुवंश के यश को बढ़ाने वाले महान भाग्यशाली धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) ! तुम वनवास संबंधी प्रतिज्ञा को पार करके तथा धृतराष्ट्र के सभी दुरात्मा एवं दुर्धर्ष पुत्रों को मारकर राज्य अवश्य ही प्राप्त करोगे। तुम्हारे ये अजेय तथा पराक्रमी चारों भाई युद्ध में धृतराष्ट्र – पुत्रों को सेना सहित मार गिराएंगे। मैं तुम्हारी सहायता के लिए देवताओं के द्वारा पृथ्वी के भार का हरण करने के लिए प्रार्थना करने पर पुरुष रूप में वसुदेव के घर में देवकी द्वारा अपनी मायामयी लीला से प्रकट हुई हूँ ।।6-9।। 

मेरी आज्ञा से विष्णु भी पृथ्वी के भार का हरण करने के लिए तुम्हारे महाबली भाई अर्जुन के नाम से उत्पन्न हुए हैं। मैं कृष्ण के रूप में तुम्हारी उत्तम प्रकार से सहायता करके अर्जुन को आगे करके भीष्म, द्रोण तथा कुरुजांगल आदि अनेक देश-देशांतरों से आए हुए श्रेष्ठ क्षत्रिय महारथियों को मार गिराऊँगी ।।10-12।। तुम्हारा महाबली भाई वायुपुत्र भीम युद्ध में समस्त धृतराष्ट्र-पुत्रों को मार डालेगा। पृथ्वी के लिए भार स्वरूप अन्य सैकड़ों-हजारों राजाओं को तुम्हारे पक्ष के दूसरे श्रेष्ठ क्षत्रियगण मार डालेंगे। इस प्रकार महाभारत के युद्ध में क्षत्रियों के मारे जाने पर मेरी कृपा से तुम पुनः राज्य प्राप्त करोगे, इसमें संदेह नहीं है ।।13-15।।  

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार देवी से वरदान प्राप्त कर प्रसन्नमन वाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने महादेवी परमेश्वरी की स्तुति की – ।।16।। 

युधिष्ठिर बोले – ब्रह्मरूपा सनातनी परमेश्वरी ! आपको नमस्कार है। देवताओं, असुरों और सम्पूर्ण विश्व द्वारा वंदित कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। जगत की आदिकारणभूता कामेश्वरी ! आपके प्रभाव को ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी नहीं जानते हैं; आप प्रसन्न हों, आपको नमस्कार है। जगद्वंद्य ! आप अनादि, परमा, विद्या और देहधारियों की देह को धारण करनेवाली हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। आप सभी प्राणियों की बीज स्वरूपा हैं, आप ही वृद्धि, चेतना और घृति हैं, आप ही जागृति और निद्रा हैं। कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है ।।17-20।। 

आपकी आराधना करके परमात्मा शिव भी अपने-आपको कृतकृत्य मानते हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। दुराचारियों के दुराचार का संहार करनेवाली, पाप-पुण्य के फल को देने वाली तथा सम्पूर्ण लोकों के ताप का नाश करनेवाली कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। आप ही एकमात्र समस्त लोकों की सृष्टि, स्थिति और विनाश करनेवाली हैं। विकराल मुखवाली कामेश्वरी! आपको नमस्कार है। शरणागतों की पीड़ा का नाश करनेवाली, कमल के समान सुंदर और प्रसन्न मुखवाली माता ! आप प्रसन्न हों। परमे ! पूर्णे ! कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। जो भक्तिपूर्वक आपके शरणागत हैं, वे संसार को शरण देने योग्य हो जाते हैं। तीनों लोकों का पालन करनेवाली देवी कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। आप शुद्ध ज्ञानमयी, सृष्टि को उत्पन्न करने वाली पूर्ण प्रकृति हैं। आप ही विश्व की माता हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है ।।21-26।।    

श्रीमहादेव जी बोले – धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर – द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती ने प्रकट होकर कहा कि राजन ! अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगों ।।27।। 

राजा युधिष्ठिर ने कहा – आपकी कृपा से पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार मेरा बारह वर्ष का परम दु:खमय वनवास बीत गया। तेरहवें वर्ष में भी हम लोगों को अज्ञातवास करना है, जैसा की मेरे द्वारा पहले द्यूतक्रीड़ा के समय में निर्णय लिया गया था। इसीलिए हम लोगों को दूसरो के द्वारा अविदित रूप से रहना चाहिए। इस प्रकार वह अत्यंत कष्टदायक कठिन संकटकाल आ गया है, जिस प्रकार हम इसे पार कर सकें, वैसा आप करें ।।28-30।।

देवी बोली – मत्स्य देश के राजा विराट – के नगर में द्रौपदी और भाइयों के साथ रहकर प्रतिज्ञा का पालन करके तुम पुनः राज्य प्राप्त करोगे ।।31।। 

श्रीमहादेव जी बोले – ऐसा कहकर धर्मपुत्र के देखते-देखते आकाश में विद्युत की भांति भगवती क्षण भर में अन्तर्धान हो गई ।।32।। मुने ! उसके बाद समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तथा सर्व तत्वज्ञ युधिष्ठिर ने अपने सभी भाइयों को बुलाकर निवास-संबंधी मंत्रणा की। महामते ! इस प्रकार निश्चय करके उन्होंने अपने अन्य सहवासियों को छोड़कर विराट-राज के नगर के लिए गुप्तरूप से प्रस्थान किया ।।33-34।। नगर के समीप पहुँचने पर धनुष, प्रत्यंचा तथा अस्त्र-शस्त्रों को उन्होंने शमी वृक्ष के कोटर में रख दिया ।।35।। उसके बाद महानुभाव राजा युधिष्ठिर देवी को साष्टांग प्रणाम करके सुवर्ण रचित पाशों को लेकर शीघ्रतापूर्वक मत्स्यराज विराट के सम्मुख ब्राह्मण वेश में गए ।।36।। उन महानुभाव राजेन्द्र युधिष्ठिर को सभा में आया देखकर मत्स्य राज ने पूछा कि आप कौन हैं? यहाँ क्यों और कहाँ से आए हैं? मुझे प्रतीत होता है कि आप निश्चित ही चक्रवर्ती सम्राट हैं ।।37।।     

उन्होंने (युधिष्ठिर) कहा – राजन ! मैं सब कुछ नष्ट हो जाने पर उपस्थित हुआ शरणार्थी हूँ। मुझे धर्मपुत्र (राजा युधिष्ठिर) – द्वारा संरक्षित, द्यूतक्रीड़ा में कुशल ‘कंक’ नामक ब्राह्मण समझे ।।38।। 

ऐसा सुनकर मत्स्यराज ने उन महाबुद्धिमान धर्मात्मा को स्वयं आदरपूर्वक सभा में संरक्षण दिया। भगवती की कृपा से उस तेरहवें वर्ष में राजा की सभा में आए हुए उन्हें कोई नहीं जान सका ।।39-40।। इसी प्रकार भीमसेन भी उन राजा (विराट) – के पास आए और राजा की सम्मति से पाकशाला में नियुक्त हो गए। स्त्रीवेशधारी अर्जुन मत्स्यराज की अनुमति से उनकी नृत्यशाला में कन्याओं के नृत्य शिक्षक हुए। सर्वांगसुन्दरी द्रौपदी भी राजा की पत्नी सुदेषणा की सैरंध्री नामवाली प्रसाधन-सेविका होकर राजा के अंत:पुर में रहने लगी। माद्री के दोनों पराक्रमी पुत्र भी उन राजा [विराट] – के पास आए और अश्वशाला तथा गोशाला में नियुक्त होकर रहने लगे ।।41-44।। 

महादेव की कृपा से उस तेरहवें वर्ष में इन सभी राजपुत्रों को किसी ने भी नहीं पहचाना ।।45।। उस वर्ष के ग्यारहवें माह में सुदेषणा के महल में उसके बलवान भाई कीचक ने सैरंध्री को देखा ।।46।। वही वृद्ध मत्स्यराज के राज्य का संरक्षक था। अतः उसके प्रस्ताव का उल्लंघन करने का उसमें कोई साहस नहीं था।।47।।

सुंदर अंगों और दिव्य लक्षणों वाली उस सैरंध्री को देखकर उस कीचक ने अपनी बहन से पूछा कि यह सर्वांगसुन्दरी कौन है? क्या यह देवराज इन्द्र की पत्नी शची है या भगवान विष्णु की पत्नी स्वयं लक्ष्मी हैं? मैंने ऐसी सर्वांगसुन्दरी कोई नहीं देखी ।।48-49।।

सुदेषणा बोली – भाई ! सुनो, यह सैरंध्री है, जो महाराजाधिराज के महल से अचानक ही आ गयी है ।।50।।

कीचक बोला – यह जैसे भी मुझे शीघ्र स्वीकार करे वैसा करो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्यागकर यमलोक चल जाऊंगा ।।51।। 

सुदेषणा बोली – मैं तुमसे कुछ अद्भुत और रहस्यमय बात बताती हूँ, उसे सुनकर विचार करके बोलो तो मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगी। यह रूपवती सैरंध्री जब यहाँ रहने की इच्छा से आई तब मैंने इससे कहा था – सैरंध्री ! तुम मुझसे सौगुना सौन्दर्यशालिनी हो। तुम मेरी सेवा के योग्य नहीं हो, मेरे लिए भी यह उचित नहीं है। कमल के समान नेत्रों तथा सुंदर अंगों वाली तुम्हें यदि राजा देख लेंगे तो सब प्रकार से तुम्हारे हो जाएंगे। तुम्हारे रूप सौन्दर्य पर मोहित राजा तुम्हारी आज्ञा के वश में हो जाएंगे। सैरंध्री ! वे मेरे पास नहीं आएंगे, इससे बढ़कर मेरा दुर्भाग्य क्या होगा? इसलिए यहाँ तुम नहीं रह सकती, जहाँ इच्छा हो वहाँ जाओ ।।52-56½।। 

उसे सुनकर सैरंध्री ने कहा कि कल्याणी ! जब तक मैं आपके भवन में रहूँ तब तक कोई पुरुष वहाँ न जाए। पाँच पराक्रमी गंधर्व मेरे पति हैं, वे ही रात-दिन मेरी रक्षा करते रहते हैं। इस पृथ्वी पर अन्य कोई भी पुरुष मुझ पर बल प्रयोग करने में समर्थ नहीं है। इसलिए रानी ! मुझे अपने समीप रखने में आपको भय नहीं है। ऐसा सुनकर मैंने सैरंध्री को अपने महल में रख लिया। यदि ऐसा नहीं होता तो अपने सुख का नाश करने वाली इसे अपने घर में क्यों रखती? अतः तुम यदि इस सुंदरी सैरंध्री के पीछे पड़ रहे हो तो वे पाँचों गंधर्व तुम्हें निश्चित ही मार डालेंगे ।।57-61½।। 

कीचक बोला – मैं सत्य कहता हूँ कि मुझे गन्धर्वों से भय नहीं हैं, अपने बाहुबल का आश्रय लेकर मैं उन आये गन्धर्वों को मार डालूँगा। तुम गन्धर्वों से भय न करो और अपनी मधुर वाणी से सुंदर अंगों वाली सैरंध्री को प्रसन्न कर मेरी शैय्या पर भेजो ।।62-63½।।

श्रीमहादेव जी बोले – तब सुदेषणा ने सैरंध्री को बुलाकर मुसकुराते हुए कहा – सैरंध्री ! कीचक के महल में जाओ। कल्याणी ! वह तुम्हें चाहता है, तुम उस सुंदर रूपवाले कीचक को अंगीकार करो ।।64-65।। 

सैरंध्री बोली – अपने पाँच पतियों के अतिरिक्त मैं किसी दूसरे पुरुष को अंगीकार नहीं करती। वह अत्यंत पापी और अत्यंत मन्द बुद्धि वाला मुझ पर बल प्रयोग करने में समर्थ नहीं हो सकता। यदि वह दुष्टात्मा मुझे देखकर कामान्ध होकर मेरे पास आएगा तो उन गन्धर्वों के द्वारा निश्चित रूप से उसकी मृत्यु हो जाएगी ।।66-67।। 

उसकी ऐसी बात सुनकर सुदेषणा ने भाई से कहा की सैरंध्री अपनी इच्छा से तुम्हारे पास नहीं आएगी ।।68।। उसकी इस बात को सुनकर पापी दुष्टबुद्धि कीचक ने बलपूर्वक शीलहरण की चेष्टा की। उसकी उस कुचेष्टा को जानकर द्रौपदी भयभीत होकर जगत का पालन करने वाली देवी शिवा की शरण में चली गयी ।।69-70।। 

द्रौपदी बोली – शरणागतों के दु:ख-दारिद्रय का नाश करने वाली, सबकी रक्षा करने वाली जगज्जननी देवी दुर्गा ! आप प्रसन्न हों। दुष्टों को स्तंभित करने वाली, विश्व को मोहित करने वाली, चैतन्यरूपिणी, विश्व की अधिष्ठात्री विश्वेश्वरी ! कात्यायनी ! महेश्वरी ! आपको नमस्कार है ।।71-72।। 

दुर्गा ! आप मोहस्वरूपा और शुद्ध ज्ञान स्वरुपा हैं, इस संसार में जो आपका स्मरण करते हैं वे संकटों से पार जाते हैं। जगदंबिका ! आप सती स्त्रियों की पातिव्रत्य स्वरुपा हैं, भगवान शंकर की प्राणप्रिया ! दारुण भय से मेरा उद्धार कीजिए। देवी ! आप दीनजनों की सदैव परमगति हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, भयानक संकट से मेरी रक्षा कीजिए ।।73-75।।       

श्रीमहादेव जी बोले – पांचाली द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर दु:सह दु:खों का नाश करने वाली देवी दुर्गा ने अंतरिक्ष में स्थित होकर कहा – ‘सैरंध्री ! भय मत करो। जो कोई अन्य पुरुष काम लोलुप होकर तुम्हें चाहेगा, वह शीघ्र ही मृत्यु के वशवर्ती होगा; इसमें संशय नहीं है’।।76-77।। इस प्रकार देवी से वरदान प्राप्त कर प्रसन्न मुखवाली सैरंध्री निर्भय होकर मत्स्यराज के भवन में विचरण करने लगी-।।78।।  

महामुने ! वह सुंदर अपांगवाली एक बार किसी महत्वपूर्ण कार्य से रात्रि में उस दुष्ट कीचक के घर गई। तब उस पापी ने पास में आयी हुई उस रूपवती द्रौपदी को देखकर तत्क्षण उठकर उसका कमल सदृश हाथ पकड़ लिया, परंतु वह उसे ढकेलकर घर से बाहर भाग आयी ।।79-80।। 

वह पापी क्रोधपूर्वक आंखे नचाते हुए द्रौपदी के पीछे दौड़ा। उसके भय से अत्यंत विक्षुब्ध मनवाली वह [द्रौपदी] मत्स्यराज की सभा में चली गयी, जहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिर और भीमसेन वृद्ध राजा [विराट] – के साथ द्यूतक्रीड़ा में संलग्न थे। उस सूतपुत्र कीचक ने वहाँ आयी हुई द्रौपदी के बाल पकड़कर सहसा पैर से प्रहार किया। तब रुदन  करती हुई द्रौपदी ने क्रोधपूर्वक मत्स्यराज की निंदा की और दीन हृदय वाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा भीमसेन की ओर लाल नेत्रों से देखकर आँखें मीचकर उचित समय की प्रतीक्षा करती हुई वह अचानक मत्स्यराज के भवन में चली गयी। यह देखकर भीम ने कीचक के विनाश का मन ही मन विचार किया ।।81-84।। 

उसके बाद एक बार उन बलवान पांडुपुत्र भीम ने सैरंध्री [द्रौपदी] – से कहा की कीचक को आमंत्रण  देकर रात्रि में राजभवन में ले आओ। वहाँ मैं तुम्हारा प्रिय करने के लिए उसे मार डालूँगा और तुम कहना कि वह पापी गन्धर्वों के द्वारा मार डाला गया ।।85-86।। भीमसेन की इस बात को मानकर उस पतिव्रता ने वैसा ही किया और भीमसेन ने अर्धरात्रि में उस पापी कीचक को मार डाला। सैरंध्री ने नगरवासियों से कह दिया कि कीचक गन्धर्वों द्वारा मार डाला गया।।87-88।। 

ऐसा सुनकर और दूसरे भी उपकीचक उसे देखने के लिए एकत्र हो गए। वे उसका दाह करने के लिए भवन से ले आए। रात्रि का बहुत समय उन सबके रोने में ही बीता और इसके बाद उन्होंने सैरंध्री का भी कीचक के साथ ही दाह करने का आपस में निर्णय किया ।।89-90½।। तदनंतर वे उपकीचक जाकर उसे बलपूर्वक पकड़ लाए। तब सैरंध्री ने उच्च स्वर में विलाप किया, जिसे भीम जान गए। उसके बाद दीवाल लांघकर वे महाबली भीम बाहर निकल गए और उन्होंने उपकीचकों का वध कर सैरंध्री को छुड़ा लिया। लोगों में चर्चा रही कि इन सबको गंधर्व ने मार डाला।।91-93।। तब भयभीत होकर राजा [विराट] ने विनयपूर्वक सैरंध्री से कहा कि तुम्हारे कारण ही मेरे राज्य के इतने रक्षक मारे गए। तुम मेरे नगर को छोड़कर अपनी रुचि के अनुसार अन्यत्र निवास करो ।।94½।। 

सैरंध्री ने उनसे कहा की राजन ! मुझे कुछ समय के लिए क्षमा कीजिए, मैं शीघ्र ही आपके राजप्रासाद को छोड़कर चली जाऊँगी। तत्पश्चात उन सबका तेरहवाँ वर्ष व्यतीत हो गया और राजा दुर्योधन गुप्तचरों के द्वारा खोजवाकर तथा भीष्म, द्रोण आदि प्रमुखों से देर तक मंत्रणा करके भी उनका पता नहीं पा सका ।।95-97।। 

कीचकों का वध सुनकर ‘वहाँ पांडव होंगे’ – ऐसा निश्चित कर राजा दुर्योधन सेना सहित मत्स्यराज के देश में आ गया। जहाँ गौओं को ले जाने के संबंध में धनुर्धर अर्जुन के साथ उसका युद्ध हुआ, जिसमें भीष्म, द्रोण आदि सभी उनसे पराजित हुए ।।98-99।।  

तत्पश्चात अपने यहाँ रहने वाले पांडवों को राजा विराट ने भी जान लिया और विनयावनत होकर राजा ने उसकी विधिवत पूजा की ।।100।। वहाँ अर्जुन पुत्र [अभिमन्यु] का विराट पुत्री – उत्तरा के साथ विवाह का सभी के आनंद को बढ़ाने वाला मंगलमय उत्सव हुआ ।।101।। 

महामते ! तत्पश्चात महाभारत युद्ध की तैयारी आरंभ हुई । पांचाल देश के राजा अपनी समस्त सेना के साथ वहाँ आए। काशिराज तथा अन्य प्रमुख राजागण भी उनकी सहायता के लिए आए। उनके और मत्स्य देश के अन्य राजाओं के साथ पांडव भीषण संग्राम की इच्छा से कुरुक्षेत्र में आ गए। । 102-104 । । 

।। इस प्रकार श्री महाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘कीचकवधोपाख्यान‘ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।