
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार श्यामसुंदर श्रीकृष्ण रूप से देवी भगवती ने पृथ्वी के भार स्वरूप दुष्ट चित्त वाले राक्षसों को लीलापूर्वक मार डाला तथा मुनिश्रेष्ठ ! अन्य दुष्टों के वध के कारण की प्रतीक्षा करते हुए रम्य मधुपुर में श्रीबलराम के साथ रहने लगीं ।।1-2।।
भगवान शिव भी स्त्रीरूप से आठ विग्रहों में होकर श्रीकृष्ण स्वरूपिणी भगवती की प्रतीक्षा करते हुए पृथ्वी तल पर अपने पिता के घर में स्थित थे। इसी प्रकार विष्णु भगवान देवराज इन्द्र द्वारा कुंती के गर्भ से उत्पन्न होकर अपने भाइयों के साथ हस्तिनापुर नगर मे रहते थे। महान बल और पराक्रम से युक्त, अर्जुन नाम से प्रसिद्ध वे सभी शास्त्रों के अर्थ तथा तत्त्व के ज्ञाता एवं धनुर्विद्या के पूर्ण पंडित थे ।।3-5।। उसी तरह से धर्मपुत्र युधिष्ठिर आदि उनके जो अन्य चारों भाई थे, वे सभी महाबली, पराक्रमी, परमवीर तथा महान शौर्य से सम्पन्न थे। मुनिश्रेष्ठ ! युवावस्था आने पर सत्यनिष्ठ और धर्मात्मा वे पांचों पांडव राज्य करने लगे ।।6-7।। धृतराष्ट्र पुत्र मूढ़ बुद्धि दुर्योधन तथा कर्ण, शकुनि एवं धृतराष्ट्र के महाबली और दुर्धर्ष पुत्र उन पांडवों से बहुत द्वेष रखते थे ।।8।।
मुनिश्रेष्ठ ! कठोर ह्रदय दुर्योधन पांडवों की मृत्यु का उपाय निरंतर सोचा करता था। उन पांडवों के वध की इच्छा से विषदान आदि कुकर्म करके भी विफल प्रयासों वाला, क्रूर हृदय दुर्योधन शांत नहीं हुआ ।।9-10।। क्षत्रियों का नाश करने वाली उसकी उस दुर्बुद्धि को जानकर वृषणिराज ने अक्रूर को हस्तिनापुर भेजा। वहाँ पहुँचकर धृतराष्ट्र के पुत्रों के सभी क्रिया-कलाप जानकर उन अक्रूर ने एकांत में विचित्रवीर्य के पुत्र महाराज धृतराष्ट्र से यह गुप्त बात कही ।।11-12।।
अक्रूर जी बोले – विचित्रवीर्यपुत्र ! महाराज ! प्रभो ! अपने पुत्रों को रोककर आप पांडवों पर स्नेह प्रकट कीजिए। महामते ! बाल्यकाल में ही उनके पिता मर गए। अतः अब आपको छोड़कर उनका कोई नहीं रहा, जो उन अनाथ पांडवों से स्नेह करे। अतः महाराज ! पांडवों तथा अपने पुत्रों में समानता का भाव रखते हुए परम प्रीति से युक्त होकर आप राज्य का भोग कीजिए ।।13-15।।
धृतराष्ट्र बोले – यद्यपि पांडवों के साथ विद्वेष भाव रखना विनाशकारी है, फिर भी पुत्र स्नेह के कारण उस विषमता का त्याग करना मेरे मन को अच्छा नहीं लगता ।।16।।
श्रीमहादेवजी बोले – नारद ! इस प्रकार धृतराष्ट्र के विचारों से अवगत होकर तथा उसकी उपेक्षा करके अक्रूरजी ने जो कुछ बातें हुई थीं, उन्हें श्रीकृष्ण से कह दिया ।।17।। नारद ! उसे सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण सोचने लगे कि धृतराष्ट्र के नीचबुद्धि पुत्र दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि के इस विद्वेष के कारण निश्चितरूप से कुरुक्षेत्र में बहुत-से क्षत्रियों का संहार होगा ।।18-19।। इसके बाद श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी के द्वारा बनाई गयी दिव्य द्वारकापुरी में निवास हेतु सभी यादवों के साथ प्रवेश किया ।।20।। तत्पश्चात भगवान शिव के अंश से उत्पन्न रुक्मिणी के स्वयंवर में विदर्भराज (भीष्मक) – के द्वारा आमंत्रित किए गए अनेक देशों के निवासी सभी राजा उनके नगर में आए। उस भीष्म का रुक्मि नामक दुर्बुद्धि पुत्र अपनी बहन को चेदिराज शिशुपाल को सौंपने के लिए उत्सुक था। अतः कृष्ण के प्रति विद्वेष भावना के कारण अपने माता-पिता की अवहेलना करके उसने कृष्ण को स्वयंवर में नहीं बुलाया ।।21-23।।
मुनिश्रेष्ठ ! वह बलवान चेदिराज शिशुपाल रुक्मि का वैसा विचार जानकर उत्तम तथा आकर्षक सुंदर वर का रूप धारण करके महान रथ-समुदाय के साथ विदर्भ देश के अधिपति भीष्मक के पुर में आ गया ।।24½।। तदनंतर भेरी, मृदंगों, नगाड़ों तथा दुंदुभियों की ध्वनि से व्याप्त एवं नानाविध उत्सवों से सुशोभित विदर्भ राजनगर में रुक्मिणी का शुभ-विवाह नारद के मुख से सुनकर कृष्ण भी रथ पर सवार होकर वहाँ के लिए चल पड़े।।25-26½।।
तत्पश्चात वहाँ आकर आकाश में स्थित रथ से वर का वेश धारण किए हुए उन राजाओं को देखकर श्रीकृष्ण ने अट्टहास किया ।।27½।। तदनंतर कमल के समान नेत्रों वाली, हिलते हुए ध्वनित नुपूरों से सुशोभित, हंसिनी की चाल को लज्जित कर देने वाली, दुर्गापूजन के लिए सखियों के द्वारा आदरपूर्वक लाई जाती हुई, एकांत में श्रीकृष्ण का ध्यान करती हुई तथा श्रीकृष्ण के आगमन की आकांक्षा करती हुई रुक्मिणी का कृष्ण ने हरण कर लिया। इस पर उस पुर के सभी निवासी हाहाकार चिल्लाने लगे और व्यथित हृदय वाले सभी राजागण अत्यंत क्रुद्ध होकर उन पर आक्रमण करने के लिए पीछे-पीछे दौड़े ।।28-31।।
भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के लिए तत्पर होकर उत्तम आयुध धारण करने वाले उन शिशुपाल आदि प्रमुख वीरों के समस्त श्रेष्ठ धनुष तथा वाहनों को विच्छिन्न कर उन्हें लज्जावनतमुख करके स्वर्ग सदृश अपने भवन में चले गए ।।32।। नारद ! उसी प्रकार शिव के अंश से उत्पन्न जाम्बवती आदि अन्य सात कन्याओं को भी श्रीकृष्ण ने पत्नी रूप में ग्रहण किया। महामुने ! यदुकुल की वृद्धि करने वाले वे श्रीकृष्ण और भी अन्य पत्नियों के साथ उस द्वारकापुरी में रहने लगे ।।33-34।। बहुत-से युद्ध करके उन्होंने रण मे वीरों को जीता और फिर द्वारका आकर उन भार्याओं के साथ यथेष्ट विहार किया ।।35।।
राजा के रूप में अभिषिक्त होकर यदुकुल का विस्तार करने वाले वे श्रीकृष्ण पुत्र-पौत्र आदि से युक्त होकर वृषणि वंशियों के साथ उस द्वारकापुरी में रहने लगे ।।36।।
महामुने ! श्रीकृष्ण ने और भी कई भार्याओं के साथ विवाह करके उनसे हजारों पुत्र प्राप्त किए और युद्ध में कठिनाई से जीते जाने वाले महाराज भौमासुर को मारकर वे सुंदर नेत्रों वाली हजारों स्त्रियों को ले आए ।।37-38।।
मुनिश्रेष्ठ ! इसी समय अपने विवाह आदि करके तथा दुरूह शास्त्र विद्या का अध्ययन कर युद्ध की इच्छा वाले उन पांडवों ने महामुनि कृष्ण को बुलाया। मुने ! वहाँ जाकर उन श्रीकृष्ण ने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने का आदेश दिया, जो विविध राजवंशों के क्षय तथा कुरुओं की द्वेष वृद्धि में हेतु बना ।।39-41।।
मुनिश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने अपने तत्वाधान में यज्ञ का आरंभ कराया और सभी राजाओं को जीतकर ले आने के लिए भीम आदि को सैनिकों के साथ सभी दिशाओं में भेजा। उन लोगों ने भी अनेक देशों के निवासी समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त की और उन्हें लाकर पुनः वे सभी महान ओजस्वी मगध-नरेश जरासंध के नगर में आए। प्रचंड पराक्रम वाले उस जरासंध ने सभी राजाओं को जीतकर उन्हें अपने यहाँ ले आकर कैद कर रखा था। मुनिश्रेष्ठ ! तत्पश्चात यदुनंदन श्रीकृष्ण ने संग्राम में भीमसेन को आगे करके उस जरासंध को शूल से मार गिराया ।।42-45।।
तदनंतर सभी राजाओं को ले आकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय नामक यज्ञ आरंभ किया ।।46।। धर्मावतार युधिष्ठिर ने उस यज्ञ में सभासदों के पूजन-कार्यों में अपने भाई महामति सहदेव को नियुक्त किया। मुनिश्रेष्ठ ! मुनीश्वरों से आदेश पाकर उन सहदेव ने सभी राजाओं के समक्ष सर्वप्रथम यदुनंदन श्रीकृष्ण की पूजा की ।।47-48।।
उसे देखकर क्रोध से जलता हुआ दुष्टात्मा शिशुपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिर, कृष्ण तथा उस यज्ञ की निंदा करने लगा। मुने ! तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने राजाओं की उस सभा में पृथ्वी के भारस्वरूप उस शिशुपाल का सिर काटकर उसे मार डाला।।49-50।।
उस यज्ञ का ऐश्वर्य देखकर अत्यंत नीच बुद्धि दुर्योधन तथा क्रूर हृदय दुर्बुद्धि कर्ण को भी घोर संताप हुआ। तदनंतर उस दुर्योधन ने दुष्ट हृदय वाले अपने मामा शकुनि से मंत्रणा करके अतुलित तेजवाले युधिष्ठिर को वचनबद्ध कराकर उनके साथ द्यूतक्रीड़ा की। नारद ! अत्यंत नीच राजा दुर्योधन ने छल करके उस जुए में धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर को जीत लिया ।।51-53।। द्यूतक्रीड़ा की प्रतिज्ञा के अनुसार राजा युधिष्ठिर ने क्रम से सारा राज्य छोड़ दिया। इस पर भी धृतराष्ट्र पुत्र दुष्टात्मा दुर्योधन ने धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर को जुए में फिर आमंत्रित किया ।।54½।।
धर्मपरायण वे राजा युधिष्ठिर धर्मोल्लंघनजनित भय के कारण पापी दुर्योधन के साथ द्यूतक्रीड़ा के लिए पुनः तैयार हो गए और उन्होंने यह घोर प्रतिज्ञा की कि जुए में मेरी पराजय होने पर मैं बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करता हूँ। इस प्रतिज्ञा के बाद जुए में धर्मराज युधिष्ठिर पराजित हो गए। तदनंतर जुए में भगवती द्रौपदी को जीतकर दुर्योधन ने सभा के बीच में उनका अपमान किया ।।55-58।।
मुने ! उसके उस क्रूर कृत्य को देखकर भीष्म आदि (धर्मात्माओ) – ने उस दुर्योधन को क्षत्रियों के लिए विनाशकारी कंटक मान लिया। उन व्रत परायण भीष्म पितामह आदि श्रेष्ठ जनों ने उसे ऐसा करने से रोककर देवी द्रौपदी को पांडवों को सौंप दिया और दुष्ट हृदय वाले उस दुर्योधन की बहुत निंदा की। महामुने ! तत्पश्चात अपनी प्रतिज्ञा निस्तारण करने की इच्छा वाले वे सभी राज्यच्युत पांडव अपने मंत्रियों तथा अन्य सभी स्वजनों को साथ में लेकर वनवास के लिए चल पड़े। पृथ्वी के भार से मुक्ति का यही प्रधान हेतु है – ऐसा निश्चय करके श्रीकृष्ण द्वारका पुरी आ गए ।।59-63।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत राजसूययज्ञ के अनंतर शिशुपालहननपूर्वक द्यूतक्रीड़ा में ‘पांडवों की पराजय प्राप्ति तथा वनवासगमन’ नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।
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