
श्रीमहादेव जी बोले – इन्द्र आदि सभी देवताओं ने स्वर्ग में तथा परमेश्वर श्रीराम ने मृत्युलोक में सभी लोकों की महेश्वरी देवी जगदंबा की पूजा की। श्रीराम ने युद्ध स्थल में बाणों से मारकर रावण के अनुज कुंभकर्ण को धराशायी कर दिया। युद्ध में – इंद्रादि देवावतार – वानरों ने लाखों-करोड़ों भयानक राक्षसों का वध किया और राक्षसों ने भी अनेक करोड़ वानरों का संहार किया। नारद ! इससे रक्त प्रवाह से युक्त तरंगों वाली घोर नदी बहने लगी तथा असंख्य मुंडमालाएं वहाँ पर बिखर गयी ।।1-3½।।
संग्राम में अपने भाई का वध समाचार सुनकर शोक से संतप्त हृदय वाले रावण ने अत्यधिक विलाप किया और वह मूर्छित हो गया। तदनंतर प्रचंड पराक्रम वाले तथा बलवान अतिकाय ने उस रावण को सांत्वना प्रदान कर कृष्ण दशमी को युद्धभूमि के लिए प्रस्थान किया। मुने ! भगवान श्रीराम युद्ध में कुंभकर्ण का वध करने के पश्चात वहाँ पहुँच गए, जहाँ ब्रह्मा देवी की आराधना कर रहे थे।।4-6½।।
जगत के स्वामी महात्मा ब्रह्माजी को प्रणाम करके श्रीरामचंद्र जी ने युद्ध में रावण के छोटे भाई कुंभकर्ण के युद्ध के विषय में उनसे कहा और देवी के द्वारा पूर्व में जो पूजा-विधान तथा दिन-प्रतिदिन शत्रुओं के निधन-संबंधी बात कही गयी थी, उसे ब्रह्मा जी ने भी उनसे कहा ।।7-8½।।
उसे सुनकर भगवान श्रीराम ने वानरों से अनेक प्रकार की पूजा-सामग्री मँगाकर दशमी तिथि को प्रातःकाल भक्तिपूर्वक भगवती की पूजा की और फिर महादेवी को प्रणाम करके वे युद्ध के लिए पुनः निकल पड़े ।।9-10½।।
इधर दुर्धर्ष अतिकाय पृथ्वीतल को प्रकंपित करता हुआ और अपने रथ की नेमि की ध्वनि से सम्पूर्ण पृथ्वी को चलायमान-सा करता हुआ बहुत अधिक सैनिकों को साथ लेकर युद्ध क्षेत्र में आ गया।।11-12।। उसके आ जाने पर दुष्टात्मा राक्षसों और वानरों के मध्य अत्यंत भीषण तथा भय उत्पन्न करनेवाला युद्ध छिड़ गया। उस युद्ध में बलवान वानरों ने गदाओं, परिघों, वृक्षों और पाषाणों से प्रहार करके सैकड़ों-हजारों राक्षसों को मार गिराया और उसी प्रकार महान बल तथा पराक्रम वाले राक्षसों ने युद्ध में अनेक प्रकार के अस्त्रों और शस्त्रों से प्रहार कर वानरों को भी धराशायी कर दिया।।13-15।।
तब राम और लक्ष्मण – दोनों भाइयों ने धनुष लेकर युद्ध क्षेत्र में स्थित प्रचंड पराक्रम वाले राक्षसों का संहार किया ।।16।।
इस पर उस महान राक्षस अतिकाय ने भी युद्ध क्षेत्र में घोर गर्जना करते हुए सैकड़ों-हजारों वानरों को मार गिराया। तदनंतर उस दुरात्मा राक्षस के साथ श्रीराम और लक्ष्मण का अत्यंत रोमांचकारी युद्ध होने लगा। जो प्रहस्त आदि प्रधान योद्धा तथा अन्य दूसरे महाबली वीर थे, उनके साथ वानरेन्द्र सुग्रीव का अत्यंत भीषण युद्ध होने लगा ।।17-19।।
मुनिश्रेष्ठ ! उन राक्षसों की प्रवृत्ति के अनुकूल वह अत्यंत भीषण युद्ध दिन-रात चलता रहा। देखने वालों के लिए वह युद्ध बड़ा ही भयदायक था। किसी भी देवता, यक्ष अथवा किन्नर ने इस प्रकार का युद्ध अंतरिक्ष में या पृथ्वीतल पर कभी नहीं देखा था। महान अस्त्रों, फेंककर मार करने वाले शस्त्रों तथा श्रेष्ठ कोटि के गदा, तलवार, परिघ, त्रिशूल, पट्टीश आदि के द्वारा वह महान युद्ध हो रहा था। दिन में भी रात हो जाती थी और आधी रात की वेला में भी दिन उपस्थित हो जाता था। आकाश में बादल न रहने पर भी वृष्टि होने लगती और भयंकर ध्वनि के साथ हवा बहने लगती थी। युद्ध स्थल में सैकड़ों बार वज्रपात हुआ। इस प्रकार तीन दिनों तक घोर युद्ध चलता रहा ।।20-24।।
तदनंतर चौथे दिन त्रयोदशी तिथि की रात में श्री लक्ष्मण ने उस महापराक्रमी अतिकाय को अपने तीव्र बाणों से मार डाला। महात्मा राघवेंद्र ने समर में अन्य बड़े-बड़े राक्षसों का संहार कर दिया। कुछ राक्षस वानरों के द्वारा मार डाले गए और अन्य बहुत सारे राक्षसों को उस युद्ध क्षेत्र में हनुमान, अंगद आदि ने मार डाला। कुछ राक्षस भयभीत होकर भाग खड़े हुए। इससे श्रीराम प्रसन्नचित हो गए और वानरगण अत्यंत हर्षित होकर जय-जय की ध्वनि करने लगे । उस समय आकाश से फूलों की भारी वर्षा होने लगी।।25-28।।
श्रीराम ने भी अत्यंत आदरपूर्वक दोनों भुजाओं से भाई लक्ष्मण का आलिंगन करके सिर को सूँघा। पुनः वे प्रसन्नमन से ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने प्रातःकाल बिल्ववृक्ष में सुरेश्वरी भगवती की पूजा की, इसके बाद उन्हें पुनः प्रणाम कर वे युद्ध के लिए रणक्षेत्र में सम्मुख आ डटे।।29-30।। मुने ! उस महाबली अतिकाय के वध का समाचार सुनकर रावण अपने पुर की रक्षा के लिए महान पराक्रम वाले अपने पुत्र मेघनाद को नियुक्त करके स्वयं युद्ध के लिए निकल पड़ा। मुने ! तदनंतर वानरों और राक्षसों में अत्यंत महान युद्ध छिड़ गया, जो भयदायक, अतुलनीय तथा यमलोक का विस्तार करने वाला था।।31-32½।।
श्रीराम और लक्ष्मण के साथ भी उस रावण का महान युद्ध होने लगा। वहाँ पर उनके पास में विभीषण को देखकर उस राक्षस ने क्रोधित होकर मयदानव के द्वारा प्रदत्त, विभीषण के वध के लिए उद्यत उस प्रज्वलित महाशक्ति को उठा लिया। उनकी रक्षा करने के लिए लक्ष्मण उनके सामने खड़े हो गए।।33-35½।।
उसके द्वारा छोड़ी गयी वह शक्ति [लक्ष्मण पर आघात करके] रसातल में चली गयी और लक्ष्मण भी मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े। इसके बाद उस राक्षसराज रावण ने उन लक्ष्मण को उठाकर ले जाने की इच्छा से अपनी भुजाओं से ज्यों ही उन्हें स्पर्श किया; पवनपुत्र हनुमान ने क्रोधित होकर तत्काल उसकी विशाल छाती पर बड़ी तेजी से मुष्टि का प्रहार किया। हनुमान जी के प्रहार से आहत होकर वह वीर रक्त वमन करता हुआ विघूर्णित नेत्र वाला एवं मूर्च्छित और निश्चेष्ट होकर अपने रथ पर गिर पड़ा। इसके बाद चेतना आ जाने पर वह धनुष लेकर हनुमान जी को मारने की इच्छा से बड़े वेग से उनकी ओर दौड़ा।।36-40।।
तत्पश्चात हनुमान जी को मारने के लिए तत्पर उस यमराजतुल्य दुर्धर्ष रावण को देखकर श्रीराम ने धनुष लेकर उससे यह कहा – राक्षसराज ! दुष्टात्मन ! यदि तुम युद्ध से भाग नहीं जाते तो मैं तुम्हें अपने तीव्र तथा श्रेष्ठ बाणों से आज मारकर धराशायी कर दूंगा। ऐसा कहकर विशाल भुजाओं वाले उन श्रीराम ने बाण को धनुष पर चढ़ाया; उससे वह रावण भय के मारे रण छोड़कर अपने नगर में आ गया।।41-43।।
तदनंतर उस रावण को सांत्वना प्रदान कर प्रचंड पराक्रम वाले इंद्रजित मेघनाद ने युद्धक्षेत्र के लिए प्रस्थान किया। उसके साथ महाप्राण लक्ष्मण का घोर युद्ध हुआ। वह युद्ध बड़ा भयदायक तथा सभी लोगों को विमोहित कर देनेवाला था। मुनिश्रेष्ठ ! इसके बाद लक्ष्मण ने अमावस्या की रात्रि में अपने अमोघ अस्त्रों से उस दुर्धर्ष इंद्रजित को संग्राम में मारकर गिरा दिया।।44-45½।।
तदनंतर बहुत प्रकार से विलाप करके वह राक्षसराज रावण देवांतक आदि प्रधान योद्धाओं को साथ में लेकर संग्राम में पुनः स्वयं उपस्थित हुआ। प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ करके नवमी तिथि पर्यंत श्रीराम तथा रावण के मध्य अतुलनीय, वर्णन से परे और सभी प्राणियों के लिए भयदायक अत्यंत भीषण युद्ध हुआ। जब तक षष्ठी तिथि आई तब तक प्रतिदिन उस युद्ध में राक्षसेन्द्र रावण के बहुत से असंख्य सैनिक नष्ट हो चुके थे।।46-49।।
उस षष्ठी तिथि को जगदंबा की शुभ मृण्मयी मूर्ति बनाकर सायंकाल उनका [प्राणप्रतिष्ठा का अंगभूत] अधिवास-कर्म करके लोक पितामह ब्रह्मा ने सप्तमी तिथि को पत्रीप्रविष्ट देवी का पूजन किया। पत्री प्रवेश मात्र से ही सर्वसंहारकारिणी जगदम्बा रावण के वध के लिए श्रीराम के धनुष में प्रवेश कर गईं। तत्पश्चात जगतपिता श्रीब्रह्माजी ने महाष्टमी तिथि को प्रातः विपुल पूजनोपचारों से भक्तिपूर्वक भगवती की विधिवत पूजा की ।।50-52½।।
उस पूजन से प्रसन्न होकर भगवती महेश्वरी ने मध्यान्ह काल में श्रीरामचंद्र जी के बाणों में प्रवेश किया। तब मुनिश्रेष्ठ ! उन श्रीराम ने युद्ध क्षेत्र में रावण के सिरों को सैकड़ों भागों में काट डाला।।53-54।। इसके बाद पुनः जब श्रीराम ने उसका प्राणांत कर देने की इच्छा से बाण छोड़े, तब रावण ने भी भयभीत होकर भगवती का स्मरण किया। उससे उसके सिर रहित धड़ से पुनः सिर निकल पड़े और श्रीराम के महान बाणों से बेधे जाने पर भी उसने संग्राम में प्राण नहीं छोड़ा। उस रावण ने नवमी तिथि को पूर्वाह्न में आकाश में खड़े देवताओं को देखते हुए अत्यंत भीषण तथा भयदायक युद्ध किया।।55-57।। उस महानवमी तिथि को लोकपितामह ब्रह्मा ने अनेक प्रकार के सुरम्य धूप-दीप और विविध प्रकार के नैवेद्य अर्पण करके आदरपूर्वक विधि-विधान से भगवती का पूजन किया। तदनंतर जो साक्षात मुक्तिदायिनी भगवती विद्यारूपा है, वे ही स्वयं अविद्यारूप से रावण के पास गईं। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय उसने देवी का स्मरण तक नहीं किया और माया से विमोहित उस रावण के हृदय में देवी के प्रति भक्ति भी नहीं रही।।58-60½।।
क्रोध के वशीभूत होकर वह रावण अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता हुआ ब्रह्मास्त्र के जाल समूहों से राघवेंद्र के साथ युद्ध करता रहा। मुने ! उसी प्रकार श्री रामचन्द्र भी संग्राम में राक्षसों के राजा दुर्जेय रावण पर ब्रह्मास्त्र समुदायों से प्रहार करते रहे। इस प्रकार एक-दूसरे को जीतने की इच्छा वाले श्रीराम तथा रावण को क्रोधपूर्वक परस्पर प्रहार करते हुए दिन का मध्यभाग व्यतीत हो गया।।61-63½।।
तदनंतर अपरान्ह में श्रीरामचंद्र जी ने भगवती का ध्यान करके उन्हें प्रणाम किया और उन राक्षस के वध के लिए उनसे प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने भी बार-बार भक्तिपूर्वक देवी को साष्टांग प्रणाम करके दुरात्मा रावण के वध के लिए उन भगवती से प्रार्थना की।।64-65½।।
तब भगवती ने राक्षसेन्द्र रावण के वध के लिए प्रज्वलित कालाग्नि के सदृश तेजवाला श्रेष्ठ तथा अमोघ अस्त्र स्वयं प्रदान किया। ब्रह्माजी ने उस अस्त्र को शीघ्र लाकर रावण का विनाश करनेवाले श्रीराम को परम प्रसन्नता से युक्त होकर दे दिया। सर्वशक्ति सम्पन्न, तीव्रगामी, यमराजतुल्य और तेज से प्रज्वलित उस अस्त्र को देखकर रघुनन्दन श्रीराम अत्यंत हर्षित हुए।।66-68½।।
मुने ! तदनंतर उन भगवती का स्मरण करके श्रीराम ने उस रावण को लक्ष्य कर अस्त्र का सन्धान किया और धनुष की प्रत्यंचा कान तक खींचकर उस अस्त्र को छोड़ा। तदनंतर उस अस्त्र ने दुष्टचेता रावण की छाती को बेधकर उसके प्राण हर लिए और वह वेगपूर्वक पृथ्वीतल में प्रविष्ट हो गया। इसके बाद देवताओं के लिए कंटकस्वरूप वह रावण संग्राम में सभी देवताओं के देखते-देखते स्वर्ण निर्मित रथ से गिर पड़ा। उसके गिरते ही पूरी पृथ्वी हिलने लगी, समुद्र में विक्षोभ उत्पन्न होने लगा, सभी प्राणी भयभीत हो उठे और राक्षसगण विषादग्रस्त हो गए।।69-72½।।
उस दुरात्मा रावण के मारे जाने पर सभी वानरगण तथा तीनों लोकों में निवास करने वाले अन्य सभी लोग हर्षित हो उठे और जय-जयकार करने लगे, साथ ही श्रीराम के ऊपर सुगंध देने वाले पुष्पों की वर्षा होने लगी। उस समय श्रीराम की आज्ञा से जब देवराज इन्द्र ने अमृत की वर्षा की, तब जो वानरगण युद्ध में मारे गए थे, वे पुनः जीवित हो गए।।73-75।।
भाई के शोक से दु:खित विभीषण ने बहुत प्रकार से विलाप किया। इस पर भगवान श्रीराम ने उन्हें स्वयं सांत्वना दी। इसके बाद जब विभीषण ने रावण का अंतिम संस्कार किया तत्पश्चात सीता को वहाँ से बुलवाकर परम हर्ष को प्राप्त श्रीरामचंद्र जी लक्ष्मण तथा वानरों को साथ लेकर जहाँ ब्रह्माजी जगदीश्वरी की आराधना कर रहे थे, वहाँ गए ।।76-78।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीराम-रावण-संग्राम में ‘रावणवध’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
