
श्रीदेवी जी बोली – इस प्रकार इस असमय के उपस्थित होने पर मेरी संतुष्टि के लिए तीनों लोकों के निवासियों को प्रत्येक वर्ष भगवती का महोत्सव संपादित करना चाहिए।।1।। देवगणों ! तीनों लोकों में जो लोग आर्द्रा नक्षत्रयुक्त नवमी तिथि को बिल्व वृक्ष में मेरी पूजा करके भक्तिपूर्वक मेरा प्रबोधन करते हुए शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तक प्रतिदिन मेरा पूजन करेंगे, उनके ऊपर प्रसन्न होकर मैं उनके सभी मनोरथ पूर्ण करूँगी ।।2-3।।
श्रेष्ठ देवगण ! मेरे अनुग्रह से उसका कोई शत्रु नहीं होता, उसके बंधु-बांधवों का उससे वियोग नहीं होता और उसे किसी प्रकार का दु:ख तथा दारिद्रय भी नहीं होता। मेरी कृपा से उसे इस लोक तथा परलोक के मनोवांछित पदार्थ तथा अन्य सभी प्रकार की संपदाओं की प्राप्ति हो जाती है।।4-5।। भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करने वाले मनुष्यों के पुत्र, आयु तथा धन-धान्य आदि की प्रतिदिन वृद्धि होगी तथा उन्हें अचल लक्ष्मी की प्राप्ति भी होगी, व्याधियाँ नहीं होगी, कष्टकर ग्रह उन्हें पीड़ित नहीं कर सकते और उनकी अकाल मृत्यु नहीं होगी। राजा, डाकू तथा सिंह-बाघ आदि जंतुओं से वे कभी भयभीत नहीं होंगे। मेरी उपासना करने वालों के शत्रु उनके अधीन हो जाएंगे और उनके समक्ष नष्ट हो जाएंगे तथा युद्ध में सदा उनकी विजय होगी; इसमें संदेह नहीं है ।।6-9।।
श्रेष्ठ देवगण ! उनके पापकर्म नहीं रह जाते और विपदाएं भी उनके समक्ष कभी उत्पन्न नहीं होती। मेरी उपासना करने वाला मनुष्य मेरी कृपा से सुख प्राप्त करता है और अंत में मेरे लोक को प्राप्त होता है; यह सर्वथा सत्य है और इसमें कोई संशय नहीं है। करोड़ों अश्वमेघ आदि यज्ञों का जो फल होता है, वह फल मनुष्य को मेरी इस वार्षिक पूजा के करने से प्राप्त हो जाता है। मोह अथवा द्वेष के कारण जो मूढात्मा इस महोत्सव में मेरी पूजा नहीं करता है, वह मेरी योगिनियों का भक्ष्य बनता है। श्रेष्ठ देवगण ! जो लोग मृत्युलोक, स्वर्गलोक अथवा पातालोक में मेरा पूजन करेंगे, उनके ऊपर परम प्रसन्न होकर मैं प्रतिदिन उनके सभी मनोरथ पूर्ण करूँगी; यह पूर्णरूप से सत्य है ।।10-14½।।
जो लोग सात्विक भाव से युक्त होकर मेरा पूजन-अर्चन करेंगे, उन्हें न तो बलि अर्पण करना चाहिए और न तो मांसयुक्त अन्न प्रदान करना चाहिए। मेरी प्रसन्नता की अभिलाषा रखने वाले लोगों को समाहितचित्त होकर हिंसा आदि से विरत रहते हुए मांसरहित नैवेद्य, वेदांग आदि से उद्भूत स्मृतियों, विविध जपों, यज्ञों तथा ब्राह्मण-भोजन आदि के द्वारा मेरी महापूजा करनी चाहिए।।15-17½।। राजस भाव से युक्त लोगों को मेरी प्रसन्नता के लिए आदरपूर्वक बहुविधि उपचारों के अर्पण करने, स्तोत्रों के पाठ, जप-यज्ञ आदि के द्वारा मेरी यह महापूजा सम्पन्न करनी चाहिए। यह पूजन दुष्ट शत्रुओं का विनाश करनेवाला तथा धन-धान्य आदि को बढ़ाने वाला है। मेरी पूजा करने वाला संग्राम में विजय और पुत्र तथा स्त्री संबंधी उत्तम ऐहिक सुख एवं श्रेष्ठ पारलोकिक सुख प्राप्त करके अंत में परम पद का अधिकारी हो जाता है।।18-21।। मेरी जो तामसी पूजा है, वह इन पूजाओं – सात्विकी, राजसी – के समान नहीं है। अतः शांत तथा ज्ञान सम्पन्न लोगों को वह पूजा नहीं करनी चाहिए।।22।।
देवगण ! आप लोग संग्राम में श्रीराम की विजय के लिए तथा उस शत्रु के नाश की इच्छा से शुक्ल पक्ष की नवमी तक प्रतिदिन मेरी पूजा करें। महानवमी को भी मुझ शत्रुनाशिनी का आप लोगों को पूजन करना चाहिए। उस पूजा से प्रसन्न हुई मैं जगत के कंटक स्वरूप अपराजेय रावण को सभी शत्रुओं सहित संग्राम में अवश्य ही मार डालूँगी। नवमी तिथि के पूजन से मुझे अपार प्रसन्नता होती है। तीनों लोकों में ज्ञानी अथवा अज्ञानी सभी को भक्तिपूर्वक या भक्ति रहित भी मेरी वार्षिकी पूजा अवश्य करनी चाहिए। देवगण ! जिस प्रकार से अष्टमी तिथि के पूजन से महान यज्ञों का फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार मेरी संतुष्टि के लिए तीनों लोकों में रहने वाले लोगों को महाष्टमी के दिन पुत्र की कामना से उपवास करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें सर्वगुण सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति अवश्य होगी। उस दिन पुत्रवान लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए। अष्टमी तिथि को उपवास और नवमी तिथि को पूजन करने से प्राप्त होने वाले फल को अश्वमेघ आदि यज्ञों के फल से बड़ा समझना चाहिए।।23-32।।
श्रीमहादेव जी बोले – जगदंबिका का यह वचन सुनकर ब्रह्मा आदि देवगण विधि-विधान से बलि प्रदान करके शत्रुओं से विजय के लिए नवमी पर्यंत प्रतिदिन उन जगदीश्वरी की उपासना में भक्तिपूर्वक तत्पर रहे ।।33।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘शारदीय पूजाविधानकथन’ नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
