महाभागवत – देवीपुराण – चालीसवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – विभीषण को पूर्णरूप से शरणागत जानकर महाबाहु श्रीराम ने उसके साथ मैत्री स्थापित की और उसे लंका के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया।।1।। तत्पश्चात समुद्र के पार जाने की इच्छा से श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव से उनकी सेना का बलविक्रम जानने हेतु प्रश्न किया।।2।। सुग्रीव ने उत्तर दिया कि भगवन ! आपको इस विषय में चिंता नहीं करनी चाहिए। हम लोग पर्वतों को उखाड़कर समुद्र को सुखा डालेंगे और इस महासमुद्र पर सेतु का भी निर्माण करेंगे, जिससे आप सुविधापूर्वक पार जा सकेंगे। सत्यपराक्रमी श्रीराम ने सुग्रीव की बातें सुनकर प्रसन्नतापूर्वक ऐसी व्यवस्था की, जिससे दुस्तर समुद्र ने स्वयं ही बंधन स्वीकार कर लिया ।।3-4 ½।। 

मुनिवर ! तत्पश्चात सुग्रीव की आज्ञा से मयपुत्र नल ने पर्वतों को उखाड़-उखाड़कर समुद्र में सेतु का निर्माण किया। मुनिशार्दूल ! श्रावण की पूर्णिमा को प्रारंभ कर उन वानर श्रेष्ठ ने मात्र दो प्रहर में ही समुद्र में सेतु का निर्माण कर दिया, जो सभी लोगों के लिए अत्यंत दुष्कर था।।5-7।। 

रावण ने जब महासमुद्र पर सेतुबंधन की बात सुनी तो वह मोहित तथा भयाक्रांत होकर बार-बार कांपने लगा।।8।। महामते ! इधर लाखों-करोड़ों महाबलशाली वानरों से घिरे हुए महाबाहु श्रीराम, लक्ष्मण के साथ कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को लंका गए। परम पराक्रमी वानरों ने लंका को चारों ओर से घेर लिया। महामते ! जल में, स्थल पर, परकोटों पर, वृक्षों पर, घरों में, चौराहों पर, प्रवेश द्वार पर, और वन-उपवन में कोई ऐसा स्थान नहीं बचा, जहाँ वानर न हों।।9-11½।। 

तब युद्ध प्रारंभ करने की इच्छा वाले भगवान श्रीराम ने मन में विचार किया कि लंका पर विजय पाने के लिए मुझे महादेवी सुरेश्वरी भगवती का पूजन करना है, किन्तु यह उसका प्रशस्त समय नहीं है। इस समय दक्षिणायन है और त्रैलोक्य जननी जगदंबा सोयी रहती हैं, ऐसा सोचकर श्रीराम रूप में प्रकट भगवान अच्युत नारायण ने उन सनातनी शक्ति का पितृरूप से पूजन करने का निश्चय किया ।।12-14½।। 

वे महामाया भगवती इस पक्ष में पितृ रूप से विराजमान रहती हैं, कृष्ण पक्ष प्रारंभ हो गया है और प्रतिपदा तिथि भी है, इसलिए आज से प्रारंभ कर के मैं अमावस्या तक प्रतिदिन पार्वण विधि से विधिपूर्वक जयप्रदा महादेवी का पितृ रूप से पूजन करके ही युद्धभूमि में प्रवेश करूँगा, जिससे शत्रुओं का संहार हो सके। ऐसा मन में निश्चय करके लंका में श्रीराम ने आदर सहित घोषणा की कि आज अपरान्हकाल में मैं भक्तिपूर्वक पार्वणश्राद्ध करूँगा। तत्पश्चात मैं राक्षसराज रावण के साथ समरभूमि में युद्ध करूँगा। उनकी यह बात सुनकर वानरों ने रघु के वंश में प्रादुर्भूत श्रीराम से कहा – नीतिज्ञ ! आप युद्ध में विजय के लिए भक्तिभाव से पितरों का पूजन करें। आप स्वयं ही सभी विधि-विधान के ज्ञाता हैं ।।15-20।। 

तब अपरान्हकाल में सत्यपराक्रमी श्रीराम ने देवी का स्मरण करते हुए पार्वणश्राद्ध सम्पन्न किया ।।21।। पश्चिम दिशा में सूर्य के अस्त हो जाने पर उसी दिन उनका राक्षसों के साथ युद्ध आरंभ हो गया। उस युद्ध में श्रीराम और रावण ने जैसा पराक्रम दिखाया, वैसा कभी किसी ने न देखा था, न सुना ही था ।।22-23।। 

रावण ने एक अक्षोहिणी चतुरंगिणी सेना के साथ महाबलवान राक्षस अकंपन को युद्धभूमि में भेजा। मुने! प्रथम दिन के युद्ध में पवनपुत्र हनुमान ने क्रुद्ध होकर उस पर प्रहार किया और उसे यमलोक भेज दिया ।।24-25।। इसी प्रकार श्रीराम भक्तिपूर्वक प्रतिदिन श्राद्ध करके देवी को प्रसन्न करते हुए राक्षसों का संहार करते थे ।।26।। अकंपन के मारे जाने पर रावण की आज्ञा से सेना सहित धूमराक्ष युद्धभूमि में आया और उसने भयंकर युद्ध किया। श्रीराम ने दूसरे दिन युद्ध में उस वीर राक्षस का संहार किया, इसी प्रकार उस महासमर में अन्य दुरदाँत दैत्यों के मारे जाने पर रावण का मामा प्रहस्त युद्ध हेतु आया। उसके साथ रात्रि में दुर्धर्ष युद्ध हुआ। वह युद्ध देवताओं, दैत्यों, राक्षसों और मनुष्यों के लिए समान रूप से भयकारी था। उस राक्षस वीर के भयंकर गर्जन से देवगण कांपने लगे। वे देवगण युद्ध देखना छोड़कर सभी दिशाओं में भाग चले। उस दुर्धर्ष दैत्य का भी महाबली श्रीराम ने उसी रात्रि के अंतिम प्रहार में संहार कर दिया। राक्षसराज रावण इस वृतांत को सुनकर अत्यंत दु:खी हो रोने लगा ।।27-32।। 

रावण को सांत्वना देकर प्रतापी मेघनाद रात्रि में ही युद्ध के लिए आकर अदृश्य रूप से आकाश में स्थित हो गया। महामते ! उसने भयंकर नागपाश से सभी वानर-भालुओं के साथ श्रीराम-लक्ष्मण को बांध लिया। राक्षसराज रावण के समान बलशाली उस वीर मेघनाद ने अपनी माया से सबको मोहित कर दिया। तब विभीषण ने आकर रघुनन्दन श्रीराम को रात्रि के उसी क्षण में सचेत किया ।।33-35½।। सचेत होने पर भगवान श्रीराम ने भयभीत होकर महान भय का नाश करने वाली भगवती भवानी का परम भक्तिभाव से स्मरण किया ।।36½।। 

तब गरुड ने आ करके उस भयंकर नागपाश को खाकर सैनिकों सहित राम-लक्ष्मण को बंधन से मुक्त कर दिया ।।37-38।। तदनंतर प्रातःकाल उस प्रसंग को सुनकर रावण स्वयं युद्धभूमि में आया और सभी लोकों को भयभीत करने वाला तुमुल युद्ध करने लगा। रावण को प्रलयकालीन यमराज के समान युद्धभूमि में देखकर सभी वानर भय विह्वल हो कांपने लगे। महात्मा श्रीराम के साथ रावण का अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें हजारों-करोड़ों वीरों का संहार हुआ ।।39-41।। 

मुने ! क्रुद्ध कमलनयन श्रीराम ने युद्ध में अपनी शरवर्षा से रावण को ढक दिया। करोड़ों वानरों ने भी पर्वत शिखरों को लाकर उस दुष्ट आत्मा के रथ पर फेंका। विशाल पर्वत के आकार वाले उस महावीर पर उन वानरों ने शाल, प्रियाल आदि तथा वन में उगे अन्य बड़े-बड़े वृक्षों से प्रहार किया। मुनिश्रेष्ठ ! हनुमान, अंगद, महाबल, बलीमुख इत्यादि वानर वीरों के द्वारा फेंके गए सैकड़ों-हजारों पर्वतखंडों से वह रावण रथविहीन हो गया ।।42-46।। 

सूर्य और चंद्र के समान तेजस्वी महाबल-पराक्रमी दोनों भाइयों श्रीराम और लक्ष्मण ने युद्ध में हँसते हुए अपना धनुष उठाकर तेजी से यमदण्ड के समान बाणों को चलाकर युद्धोन्मत रावण को ढक दिया ।। 47-48।। मुने ! उस युद्धभूमि में वानरों की किलकीलाहट, धनुषों की टंकार, राक्षसों के भयंकर गर्जन, रथों की घरघराहट, हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की हिनहिनाहट से सभी प्राणियों को लगा जैसे अकाल प्रलय हो रहा हो ।।49-50।। 

तब चलाए गए बाणों और बड़े-बड़े पर्वतों से राक्षसराज रावण ढक गया। तत्पश्चात वह युद्ध भूमि में क्षत-विक्षत होकर भयातुर हो युद्ध छोड़कर अपनी रम्यपुरी लंका में चला गया ।।51-52।। 

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘रावण-युद्धभंगवर्णन’ नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।