महाभागवत – देवीपुराण – उनतालीसवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेवजी बोले – मारीच को मारकर जब श्रीराम लक्ष्मण के साथ जब अपनी पर्णकुटी पर आए, तब उन्होंने वहां जानकी को नहीं देखा ।।1।। शोकाकुल होकर वे सीता का स्मरण करते हुए वन में भटकने लगे। वहाँ उन्होंने कटे पंखवाले पक्षिराज जटायु को देखकर यह अनुमान किया कि इसी ने सीता का अपहरण किया होगा – ऐसा सोचकर उसे मारने की इच्छा से वे उसके पास गए। वहां जाने पर उन्हें पता चला कि जटायु उनके पिता दशरथ जी के मित्र हैं। यह जानकर सत्यपराक्रमी श्रीराम ने उन पर बाण नहीं छोडा। जटायु ने श्रीराम को रावण के द्वारा सीता हरण की बात बताकर उनके देखते देखते अपने प्राण त्याग दिए और स्वर्ग को प्रस्थान किया। तदनंतर श्रीराम ने वन में ही उनकी अन्त्येष्टि की।।2-5।।    

महामते ! कबंध नामक राक्षस का वध करके वे दोनों भाई ऋश्यमूक पर्वत की ओर चले गए, जहां बाली के भय से सूर्यपुत्र सुग्रीव अपने हनुमान इत्यादि चार प्रमुख वीर मंत्रियों के साथ रहते थे। महामते ! वहां महामना सुग्रीव के साथ मैत्री कर के और अत्यंत पराक्रमी बाली को युद्ध में मारकर श्रीराम ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया ।।6-8।।   

मुनिवर ! तदनंतर वर्षा ऋतु बीतने पर माल्यवान पर्वत पर विराजमान श्रीराम के पास सुग्रीव ने विशाल वानर सेना को बुलाया और उन्होंने जनक नंदिनी सीता की खोज करने के लिए भूमंडल पर चारों दिशाओं में दूतों को भेजा। वे दूत भी सीता की खोज में निकल पड़े।।9-10।। दक्षिण दिशा की ओर महाबल और पराक्रम से युक्त हनुमान, अंगद, जांबवान इत्यादि मुख्य वीर चल पड़े। महामते ! उन्होंने संपाती के मुख से विस्तृत रूप से सारी बात सुनकर समुद्र को शीघ्र लांघने के लिए विचार-विमर्श किया ।।11-12।। 

तब ऋक्षराज जांबवान की बात सुनकर प्रचंड पराक्रमी हनुमान जी ने सौ योजन विस्तार वाला भयंकर समुद्र पारकर सायंकाल में लंका में प्रवेश किया और रात्रि में लंका नगरी में घूम-घूमकर वे जनक नंदिनी सीता को खोजने लगे। इस प्रकार उन्होंने सात रात्रियां व्यतीत कीं। तब हनुमान जी ने अशोक वाटिका में शुभ दर्शना सीता को देखा और अत्यंत दुष्कर कार्य सम्पन्न करने का निश्चय किया।।13-15।। 

उन्होंने देवी के साथ हुए युद्ध के पूर्व वृतांत का स्मरण किया। तत्पश्चात वे एक वृक्ष की चोटी पर चढ़कर देवी के अद्भुत मंदिर को देखने की इच्छा से सभी दिशाओं में दृष्टिपात करने लगे। तब उन्हें पूर्वोत्तर दिशा में एक सुंदर मंदिर दिखाई दिया। उस स्वर्णचित मंदिर में मणि-माणिक्य जड़े हुए थे और उसके ऊपर सिंहध्वज लगा हुआ था। उसे देखकर हनुमान जी ने निश्चय किया कि यही देवी का मंदिर है। उस मंदिर के द्वार पर जाकर उन्होंने सुरेश्वरी जगदम्बा के दर्शन किए। वे अपनी योगिनियों के साथ हँसती हुई नृत्य कर रही थीं। उन महादेवी की प्रदक्षिणा करके हनुमान जी ने प्रणाम किया और अत्यंत भक्तिपूर्वक त्रिलोक वंदनिया जगदम्बा से वे कहने लगे ।।16-21।। 

हनुमान जी बोले – देवि ! विश्वेश्वरी ! आप प्रसन्न हों, मैं श्रीराम का अनुचर हूँ और जानकी रूप से अवतरित लक्ष्मी जी को ढूँढने लंका में आया हूँ। शिवे ! आपकी ही प्रेरणा से दुरात्मा राक्षसराज रावण का वध करने हेतु भगवान विष्णु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है। मैं भी शिव हूँ और पृथ्वी पर वानर रूप मे उत्पन्न होकर आपके आज्ञानुसार श्रीराम की सहायता करने आया हूँ। आपने ऐसा पहले कहा था कि मैं जब लंका में आऊँगा, तब आप इस नगरी का त्याग करके अपने लोक को प्रस्थान कर जाएगी। इसलिए महादेवी ! आप इस नगरी का त्याग कर दें, उस दुर्धर्ष रावण का विनाश करें और इस चराचर जगत की रक्षा करें ।।22-26।।   

श्रीदेवी जी बोली – वानरश्रेष्ठ ! रावण द्वारा सीता के अपमान से मैं रुष्ट हूँ। पुरुषश्रेष्ठ ! मैंने पहले ही लंका को त्यागने का विचार कर रखा है। वानरश्रेष्ठ ! आपसे यह बात सुनने के लिए ही मैं अब तक रावण की नगरी में स्थित हूं। अब आपके कथनानुसार मैं इस लंकापुरी का त्याग कर रही हूँ।।27-28।।   

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे महेश्वरी भवानी हनुमान जी के देखते-देखते सहसा लंका का त्याग करके अन्तर्धान हो गईं।।29।। तब क्रोध उन्मत्त हनुमान जी ने राक्षसराज रावण के द्वारा पोषित अशोक वाटिका को उखाड़ डाला ।।30।। नारदजी ! इसकी खबर मिलने पर रावण ने क्रोधपूर्वक बहुत-से राक्षसों के साथ ‘अक्ष’ नाम के अपने पुत्र को भेजा। महाबलशाली महाबाहु हनुमान जी ने बलपूर्वक पेड़ों को उखाड़कर उन्हीं वृक्षों से उन्हें मार डाला।।31-32।।  तब राक्षसराज रावण ने हनुमान जी का अंग-भंग करने के लिए उनकी पूंछ में कपड़े लपेटकर आग लगवा दी।।33।।  

नारदजी ! वीरवर हनुमान उसी आग से लंकापुरी को जलाकर पुनः समुद्र को लांघकर समुद्र के तट पर आए जहां वे अंगद, जांबवान आदि प्रमुख वीर स्थित थे। उनके साथ सुग्रीव के मधुवन का उपभोग कर वे श्रीराम के निकट उपस्थित हुए।।32-35½।। मुनिवर ! श्रीराम ने दूर से ही उन्हें देखकर जनक नंदिनी का संवाद पूछा। तब प्रसन्नचित्त होकर हनुमान जी ने जैसा हुआ था, सारा वृतांत श्रीराम को निवेदित किया।।36-37।। 

तब श्रीराम ने सभी वानरों के साथ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को प्रस्थान किया और महामते ! राक्षसराज रावण के वध हेतु श्रेष्ठ वानर सेना सहित श्रीराम ने डेरा डाल दिया ।।38-39।। इसी बीच राक्षसराज रावण ने भी 

अपने सभी मंत्रियों को बुलाकर विचार-विमर्श करने के लिए सभा आयोजित की। वहां नीति कुशल महाबुद्धिमान विभीषण ने सब प्रकार से दशानन रावण को युद्ध से रोकने वाली बातें कहीं। उन्होंने राघवेंद्र श्रीराम का पराक्रम बताते हुए सीता को वापस भेजने की पुनः सलाह भी दी। मुने ! यह सुनकर रावण क्रोधित हो गया और उसने पैर से विभीषण पर प्रहार किया। तत्पश्चात धर्म स्वरूप वे विभीषण भी कुपित होकर अपने चार मंत्रियों के साथ भगवान श्रीराम की संनिधि में आ गए।।40-43।।   

। । इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंर्तगत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘रावणमंत्रणावर्णन’ नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।