महाभागवत – देवीपुराण – सैंतीसवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – भगवती के ऐसे वचन सुनकर नेत्रों में आह्लाद भरे हुए भगवान विष्णु ने उन्हें भक्तिपूर्वक पुनः प्रणाम किया तथा ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान शिव से ऐसा कहा – ।।1-2।। 

श्रीभगवान बोले – देवाधिदेव ! विश्वनाथ ! भगवती जगदम्बा ने आपके समीप जैसा कहा है आपने वह सुना ही है। शंकर ! अब उस दुर्बुद्धि रावण के संहार हेतु जो आप मेरी सहायता करना चाहते हैं, महेशान ! वह मुझे बताइए।।3-4।।

शिवजी बोले – मधुसूदन ! मैं वानाररूप से पवनपुत्र होकर जन्म लूँगा और आपकी यथोचित सहायता करूंगा। मधुसूदन ! विशाल महासागर को लांघकर और आपकी पत्नी की खोज करके मैं सदा के लिए आपका प्रेमभाजन बनूँगा। विष्णु ! और भी आपकी प्रसन्नता को बढ़ाने वाले अत्यंत कठिन और दारुण कार्यों को सम्पन्न करूंगा। जब मैं लंका में सूक्ष्म वानररूप से प्रवेश करूंगा तब स्वयं लंकेश्वरी देवी निश्चय ही लंका का त्याग कर देंगी। मैंने वह बता दिया जिस प्रकार की सहायता मैं करूंगा, क्या वह ब्रह्माजी और आपकी प्रसन्नता के लिए होगी?।।5-9।।

श्रीमहादेव जी बोले – सदाशिव के ऐसा कहने पर हर्ष से परिपूर्ण मन वाले महाबाहु भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी का ध्यान किया और ब्रह्माजी को देखा ।।10।। तब ब्रह्माजी ने भी भगवान विष्णु की इच्छा को जानकर हँसते हुए निर्विकार भगवान नारायण से ऐसा कहा – ।।11।।

ब्रह्माजी बोले – देव ! मैं आपकी सहायता के लिए अपने अंश से ऋक्षयोनि में महाबल तथा पराक्रम से युक्त होकर पहले ही जन्म ले चुका हूँ, मैं आपके हित में निरंतर आपको अच्छी सलाह दूंगा। धर्मराज स्वयं लंका में उस दुरात्मा राक्षसराज रावण के भाई विभीषण के रूप में जन्म ले चुके हैं। देव ! वे भी अपने भाई का साथ छोड़कर आपके सहायक बनेंगे। आप शीघ्र ही मनुष्यरूप में अवतार लें और इस चराचर जगत की रक्षा करें। ।।12-15।। 

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार भगवान विष्णु ने परमेश्वरी जगदम्बा की प्रार्थना करके भूलोक पर महाराज दशरथ के घर में जन्म लिया। ।16।। मुनीश्वर ! वे स्वयं एक ही चार रूपों में महाराज दशरथ के यहाँ महाबली राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए, जो पराक्रम के साथ ही अत्यंत रूप-सौन्दर्य की राशि भी थे।।17½।। महामते ! श्रीराम और भरत दोनों दूर्वादल की श्याम आभा से युक्त थे और दूसरे दो – लक्ष्मण और शत्रुघ्न स्वर्ण के समान गौर छवि वाले थे। मुनिवर ! बाल्यकाल से ही शुभ लक्षणों से युक्त लक्ष्मण सदैव श्रीराम के और शत्रुघ्न श्रीभरत के अनुगामी थे। ।18-19½।। 

भगवती लक्ष्मी भी महाराज जनक के घर में परम सुंदरी कन्या के रूप में पृथ्वीतल पर अवतरित हुई। ब्रह्मा अपने अंश से ऋक्ष योनि में महाबुद्धिमान जांबवान के रूप में विख्यात हुए। इसी प्रकार भगवान शिव अपने अंश से अवतार लेकर महाबल और पराक्रम से युक्त पवनपुत्र हनुमान के रूप में विख्यात हुए। वे किष्किन्धा नगरी में रहते हुए वानरराज के मंत्री बने। महामति नारदजी ! अन्य देवगण भी इसी प्रकार ऋक्ष और वानर के रूप में प्रकट होकर वनप्रान्त में रहते हुए रामरूप में भगवान विष्णु के अवतार ग्रहण की प्रतीक्षा करने लगे। । 20-24 । । 

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीरामावतार चरित्र वर्णन’ नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।37।।     

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