जन्म कुंडली के अनुसार समस्याएँ और उनका मंंत्रोपचार 

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जन्म कुंडली में मौजूद दोषों के कारण व्यक्ति को जीवन में अनेकों बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है।  इन दुर्योगों के कारण जीवन में प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जाता है तथा आर्थिक परेशानियाँ भी मुँह बाये खड़ी हो जाती हैं। जन्म कुंडली में यदि केमद्रुम योग बन रहा है या कालसर्प योग बन रहा है या दरिद्री योग बन रहा है तब आर्थिक परेशानियों का सामना अधिक करना पड़ सकता है। कई बार कर्जे इतने अधिक हो जाते हैं कि उतरने का नाम ही नहीं लेते। ऎसे ही कई प्रकार की अन्य परेशानियों से जीवन दुखी हो जाता है। इस लेख में ऎसे ही कई प्रकार की परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए मंत्रोपचार बताया जा रहा है ताकि पाठकगण स्वयं उन्हें कर सकें और अपना जीवन सुगमता से व्यतीत कर सके।  

 

केमद्रुम योग 

जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में चंद्रमा के साथ अथवा चंद्र से एक भाव आगे और एक भाव पीछे कोई ग्रह स्थित नहीं है तब इसे केमद्रुम योग कहा जाता है। (यदि चंद्रमा के आगे या पीछे राहु/केतु हैं तब भी चंद्रमा को अकेला ही माना जाएगा और केमद्र्म योग बनेगा) चंद्रमा के आगे पीछे कोई ग्रह ना होने से यह अकेला पड़ जाता है और व्यक्ति को कोई ना कोई भय सताता रहता है। चंद्रमा मन है और मन को किसी का सहारा ना हो तब परेशानी आती है।  

केमद्रुम योग के प्रभाव से व्यक्ति को जीवन में एक समय ऎसा देखना पड़ जाता है जब उसे संघर्षों से होकर निकलना पड़ता है। ये संघर्ष किसी भी रूप में हो सकते हैं। जब संघर्ष का समय बीत जाता है तब नया चंद्रमा धुला हुआ सा सामने आता है और व्यक्ति का मन अब दृढ़ निश्चयी बनता है।  

यदि किसी की जन्म कुंडली में केमद्रुम योग बन रहा है तो उसके भंग होने के योग भी कुंडली में ही मौजूद होते हैं।  अगर शुभ ग्रह चंद्रमा से केन्द्र में हो प्रबल रुप से भंग होता है, लेकिन जो योग बना है उसका कुछ फल तो जीवन में एक बार भोगना ही पड़ता है।  

 

केमद्र्म योग की शांति

यदि किसी जातक की कुंडली में केमद्रुम योग बन रहा है तब इस योग की शांति करके इसके अशुभ फलों की रोकथाम की जा सकती है क्योंकि इस योग के कारण अनेकों बार धन हानि का सामना करना पड़ जाता है। इस योग की शांति के लिए “लक्ष्मी मंत्र” का अनुष्ठान किया जा सकता है।  

नवरात्रि, दीपावली अथवा किसी अन्य शुभ दिन में अनुष्ठान किया जा सकता है। सुबह स्नानादि के बाद एक लक्ष्मी यंत्र लेकर उसकी विधिवत स्थापना करनी चाहिए। लक्ष्मी यंत्र लेकर उसका पंचोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए। पूजन करने के बाद निम्न मंत्रों में से किसी एक मंत्र का चार लाख जप करना चाहिए। इस अनुष्ठान के साथ ही यदि श्रीसूक्त तथा लक्ष्मी सूक्त का पाठ भी किया जाए तो विशेष लाभकारी फल मिलते हैं।  

  1. ऎं श्रीं ह्रीं क्लीं 
  2. ऊँ ऎं  ह्रीं श्रीं क्लीं ह् सौ: जगत्प्रसूत्यै नम: 

 

दरिद्र योग की शांति 

यदि जन्म कुंडली के अनुसार धन का अभाव व्यक्ति के जीवन में लगातार बना हुआ है तब ऎसे में कुछ मंत्रों का जाप करके धनाभाव दूर किया जा सकता है। ग्रह शांति मंत्र के साथ नवग्रहों का पूजन करके निम्न मंत्रों में से किसी भी एक मंत्र का एक लाख जप किया जाना चाहिए। यदि रविमंत्र करते हैं तब आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति भौम मंत्र करता है तब उसके साथ में भौम स्तोत्र अथवा मंगल स्तोत्र का पाठ भी अवश्य करना चाहिए।  

निर्धनता नाशक रविमंत्र 

ऊँ ह्रीं घृणि: सूर्य आदित्य: श्रीं ।

 

निर्धनता नाशक भौम मंत्र 

ऊँ श्रीं ऋणहर्त्रे नमस्तुभ्यं दु:खदारिद्रयनाशिने नभसि घोतमानाय मंगलप्रद मंगल ह्रीं । 

 

विघ्नबाधा दूर करने हेतु गणेश मंत्र 

किसी भी शुभ मुहूर्त तथा शुभ वार में श्रीगणेश यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। यंत्र स्थापित कर उसकी पंचोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजा करनी चाहिए। उसके बाद नीचे दिए मंत्र का एक लाख जप करना चाहिए। जप संख्या पूर्ण होने पर व्यक्ति के जीवन की सभी प्रकार की बाधाएँ स्वत: दूर होने लगती है। बिगड़ते हुए काम बनना आरंभ हो जाते हैं।  

 

मंत्र – 

ऊँ गं गणपतये नम: 

 

कर्ज मुक्ति हेतु कुबेर मंत्र 

किसी भी शुभ मुहूर्त में उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए और अपने सामने कुबेर यंत्र की स्थापना करनी चाहिए, यंत्र का पूजन करना चाहिए। उसके बाद रात्रि के प्रथम प्रहर में निम्नलिखित में से किसी भी एक कुबेर मंत्र का जाप एक लाख की संख्या में करना चाहिए। जाप समाप्त होने पर बिल्वपत्रों से दशांश हवन करना चाहिए।  

यदि किसी व्यक्ति को शीघ्रता ना हो तब इस कुबेर मंत्र का अनुष्ठान धनतेरस के दिन करना अधिक शुभफल प्रदान करता है। काली चौदस अथवा दीपावली की रात्रि में भी इस मंत्र का अनुष्ठान अत्यधिक शुभ फल देने वाला होता है।  

 

कुबेर मंत्र 

  1. ऊँ श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम: ।
  2. ऊँ श्रीं यक्षाय कुबेराय सिद्धिं समृद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ।
  3. यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ।