कात्यायनी स्तुति:

नमस्ते   त्रिजगद्वन्द्ये   संग्रामे    जयदायिनि।

प्रसीद   विजयं   देहि   कात्यायनि  नमोSस्तु ते ।।1।।

 

सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि।

दुष्टजृम्भिणि   संग्रामे   जयं   देहि  नमोSस्तु ते।।2।।

 

त्वमेका   परमा   शक्ति:   सर्वभूतेष्ववस्थिता।

दुष्टं  संहर  संग्रामे  जयं देहि      नमोSस्तु ते।।3।।

 

रणप्रिये      रक्तभक्षे       मांसभक्षणकारिणि।

प्रपन्नार्तिहरे  युद्धे   जयं  देहि  नमोSस्तु ते।।4।।

 

खट्वांगासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे।

ये त्वां  स्मरन्ति  दुर्गेषु  तेषां दु:खहरा भव।।5।।

 

त्वत्पादपंकजाद्दैन्यं   नमस्ते    शरणप्रिये।

विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोSस्तु ते।।6।।

 

अचिन्त्यविक्रमेSचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि।

अचिन्त्यचरितेSचिन्त्ये जयं देहि नमोSस्तु ते।।7।।

 

ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवीं दुर्गविनाशिनीम्।

नावसीदन्ति  दुर्गेषु  जयं  देहि नमोSस्तु ते।।8।।

 

महिषासृक् प्रिये   संख्ये   महिषासुरमर्दिनि।

शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोSस्तु ते।।9।।

 

प्रसन्नवदने       चण्डि     चण्डासुरमर्दिनि।

संग्रामे  विजयं देहि शत्रूण्जहि नमोSस्तु ते।।10।।

 

रक्ताक्षि    रक्तदशने   रक्तचर्चितगात्रके।

रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोSस्तु ते।।11।।

 

निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि  विश्वकर्त्रि  सुरेश्वरि।

जहि शत्रूण् रणे नित्यं जयं देहि नमोSस्तु ते।।12।।

 

भवान्येतज्जगत्सर्वं  त्वं  पालयसि  सर्वदा।

रक्ष  विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान्।।13।।

 

त्वं हि  सर्वगता  शक्तिर्दुष्टमर्दनकारिणि।

प्रसीद जगतां मातर्जयं  देहि नमोSस्तु ते।।14।।

 

दुर्वृत्तवृन्ददमनि    सद्वृत्तपरिपालिनि।

निपातय  रणे  शत्रूण्जयं देहि नमोSस्तु ते।।15।।

 

कात्यायनि  जगन्मात:   प्रपन्नार्तिहरे  शिवे।

संग्रामे   विजयं  देहि  भयेभ्य:  पाहि  सर्वदा।।16।।

 

।।इति श्रीमहाभागवते महापुराणे श्रीरामकृता कात्यायनिस्तुति: सम्पूर्णा।।

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