कार्तिक माह के व्रत तथा त्यौहार – भाग 2

छोटी दीवाली – Chhoti Diwali

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही छोटी दीवाली के रुप में मनाया जाता है. इस दिन का त्यौहार विभिन स्थानों पर अपने रीति-रिवाजों से ही मनाया जाता है.भारत के भिन्न-भिन्न भागों में इसे सब अपने लोकानुसार मनाया जाता है. संध्या समय में दीपक जलाने का चलन सभी जगहों पर समान ही है.

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बड़ी दीवाली – Badi Diwali

कार्तिक अमावस्या को बड़ी दीवाली के रुप में मनाया जाता है. पुराणों में ऎसा उल्लेख भी मिलता है कि लक्ष्मी जी का पूजन भगवान नारायण ने ही बैकुंठ धाम में सबसे पहले किया था. दीवाली का यह त्यौहार मुख्यत: पाँच दिन तक चलता है क्योंकि यह धन तेरस से आरंभ होकर भैया दूज पर जाकर खतम होता है. दीवाली के दिन लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा भी की जाती है.

इस अमावस्या के दिन कई स्थानों पर सुबह के समय पितरों की धोक भी मारी जाती हैं. सुबह से घर को सजाया जाता है. शाम को पूजा कर के घर को रोशनी से जगमग करते हैं. बहुत से दीए जलाए जाते हैं और पकवान भी बनाते हैं. रात को बच्चे व बड़े मिलकर पटाखे जलाते हैं. पूजा स्थान पर रात भर एक दीपक जलाया जाता है जो सुबह तक जलता है.

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लक्ष्मी जी की कहानी – Story Of Lakshmi Ji

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किसी नगर में एक साहूकार था और उसकी एक बेटी भी थी. वह हर रोज पीपल सींचने जाती थी. उसमें से रोज लक्ष्मी जी बाहर निकलती और चली जाती थी. एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की लड़की से कहा कि तुम मेरी सहेली बनोगी? लड़की ने कहा कि मैं अपने पिताजी से पूछकर कल बताऊँगी. साहूकार ने सारी बात सुनकर लड़की से कहा कि वह तो लक्ष्मी है, हमें क्या चाहिए, तू बन जा उसकी सहेली. अगले दिन लड़की फिर पीपल सींचने गई तो लक्ष्मी जी निकलकर आई. लड़की ने कहा कि ठीक है मैं तुम्हारी सहेली बन जाती हूँ.

लक्ष्मी जी की सहेली बनने के कुछ दिन बाद ही लक्ष्मी जी साहूकार की बेटी को अपने घर जीमने के लिए न्यौता देती हैं. घर आकर लड़की अपने पिता को जीमने की बात बताती हैं तो साहूकार कहता है कि ठीक है चली जा पर घर संभालकर जाना. लक्ष्मी जी के यहाँ जब लड़की जीमने गई तो लक्ष्मी जी ने उसका बहुत सत्कार किया. उसे शाल-दुशाला दिया और जाते हुए बहुत से रुपये भी दिए और कहा कि अब मैं तुम्हारे घर जीमने आऊँगी. लड़की ने हाँ कर दी.

लड़की घर आकर चुपचाप बैठ गई तो उसके पिता ने इसका कारण पूछा. उसने कहा कि लक्ष्मी जी ने मेरा बहुत आदर-सत्कार किया और मुझे बहुत कुछ दिया लेकिन हम उसे क्या दे सकते है? हमारे घर में तो कुछ भी नहीं है? पिता ने कहा कि जैसे भी हैं जो भी हैं हम उसी से जिमा देगें. तुम गोबर मिट्टी से चौका-चूल्हा लीप लो. तुम चौमुखा दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का नाम लेकर् बैठ जाना. लड़की सारी सफाई कर के लड्डू लेकर बैठ गई. उसी समय एक रानी नहा रही थी तो एक चील उसके गले से नौलखा हार लेकर उड़ गई और जब चील ने लड़की के हाथ में एक लड्डू देखा तो वह लड्डू लेकर और हार छोड़कर चली गई.

लड़की ने हार हाथ में आने पर उसे तोड़कर वह सुनार के पास ले गई और सामान लाने लगी. सुनार ने कहा कि क्या चाहिए? तब उसने कहा कि सोने की चोकी, सोने का दुशाला, सोने का थाल दे दे. मोहर भी दे और सारी सामग्री भी दे. मैं छत्तीस प्रकार का व्यंजन बना सकूँ इतना सामान दे. सभी चीजें लाकर उसने रसोई बनाई और तब गणेश जी से कहा कि लक्ष्मी जी को बुलाओ. आगे गणेश जी और उनके पीछे लक्ष्मी जी चली आई. लड़की ने चौकी बिछाकर लक्ष्मी जी से कहा कि इस पर बैठ जा तो लक्ष्मी जी बोली कि इस पर तो राजा-रानी भी नहीं बैठे, कोई भी नहीं बैठा! तब लड़की ने कहा कि मेरे यहाँ तो बैठना पड़ेगा नहीं तो मेरे माँ-बाप, भाई-बहन और मेरी पोते-बहुएँ क्या कहेगें, पड़ोसन मेरे बारे में क्या सोचेगी !

लक्ष्मी जी साहूकार की बेटी की सहेली बनी थी तो उनकी 28 पीढ़ियों तक यहीं रहना था इसलिए वह चौकी पर बैठ गई. लड़की तब उनकी बहुत खातिर की और जैसे लक्ष्मी जी ने किया था ठीक वैसे ही उसने भी सब काम किए. लक्ष्मी जी उससे बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने उसके घर में बहुत रुपया-धन भर दिया. घर भर में लक्ष्मी हो गई. साहूकार की बेटी ने लक्ष्मी जी को बिठाते हुए कहा कि तुम अभी बैठी रहना, मैं अभी आ रही हूँ और यह कहकर वह चली गई. लक्ष्मी जी वहीं बैठी रही और गई नहीं. उसने घर में बहुत दौलत भर दी थी.

हे लक्ष्मी माता ! जैसे आपने साहूकार की बेटी को धन से भरा वैसा ही सभी को भरना. सभी के दुख दरिद्रता दूर कर सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करना.

 

गोवर्धन पूजा अथवा अन्नकूट – Govardhan Puja Or Annakut

दूसरे दिन सुबह सवेरे उठकर स्नानादि से निवृत हो गोबर से गोवर्धन महाराज बनाए जाते हैं. रसोई घर में अन्नकूट बनता हैं और गोवर्धन के सामने दीया जलाकर उन्हे अन्नकूट का भोग लगाया जाता है. रात में फिर से गोवर्धन की पूजा की जाती है और उनकी परिक्रमा भी करते हैं. सभी लोग अपने रीति के अनुसार गोवर्धन की पूजा करते हैं. इस पर्व को पशु पालने वाले लोगों द्वारा मनाए जाने का चलन हैं. पूजा के बाद गोवर्धन की आरती भी की जाती है जो इस प्रकर है –

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श्री गोवर्धन महाराज की आरती – Shri Govardhan Maharaj Arti

श्री गोवर्धन महाराज, महाराज

तेरे माथे माथे मुकुट विराज रहयो ।

तो पे पान चढ़े, तो पे फूल चढ़े

और चढ़े दूध की धार, ओ धार । तेरे माथे……..

तेरे कानन में कुण्डल सोहे,

तेरे गले वैजन्ती माल, ओ माल । तेरे माथे…….

तेरी सात कोस की परिकम्मा,

तेरी दे रहे नर और नार, ओ नार । तेरे माथे…..

तेरे जतीपुरा में दूध चढ़त है

तेरी हो रही जै जै कार, ओ कार । तेरे माथे…..

तेरे चरणों में मानसी गंगा बहे

तेरी माया अपरमपार, ओ पार । तेरे माथे……

बृज मंडल जब डूब देखा,

ग्वाल बाल सब व्याकुल देखे,

लिया नख पर गिरवरधार, ओ धार । तेरे माथे……..

वृंदावन की कुंज गली में,

वो तो खेल रह्यो नन्दलाल, ओ लाल । तेरे माथे…….

‘चन्द्र सखी’ भज बाल कृष्ण छवि,

तेरे चरणों पै बलिहार, ओ हार । तेरे माथे………

 

गोवर्धन अथवा अन्नकूट की कथा – Story Of Govardhan Or Annakoot

एक बार भगवान कृष्ण ने देखा कि पूरे ब्रज धाम में विभिन्न व्यंजन तथा मिष्ठान्न बनाए जा रहे हैं. जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो पता चला कि मेघ देवता देवराज इन्द्र की पूजा की तैयारी हो रही है क्योंकि इन्द्र की वर्षा से बारिश होगी तो गायों को चारा मिलेगा साथ ही जीविका के साधन बनेगें. सब बातें सुनकर कृष्ण इन्द्र की निंदा करने लगे और कहने लगे कि उसकी पूजा करो जो प्रत्यक्ष आकर पूजा की सामग्री स्वीकार करता हो. गोपो ने कृष्ण से कहा कि उन्हें ऎसी बात नहीं करनी चाहिए. कृष्ण फिर से बोले कि देवराज इन्द्र से ज्यादा शक्तिशाली तो यह गोवर्धन पर्वत है जो वर्षा का मूल कारण है, हमें इसकी पूजा करनी चाहिए.

भगवान कृष्ण के वाग्जल में फंसकर सभी ब्रजवासियों ने धूम मचा दी. इसके बाद नन्दजी ने सभी ग्वाल-गोपांगनाओं सहित एक सभा में कृष्ण से पूछा कि इन्द्र की पूजा से दुर्भिक्ष का उत्पीड़न समाप्त होता है, चौमासे के सुंदर दिन आते हैं लेकिन गोवर्धन की पूजा से क्या लाभ होगा? इस पर कृष्ण जी ने गोवर्धन की प्रशंसा में बहुत से तर्क दिए और ब्रजवासियों की आजीविका का सहारा भी उसे ही सिद्ध कर दिखाया. सारा ब्रजमंडल उनकी बातों से अत्यधिक प्रभावित हो गया और सभी मिष्ठान्न तथा व्यंजनों का भोग गोवर्धन को लगा दिया गया जैसी विधि कृष्ण जी ने उनको बताई.

भगवान कृष्ण की कृपा से ब्रजवासियों द्वारा अर्पित समस्त सामग्री को गिरिराज जी ने स्वीकार किया और उन्हें खूब आशीर्वाद दिया. सारे ब्रजवासी अपना पूजन सफल देखकर प्रसन्न हो रहे थे कि तभी नारद इन्द्र महोत्सव देखने की इच्छा से ब्रज आ जाते हैं लेकिन इन्द्र का पूजन ना देख वह पूछ बैठे कि ऎसा क्यूँ? तब ब्रज के वासी बताते हैं कि भगवान कृष्ण के कहने से इस साल से इन्द्र महोत्सव समाप्त कर दिया गया है और उसके स्थान पर गोवर्धन की पूजा की गई है. यह सब सुनते ही नारद मुनि उलटे पाँव ही लौट आए और इन्दलोक जाकर खिन्न अवस्था में इन्द्र से कहने लगे कि इधर आप महलों में सुख की नींद ले रहे हो और उधर तुम्हारी पूजा समाप्त कर गोवर्धन की पूजा हो रही है.

नारद मुनि की कड़वी बातें सुनकर इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और अपने मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर प्रलयकारी मूसलाधार बारिश से पूरे गाँव को नष्ट कर दें. यह सुनते ही प्रलयकारी बादल ब्रज की ओर उमड़ पड़े. अचानक आई इस वर्षा को देख सभी ब्रजवासी घबरा गए. सभी कृष्ण भगवान की शरण में गए और बोले कि इन्द्र हमारी नगरी को डुबो देना चाहता है अब हम क्या करें? श्रीकृष्ण ने उन्हे सांत्वना देते हुए कहा कि तुम लोग सभी अपनी गऊओं को लेकर गोवर्धन की शरण में चलो वही तुम्हारी सभी की रक्षा करेगें.

सारे ग्वाल बाल गोवर्धन की तराई में पहुंच गए और श्रीकृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर उठा लिया और सात दिन तक गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे और भगवान की कृपा से उन्हें एक छींटा तक नही लग पाया. इन्द्र को यह सब देख बहुत आश्चर्य हुआ और वह भगवान की महिमा को अब समझ चुके थे. अपनी गलती का भान होने पर वह भगवान कृष्ण के चरणों में गिरकर पश्चाताप करते हैं. सातवें दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा था इसलिए प्रतिवर्ष गोवर्धन की पूजा कर के अन्नकूट मनाने की आज्ञा भगवान कृष्ण ने सभी को दी. तभी से गोवर्धन पूजा के साथ अन्नकूट भी मनाया जाने लगा.

 

भैया दूज – Bhaiya Dooj

यह त्यौहार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है. इस दिन यमुना नदी में स्नान के साथ यमराज के पूजन का विशेष विधान है. इस दिन बहने अपने भाईयों को टीका कर के उन्हें सूखा नारियल देती हैं, उन्हें जिमाती है. बदले में भाई रुपये देते हैं और कई उपहार भी देते हैं. अपनी सामर्थ्यानुसार सब इस त्यौहार को मनाते हैं.

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भैया दूज की कहानी – Story Of Bhaiya Dooj

एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था जिसकी दो संताने थी जिसमें से एक लड़का और दूसरी लड़की थी. लड़की बहुत ही सुशील थी वह कभी भूल से भी अपने भाई को भला-बुरा नहीं कहती थी. एक बार भाई अपनी बहन के घर आया तो वह चरखे पर सूत कात रही थी और सूत कातते हुए चरखे का तार टूट गया. वह बार-बार तार ठीक करती रही लेकिन उसने देखा ही नही कि भाई आया हुआ है. अचानक उसका ध्यान पीछे की ओर गया तो देखा कि उसका भाई आया हुआ है.  

अपने भाई से गले मिलने के बाद वह पड़ोसन से उसके आदर-सत्कार का पूछने गई तो उसने तेल का चौका लगाकर घी में चावल पकाए लेकिन चौका सूखा नही और चावल पके नहीं. उसने फिर दूसरी पड़ोसन से पूछा तो

गोबर का चौका लगाकर दूध व पानी में चावल डालकर खीर बनाई और तब जाकर भाई को खिलाई. अगले दिन जब भाई जाने लगा तो उसने चक्की में आटा पीसा और आटे के साथ गलती से साँप भी पिस गया जिसका पता बहन को नहीं चल पाया. उसने उसी आटे के लड्डू बनाकर रास्ते में खाने के लिए भाई को दे दिये. भाई की यह प्यारी बहन अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़ अपने भाई के रास्ते चल दी.

काफी दूर आने के बाद उसे अपना भाई एक पेड़ के नीचे सोता दिखा और पास में ही उसने पोटली रखी देखी. उसने सारे लड्डू फेंक दिए और भाई के साथ अपने पीहर चली गई. रास्ते में उसने बहुत भारी-भारी शिलाएँ उतरती देखी. उसने एक राहगीर से उन शिलाओं के बारे में पूछा तो उसने कहा कि जो बहन अपने भाई से कभी नाराज नहीं हुई हो उसके भाई ब्याह के समय ये शिलाएँ उसकी छाती पर रखी जाएंगी. कुछ दूर जाने पर नाग व नागिन मिलें. नाग बोला कि जिसकी छाती पर यह शिलाएँ रखी जाएंगी उसे हम खा जाएंगे. लड़की ने इसका उपाय पूछा तो वह बोले कि भाई के सब काम बहन करें और भाई-भाभी को कोसकर खूब गालियाँ निकालें तभी भाई बच पाएगा.

सभी बातें सुनकर रास्ते से ही वह अपने भाई को कोसने लगी. गालियाँ देती रही, पीहर पहुंचकर भी वह गालियाँ देती रही. उसके माँ-बाप को लड़की का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा. जब विवाह का लगन आया तो भाई को गाली देती हुई वह स्वयं घोड़ी पर बैठ गई. जैसे ही वह घोड़ी पर बैठी वैसे ही बड़ी-बड़ी शिलाएँ उड़ती हुई आई लेकिन पुरुष के स्थान पर स्त्री को देख वह वापिस चली गई. ऎसा देख बारात के सब लोग उसे अपने साथ ले गए. फेरों का समय आया तो उसने गंदी-गंदी गालियाँ भाई को देते हुए उसे धका दिया और स्वयं फेरे लेने लगी. वह सब काम स्वयं कर रही थी.

भाई की सुहागरात आई तो भाभी के साथ सोने भी वह चल दी. समय आने पर नाग-नागिन उसके भाई को डसने आए लेकिन वह जानती थी कि ऎसा होगा इसलिए उसने उन्हें मारने की सारी तैयारी पहले से ही कर ली थी. जैसे ही वह आए उन्हें मारकर जेब में रखकर तीन दिन तक सोई रही. घर के सारे मेहमान विदा हो गए तब उसकी माँ को याद आया कि उसे भी विदा करना है. विदा के समय माँ की उपेक्षा से वह गुस्से में बोली कि मैं इतनी नीच नहीं हूँ. उसने मरे हुए नाग-नागिन को दिखाया और बताया कि यह भाई-भाभी डसने आए थे. मैने अपनी जान पर खेल भाई की रक्षा की है.

बहन ने कहा कि इस भाई की रक्षा के लिए मैं अपने बच्चे को भी अकेला छोड़कर आई हूँ. मेरे भाई-भाई को किसी तरह का कष्ट ना हो यह कहकर वह वापिस घर लौटने लगी तो उसके भाई व माँ ने उसे रोका और आदर के साथ विदा किया.

भैया दूज के दिन कई स्थानों पर चित्रगुप्त की पूजा के साथ पुस्तकों तथा दवात की भी पूजा होती है.

 

सूर्य षष्ठी व्रत – Surya Shashti Fast

कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य षष्ठी व्रत किया जाता है. जो स्त्रियाँ इस व्रत को विधि-विधान से पूर्ण करती हैं वह धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख से संपन्न रहती हैं. इस व्रत को करने का कठोर नियम है और इसे तीन दिन तक किया जाता है. जो महिलाएँ इस व्रत को करती हैं वह पंचमी को नमक रहित भोजन करती हैं. दूसरे दिन निर्जल रहकर व्रत किया जाता है. षष्ठी के दिन ही अस्त होते सूर्य को विधिपूर्वक पूजा कर के अर्ध्य दिया जाता है.

व्रत के तीसरे दिन सुबह जल्दी उठकर नदी अथवा तालाब पर जाकर स्नान किया जाता है. स्नान के बाद जल में खड़े होकर ही उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है उसके बाद व्रत खोलते हैं.

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सूर्य षष्ठी की कहानी – Story Of Surya Shashti 

एक बार विन्दुसार तीर्थ में महीपाल नाम का एक बनिक रहता था. वह धर्म-कर्म में विश्वास नहीं रखता था और देव पूजा का विरोधी था. एक बार सूर्य भगवान की प्रतिमा के सामने ही मल-मूत्र का त्याग कर दिया. जिसके कारण उसकी आँखों की ज्योति चली गई, वह अंधा हो गया. इस पर वह अपने जीवन से हताश होकर गंगा जी में डूबकर मरने के लिए चल दिया. रास्ते में उसकी भेंट महर्षि नारद से हो गई. नारद जी ने उसे रोककर पूछा कि इतनी जल्दी-जल्दी कहाँ जा रहे हैं? महीपाल रोते हुए बोला कि मेरा जीवन दूभर हो गया है इसलिए गंगा जी में कूदने जा रहा हूँ.

नारद बोले कि मूर्ख व्यक्ति तुम्हारी यह दशा भगवान सूर्यदेव के कारण हुई है. अगर तुम ठीक होना चाहते हो तो कार्तिक माह की सूर्यषष्ठी का व्रत किया करो. इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सभी कष्ट दूर होगें. बनिक ने नारद जी के कहे अनुसार व्रत रखा. इस व्रत के प्रभाव से वह सुखी हुआ और दिव्य दृष्टि पा अंत में स्वर्ग का भागी बन गया.

 

गोपाष्टमी – Gopashtami 

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के नाम से मनाया जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण को पहली बार गाय चराने के लिए वन भेजा गया था. इस दिन सुबह ही गाय को स्नान कराकर उसके बछड़े सहित विधि से पूजा की जाती है और आरती करते हैं. संध्या समय में गायों के घर लौटने पर उन्हें साष्टांग प्रणाम कर उनकी चरण धूली माथे पर लगाते हैं.

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आँवला नवमी – Amla Navami

गोपाष्टमी से अगले दिन ही कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को आमला नौमी के नाम से मनाया जाता है. जैसा की नाम से ही स्पष्ट है इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. दीया व धूप जलाकर आँवले के वृक्ष की 108 बार परिक्रमा की जानी चाहिए. अपनी सामर्थ्यानुसार ब्राह्मण को दान दक्षिणा दी जाती है. इस दिन भोजन में आँवले का सेवन जरुर करना चाहिए.

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आँवला नवमी की कहानी – Story Of Amla Navami

प्राचीन समय में एक आँवलिया राजा था वह रोज एक मन सोने के आँवले दान करता था और उसके बाद ही भोजन करता था. एक बार उसके बहू-बेटे सोचने लगे कि अगर यह रोज इसी तरह दान करता रहा तो एक दिन सारा धन समाप्त हो जाएगा. एक दिन उसके एक पुत्र ने राजा से कहा कि आप आँवले का दान बंद कर दें नहीं तो सारा धन खतम हो जाएगा. यह सुनकर राजा व रानी महल छोड़ एक उजाड़ स्थान पर आ गए और आँवला दान ना करने की स्थिति में उन दोनों ने भोजन नहीं किया. यह देख भगवान सोचने लगे कि यदि हमने इसका मान नहीं रखा तो संसार में कोई हमें कैसे मानेगा ! भगवान ने राजा को सपने में कहा कि तुम उठो और देखो कि तुम्हारी पहले जैसी रसोई हो गई है और आमले का पेड़ भी लगा है, दान करके तुम भोजन कर लो.

राजा ने उठकर देखा तो पहले जैसा राजपाट हो गया है और सोने के आँवले का वृक्ष भी लगा है. यह देख राजा-रानी दोनो ने सवा मन सोने के आँवले तोड़े व उनका दान कर के फिर भोजन किया. दूसरी ओर राजा के बेटे व बहू से अन्नपूर्णा का बैर हो गया, यह देख आसपास के लोगों ने उनसे कहा कि पास ही जंगल में एक आँवलिया राजा है तुम उनके पास चले जाओ वह तुम्हारा कष्ट दूर कर देगें.

बहू-बेटे राजा के पास सहायता के लिए पहुंचे और रानी ने उन दोनों को पहचान लिया. रानी ने राजा से कहा कि इनसे हम काम लेगें लेकिन काम कम कराएंगे पर मजदूरी ज्यादा दे देगें. एक दिन रानी ने बहू से कहा कि मेरा सिर धो दे. बहू सिर धोने लगी और उसकी आँख से आँसू निकलकर रानी की पीठ पर गिर गया. रानी ने कहा कि मेरी पीठ पर आँसू क्यों गिरा? मुझे इसका कारण बताओ. बहू बोली कि मेरी सास की पीठ पर भी ऎसा ही मस्सा है जैसा आपकी पीठ पर है. वह रोज सवा मन सोने के आँवले का दान करते थे जिससे हमने सास-ससुर को घर से निकाल दिया.

बहू के आँसू देख रानी ने कहा कि हम ही तुम्हारे सास-ससुर हैं. भगवान ने हमारा सत्त रख लिया और हमें फिर से सब कुछ दे दिया जिसकी वजह से हम दान कर रहे हैं. हे भगवान ! जैसे आपने राजा-रानी की सुनी वैसे ही आप सभी की सुनना. इसके बाद बिन्दायक जी की कहानी कहते हैं.

बिन्दायक जी की कहानी – Story Of Bindayak Ji

एक बार एक छोटा लड़का किसी बात पर लड़कर घर से चला गया. कहने लगा कि आज मैं बिन्दायक जी से मिलकर ही घर जाऊँगा. लड़का चलते-चलते उजाड़ जगह पर पहुंच गया तब बिन्दायक जी सोचने लगे कि इसने मेरे नाम से ही घर छोड़ा है. मुझे इसकी सहायता करनी होगी अन्यथा उजाड़ में शेर आदि इसे खा सकते हैं. बिन्दायक जी बूढ़े व्यक्ति के भेष में आकर बोले कि लड़के तू कहाँ से आया है और कहाँ जा रहा है? इस पर वह बोला कि मैं तो बिन्दायक जी से मिलने जा रहा हूँ. बिन्दायक जी ने कहा कि मैं ही बिन्दायक हूँ, बोल तू क्या माँगता है! लेकिन जो भी माँगना वह एक बार में ही माँग लेना.

बिन्दायक जी की बात सुनकर लड़का बोला कि मैं क्या माँगू! फिर बोला कि क्या माँगू बाप की कमाई, हाथी की सवारी, दाल-भात  मुठ्ठी परासें, ढोकता मुठ्ठी भर कर डोल, स्त्री ऎसी कि जैसे फूल गुलाब का. बिन्दायक जी कहने लगे कि लड़के तूने सब कुछ माँग लिया. जो तूने कहा है सब वैसा ही हो जाएगा. घर वापिस आने पर उसने देखा कि छोटी सी बहू चौकी पर बैठी है और घर में बहुत धन हो गया है. लड़का माँ से बोला कि माँ देख कितना धन हो गया है, यह मैं बिन्दायक जी से माँग कर लाया हूँ. हे बिन्दायक जी महाराज जैसे आपने लड़के को धन दिया वैसे ही आप सभी की सुने.

 

तीरायता व्रत – Teerayata Fast

यह व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी, दशमी व एकादशी तक तीन दिन रहता है. तीन दिन व्रत रखने के बाद द्वादशी को 3 जोड़े ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा दें और उसके बाद स्वयं भोजन करें.

 

देव उठनी एकादशी – Dev Uthani Ekadashi

कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव उठनी एकादशी कहते हैं. इस दिन विष्णु भगवान चार माह बाद अपनी निद्रा से जागते हैं. इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. इस दिन जमीन पर गेरू व खड़िया मिट्टी से देवी का चित्र बनाया जाता है. चित्र के सूखने पर उस पर कुछ फल अथवा बताशे रखकर उसे किसी परात अथवा बड़ी थाली से ढक दिया जाता है. रात में परात बजाकर देव उठने का गीत गाया जाता है और फिर परात को उठाकर उस स्थान पर एक दीया जला देते हैं.

मान्यता है कि इस दिन देव सोकर उठ जाते हैं और इसी दिन से सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं. विवाहादि काम भी आरंभ हो जाते हैं. इसी दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी से कराया जाता है. शास्त्रानुसार जिन दंपत्तियों को कन्या नहीं होती है वह तुलसी जी का विवाह कराके कन्यादान का पुण्य पाते हैं.  

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देव जगाने का गीत – Dev Jagane Ka Geet

मूली का पत्ता हरिया-भरिया ईश्वर का मुख पानो भरिया

मूली का पत्ता हरिया-भरिया रविन्द्र का मुख पानो भरिया

(यहाँ रविन्द्र के स्थान पर घर के सभी लड़्को का नाम लेगें)

ओला-कोला धरे अनार जीयो रविन्द्र तेरे यार

(यहाँ फिर रविन्द्र के नाम की जगह घर के सभी लड़को का नाम लेगें.)

ओला-कोला धरे पंजगट्टे जीयो विमला तेरे बेटे

(यहां विमला की जगह घर की औरतों के नाम लेगें)

ओला-कोला धरे अंजीर जीयो रे विमला तेरे बीर

(घर की लड़कियों का नाम लेगें. बीर का अर्थ भाई है)

ओला-कोला लटके चाबी देख दीपा ये तेरी भाभी

(घर की सभी लड़कियों का नाम लेगें)

ओला-कोला धरी दाँतणा जीयो रे ईशा तेरी साथणा

(घर की सभी लड़कियों के नाम लेगें)

बुल बुलड़ी नै घालो गाड्डी राज करे म्हारे गोलू की दादी

(घर के सभी सदस्यों का नाम लेगें)

जितनी इस घर सींक सलाई उतनी इस घर बहुअड़ आई

जितनी खूँटी टांगू सूत उतने इस घर जनमे पूत

जितने इस घर ईंट अर रोड़े उतने इस घर हाथी घोड़े.

उठ नारायण, बैठ नारायण, चल चना के खेत नारायण

मैं बोऊँ तू सींच नारायण, मैं काटू तू उठा नारायण

मैं पीसूँ तू छान नारायण, मैं पोऊँ तू खा नारायण

कोरा करवा शीतल पानी, उठो रे देव पिओ पानी

उठो देवा बैठो देवा अंगुरिया चटकाओ देवा

जागो जागो भारद्वाज गोतियों के देवा

(यहाँ भारद्वाज की जगह अपने गोत्र का नाम लें)

भीष्म पंचक – Bhishma Panchak

यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से आरंभ होकर पूर्णिमा को समाप्त होता है. इस व्रत को “पंचभीका” भी कहा जाता है. कार्तिक का स्नान करने वाले स्त्री-पुरुष पाँच दिन तक निराहार रहकर इस व्रत को करते हैं. इस व्रत को काम, क्रोध, धर्म तथा अर्थ पाने के लिए किया जाता है.

 

बैकुण्ठ चतुर्दशी – Baikuntha Chaturdashi

शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक हजार कमलों से भगवान विष्णु का पूजन कर के शिव की आराधना करते हैं वह भव बंधनों से मुक्त होकर बैकुंठ धाम को जाते हैं. कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह व्रत किया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा कर के स्नान आचमन करके फिर भोग लगाएँ. इस दिन भगवान के भोग में खिचड़ी बनाते हैं और घी व आम का अचार रखकर भोग लगाकर फिर खुद भी इसी को प्रसाद रुप में खाते हैं.

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बैकुण्ठ चतुर्दशी की कहानी – Story Of Baikuntha Chaturdashi

एक बार नारद जी बैकुण्ठ में भगवान विष्णु के पास गए तो विष्णु जी ने आने का कारण पूछा. नारद जी कहने लगे कि हे भगवन ! पृथ्वीवासी आपको कृपा निधान कहते हैं लेकिन इससे केवल आपके भक्त ही तर पाते हैं लेकिन साधारण नर-नारी नही तरते. इसलिए भगवन ! कोई ऎसा उपाय बताइए जिससे साधारण नर-नारी का भी बेड़ा पार लग पाए. यह सुनकर भगवान बोले कि कार्तिक शुक्ल की चतुर्दशी को जो नर-नारी मेरी भक्तिपूर्वक मेरी पूजा कर व्रत का पालन करेगें उन्हे स्वर्ग की प्राप्ति होगी.

भगवान विष्णु ने अपनी बात कह के द्वारपालों जय-विजय को आदेश दिया कि कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुले रखें. भगवान ने यह भी कहा कि इस दिन जो व्यक्ति जरा सा भी मेरा नाम ले लेगा उसे बैकुण्ठधाम ही मिलेगा.

कार्तिक पूर्णिमा – Kartik Purnima

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पुराणों के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिवजी ने त्रिपुरा नामक राक्षस का वध किया था. इसी कारण इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस पूर्णिमा को भगवान ने मत्स्य अवतार लिया था. इस दिन गंगा स्नान व दीपदान का अत्यधिक महत्व माना जाता है. इस पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र पड़ रहा हो तो “महाकार्तिकी” होती है. यदि भरणी नक्षत्र पड़े तो विशेष फल देने वाली होती है.

इस दिन “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र से भगवान कृष्ण की पूजा करने का विधान है. पाँच दिन तक लगातार शुद्ध घी का दीपक जलते रहने का विधान है.   

 

चिड़ा-चिड़ी की कहानी – Story Of Chida-Chidi 

इस कहानी को कार्तिक माह की पूर्णिमा से अगले दिन प्रतिपदा (पड़वा) को पढ़ते हैं.

एक बार की बात है चार चिड़िया थी. वह चारों ही कार्तिक का स्नान करती थी. पड़वा (प्रतिपदा) के दिन उन्होंने सोचा कि खिचड़ी बनाते हैं. सभी ने मिलकर घी, चावल तथा दाल का जुगाड़ किया और खिचड़ी बनाई. सबने सोचा कि पहले नहाकर आते हैं फिर खिचड़ी खाएंगे. पहले एक चिड़िया नहाकर आ गई बाकी नहीं आई. उसे भूख लगी थी तो उसने खिचड़ी की भाप खा ली. दूसरी चिड़िया आई तो उसे भी भूख लगी थी उसने खिचड़ी का पानी पी लिया. तीसरी ने खिचड़ी खा ली तो चौथी ने खिचड़ी की खुरचन खा ली. खाने के बाद चारों मर गई.

जिस चिड़िया ने भाप खाई थी वह राजा के घर राजकुमारी के रुप में पैदा हुई. जिस चिड़िया ने खिचड़ी का पानी पीया था वह कुम्हार के घर पैदा हुई. जिसने खिचड़ी खाई वह ब्राह्मण के घर जन्म लेती है और जिसने खुरचन खाई वह हथिनी के रुप में जन्म लेती है. कुम्हार की लड़की राजा के यहाँ दासी बन गई. ब्राह्मण की लड़की राजकुमारी की सहेली बनी. हथिनी भी राजा के यहाँ आ गई. राजकुमारी बनी चिड़िया को पिछले जन्म की सभी बातें याद थी.

राजकुमारी का विवाह हुआ तो उसने राजा से कहा कि मैं अपने साथ इस दासी और अपनी सहेली को भी ससुराल ले जाऊँगी तो राजा ने कहा ठीक है ले जाना. राजकुमारी फिर भी नही गई तो राजा ने पूछा तब उसने कहा कि मेरे साथ इस हथिनी को भी भेज दो लेकिन हथिनी जाने को उठी ही नही तब राजकुमारी उसके कान में पिछले जन्म की सारी बातें कह देती है जिसे सुनकर हथिनी अब उठ जाती है.

राजा यह सब देख रहा था और उसने तलवार निकालकर राजकुमारी से कहा कि सच बता तू कौन है? नही तो मैं तेरा सिर काट दूंगा. राजकुमारी ने राजा को सभी बातें सच बता दी. पिछले जन्म की सभी बातें सुनकर राजा बोला कि यदि कार्तिक स्नान का इतना महत्व है तब हम भी जोड़े से कार्तिक नहाकर दान-पुण्य करेगें. 

कार्तिक माह के व्रत तथा त्यौहार के पहले भाग के लिए यहाँ क्लिक करें 

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