कार्तिक माह के व्रत तथा त्यौहार

कार्तिक माह की गणेश जी की कथा – Story Of Lord Ganesha In Kartik Month

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पुराने समय की बात है, अगस्त्य मुनि समुद्र तट के किनारे बैठकर कठिन तपस्या कर रहे थे. जहाँ वह बैठे थे उससे कुछ ही दूरी पर एक पक्षी अपने अंडों पर बैठा उन्हें “से” रहा था कि तभी अचानक समुद्र में एक तेज बहाव आया और पक्षी के अंडों को अपने साथ बहा ले गया. यह देख वह पक्षी अत्यंत दुखी हुआ और उसने प्रण किया कि मैं इस समुद्र को खतम कर दूंगा. वह अपनी चोंच में समुद्र का पानी भरकर फेंकने लगा लेकिन समुद्र तो विशाल था.

काफी समय तक पानी फेंकने पर भी वह जरा सा भी कम नहीं हुआ. यह देख दुखी पक्षी अगस्त्य मुनि के पास गया और अपना दुख सुनाया. पक्षी की बात सुन अगस्त्य मुनि ने गणेश जी का ध्यान किया, उनकी आराधना की और गणेश चतुर्थी का व्रत किया. गणेश जी की कृपा मुनि पर हुई और उन्होंने समुद्र का सारा जल पी लिया. जिससे मुनि ने पक्षी के अंडो को बचा लिया .

करवा चौथ – Karwa Chauth

इस व्रत को सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु के लिए रखती हैं. यह व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है. इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सरगई खाने का नियम है. उसके बाद सुबह स्नानादि से निवृत हो पूरा दिन व्रत रखा जाता है और संध्या समय में इस व्रत की कहानी सुनी जाती है. कहानी सुनने के बाद स्त्रियां बायना निकालती हैं और अपनी सास अथवा ससुर को देती है. सास अथवा ससुर नहीं हैं तो किसी बुजुर्ग अथवा ब्राह्मणी को बायना देते हैं. रात को चंद्रमा को अर्ध्य देकर तब भोजन किया जाता है.

 

करवा चौथ की कथा – Story Of Karwa Chauth

प्राचीन समय में वेद शर्मा नाम का एक विद्वान ब्राह्मण रहता था. उसके सात बेटे और एक बेटी थी और वह बेटी अपने सातों भाईयों की बहुत लाड़ली बहन थी. भाई-बहन हमेशा एक साथ ही भोजन करते थे. जब कार्तिक की चौथ आई तो बहन ने करवा चौथ का व्रत रखा. जब सातों भाई खाना खाने बैठे तो बहन को भी खाने के लिए बुलाने लगे. इस पर उनकी माँ ने कहा कि इसका तो आज करवा चौथ का व्रत है और जब रात में चाँद निकलेगा तब यह अर्ध्य देकर खाना खाएगी. इस पर भाईयों दूर जंगल में आग जला दी और छलनी में से बहन को चाँद दिखा दिया. बहन अर्ध्य देने लगी तो उसने अपनी भाभियों को भी बुलाया कि तुम भी अर्ध्य दे लो लेकिन भाभियाँ कहने लगी के ये चाँद तो तेरे लिए निकला है हमारे लिए नहीं इसलिए तुम ही अर्ध्य दो.

बहन ने जैसे ही पहला टुकड़ा तोड़ा तो उसके ससुराल से बुलावा आ गया कि उसका पति बीमार है. लड़की की माँ ने लड़की को कपड़े पहनाने के लिए जैसे ही संदूक खोला तो सफेद कपड़ा ही हाथ आया और तीन-चार संदूक खोलने पर भी सफेद कपड़े ही सामने आये तो उसने वही पहनाकर जल्दी से भेज दिया और जाने से पहले उसे एक सोने का सिक्का देते हुए बोली कि रास्ते में सभी के पैर पड़ती जाना और जो तुम्हे सुहागिन होने का आशीष दे उसे ही यह सिक्का देना.

रास्ते में किसी ने भी उसे सुहागिन होने का आशीर्वाद नहीं दिया सभी ने यही कहा कि ठंडी हो, शीली हो, सब्र करने वाली हो, अपने भाईयों की बहन हो, भाईयों का सुख देखने वाली हो. जब वह ससुराल के दरवाजे पर पहुंची तो उसकी छोटी ननद मिली. बहन ने उसके भी पैर छू दिए जिस पर ननद ने कहा कि सीली हो, तुझे पूत हो, तुझे बेटे हों और मेरे भाई का सुख देखने वाली हो. यह सुनते ही बहन ने सोने का सिक्का अपनी ननद को दे दिया और अपने पल्ले में गाँठ बाँध ली.

अंदर जाने पर उसकी सास ने कहा कि ऊपर कोठरी है वहाँ जाकर बैठ और जब वह ऊपर गई तो उसने देखा कि उसका पति मरा पड़ा है. पति को लेकर वह वहीं पड़ी रही और अपने मृत पति की सेवा करती रही. उसकी सास, दास-दासियों के हाथ बची-खुची रोटी भेज देती थी. इस तरह अपने पति की सेवा करते उसे एक साल हो गया. करवा चौथ का व्रत फिर आया. सभी सुहागिन स्त्रियों ने नहा-धोकर करवा चौथ का व्रत रखा. सिर धोया, हाथों में मेहंदी लगाई और सोलह श्रृंगार किए. सभी ने सुहाग के नाम की नई चूड़ियाँ पहनी. बहन यह सब देखती रही. एक पड़ोसन ने कहा कि तू भी करवा चौथ का व्रत कर ले तब वह बोली कि मैं कैसे व्रत करूँ? इस पर पड़ोसन बोली कि चौथ माता सब ठीक कर देंगी. पड़ोसन के कहने पर उसने भी व्रत रख लिया. कुछ देर में करवे बेचने वाली आई और आवाज लगाने लगी कि करवा लो! भाईयों की प्यारी करवा लो, दिन में चाँद उगवाने वाली करवा लो, ज्यादा भूख की मारी करवा लो. बहू ने आवाज लगाई कि ऎ, करवे वाली मुझे भी करवा दे जा! इस पर वह बोली कि मेरी दूसरी बहन आएगी वह तुझे करवा देगी.

दूसरी बहन आई तो वह आवाज लगाने लगी – करवा लो! भाईयों की प्यारी करवा लो, दिन में चाँद उगवाने वाली करवा लो, ज्यादा भूख की मारी करवा लो. बहू ने आवाज लगाई कि ऎ, करवे वाली मुझे भी करवा दे जा! इस पर वह बोली कि मेरी दूसरी बहन आएगी वह तुझे करवा देगी. इस तरह से पाँच बहने आई सभी ने यही कि कहा कि मेरी बहन करवा देगी. अब छठी बहन ने करवों के लिए आवाज लगाई और उसने कहा कि हमारी सातवीं बहन आएगी तुम उससे करवा लेना. तुम उसके रास्ते में काँटे बिखेर देना. उसके पैर में काँट चुभ जाएगा जिससे वह बहुत चिल्लाएगी तो तुम सुई लेकर उसका पैर पकड़कर जबर्दस्ती काँटा निकाल देना. जब वह तुम्हे आशीर्वाद देने लगे तो तुम उससे करवा माँग लेना. करवे लेकर तुम व्रत का उद्यापन करना जिससे तुम्हारा पति ठीक हो जाएगा.

उसकी सारी बातें सुनकर उसने वैसा ही किया और काँटा चुभने पर उसे निकाल भी दिया जिससे उसने बहू को बहुत आशीर्वाद दिया. बहू ने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि तुमने मुझे आशीर्वाद दिया है तो तुम मुझे करवे भी देकर जाओ. करवे वाली बोली कि तुमने तो मुझे ठग लिया है. यह कहकर चौथ माता ने उसे आँख से काजल, नाखूनों से मेहंदी, माँग से सिंदूर और छोटी अंगुली का छींटा दिया, साथ ही करवे भी दे दिए. करवे लेकर बहू ने व्रत रखा और उद्यापन भी किया. यह सब होने पर उसका पति भी जीवित हो गया और कहने लगा कि मैं तो बहुत सोया तब उसकी पत्नी ने कहा कि तुम सोये नहीं? बारह महीने से मैं तुम्हारी सेवा कर रही हूँ. ये तो कार्तिक की चौथ माता ने सुहाग दिया है. करवा चौथ का उद्यापन कर और चंद्रमा को अर्ध्य दे दोनों ने खाना खाकर चौपड़ खेलने लगे. कुछ देर में उसकी सास ने दासी को तेल में बना खाना बहू के लिए भेजा.

दासी ने आकर देखा कि वह दोनों तो चौपड़ खेल रहे है वह उलटे पैर लौट गई और जाकर सास से कहा कि महल में तो बहुत रौनक लगी है. आपके बहू-बेटे तो चौपड़ खेल रहे हैं. यह सब देख सास देखने आई और देखकर बहुत खुश हुई. बहू ने सास के पैर छूए तो सास ने कहा कि बहू सच बता कि तूने ये चमत्कार कैसे किया? बहू ने करवा चौथ की सारी बात बता दी. यह सुनकर राजा ने सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सभी बहने करवा चौथ का व्रत जरुर करें. पहली करवा चौथ अपने पीहर में करें और वहीं उसका उद्यापन भी करें. हे! चौथ माता जैसा आपने इसकी सुनी वैसे ही सभी की सुनना.

इस कहानी के बाद बिन्दायक जी की कहानी भी कही जाती है.

 

बिन्दायक जी की कथा – Story Of Bindayak Ji

एक गाँव में माँ-बेटी रहती थी तो एक दिन वह अपनी माँ से कहने लगी कि गाँव के सब लोग गणेश मेला देखने जा रहे हैं, मैं भी मेला देखने जाऊँगी. माँ ने कहा कि वहाँ बहुत भीड़ होगी कहीं गिर जाओगी तो चोट लगेगी. लड़की ने माँ की बात नहीं सुनी और मेला देखने चल पड़ी. माँ ने जाने से पहले बेटी को दो लड्डू दिए और एक घंटी में पानी दिया. माँ ने कहा कि एक लड्डू तो गणेश जी को खिला देना और थोड़ा पानी पिला देना. दूसरा लड्डू तुम खा लेना और बचा पानी भी पी लेना. लड़की मेले में चली गई. मेला खतम होने पर सभी गाँववाले वापिस आ गए लेकिन लड़की वापिस नहीं आई.

लड़की मेले में गणेश जी के पास बैठ गई और कहने लगी कि एक लड्डू और पानी गणेश जी तुम्हारे लिए और एक लड्डू और बाकी बचा पानी मेरे लिए. इस तरह कहते-कहते सारी रात बीत गई. गणेश जी यह देखकर सोचने लगे कि अगर मैने यह एक लड्डू और पानी नहीं पीया तो यह अपने घर नहीं जाएगी. यह सोचकर गणेश जी एक लड़के के वेश में आए और उससे एक लड्डू लेकर खा लिया और साथ ही थोड़ा पानी भी पी लिया फिर वह कहने लगे कि माँगो तुम क्या माँगती हो? लड़की मन में सोचने लगी कि क्या माँगू? अन्न माँगू या धन माँगू या अपने लिए अच्छा वर माँगू या खेत मांगू या महल माँगू! वह मन में सोच रही थी तो गणेश जी उसके मन की बात को जान गए. वह लड़की से बोले कि तुम अपने घर जाओ और तुमने जो भी मन में सोचा है वह सब तुम्हें मिलेगा.

लड़की घर पहुंची तो माँ ने पूछा कि इतनी देर कैसे हो गई? बेटी ने कहा कि आपने जैसा कहा था मैंने वैसा ही किया है और देखते ही देखते जो भी लड़की ने सोचा था वह सब कुछ हो गया. हे! गणेश जी महाराज जैसा आपने उन माँ-बेटी की सुनी है वैसे ही सबकी सुनना.

 

होई अष्टमी – Ahoi Ashtami 

कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है. यह व्रत माएँ अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए रखती हैं और उनके सुख व समृद्धि की कामना भी करती हैं. इस दिन दीवार पर गेरू से अहोई माता बनाई जाती है. आजकल बाजार से अहोई माता के चित्र भी मिलने लगे हैं जिसे दीवार पर चिपका दिया जाता है और संध्या समय में कहानी सुनकर उनकी पूजा की जाती है. शाम को कहानी सुनने से पहले अहोई माता के सामने एक कलश पानी का भरकर रखा जाता है. उस कलश पर रोली से तिलक करते हैं और मोली बाँधते हैं.

इस दिन कई माताएँ चाँदी की स्याहू माता भी गले में पहनती हैं और कहानी सुनकर फिर यह स्याहू माता कलश को पहना देते हैं. इस दिन कहानी सुनने के बाद बायना निकालकर सास अथवा ससुर को देते हैं. शाम को तारों को अर्ध्य देकर भोजन किया जाता है. जिस वर्ष घर में पहली संतान होती है तो संतान की पहली अहोई को ही अहोई का उद्यापन भी कर दिया जाता है.

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अहोई अष्टमी की कथा – Story Of Ahoi Ashtami

किसी नगर में एक साहूकार रहता था जिसके सात बेटे, सात बहुएं तथा एक बेटी थी. कार्तिक माह में दीवाली की पूजा से पहले घर की पुताई के लिए सातों बहुएं अपनी इकलौती ननद के साथ मिट्टी खोदने गई. मिट्टी खोदते समय ननद की कुदाल स्याहू के बच्चे को लग जाती है जिससे वह मर जाता है. स्याहू माता कहती हैं कि मैं तेरी कोख बाँधूगी क्योंकि तूने मेरे बच्चे को मारा है. ननद अपनी भाभियों से अनुरोध करती हैं कि उसकी जगह वह अपनी कोख बँधा लें लेकिन सभी भाभियाँ मना कर देती है पर सबसे छोटी भाभी अपनी कोख बंधाने के लिए तैयार हो जाती है. वह सोचती है कि अगर मैंने भी कोख नहीं बंधवाई तो मेरी सास नाराज हो जाएगी कि उसने अपनी ननद की मदद नहीं की.

कोख बंधवाने के बाद छोटी बहू को जो भी बच्चा होता वह सात दिन बाद मर जाता. एक बार दुखी होकर वह पंडित जी को बुलाकर पूछती है कि मेरी संतान जन्म के सातवें दिन मर जाती है? इसका कोई उपाय है आपके पास? सारी बातें सुनने के बाद पंडित जी कहते हैं कि तुम सुरही गाय की सेवा करो क्योंकि सुरही गाय स्याहू माता की भाएली है. वह तुम्हारी कोख खुलवा देगी तभी तुम्हारा बच्चा जीएगा. पंडित जी की बात सुनकर छोटी बहू सुबह सवेरे उठकर चुपचाप सुरही गाय के नीचे की साफ-सफाई कर आती.

सुरही गाय एक पैर से लंगड़ी थी वह सोचने लगी कि कौन है जो सुबह सवेरे रोज मेरी सेवा कर रहा है. आज मैं छिपकर देखूंगी और उसने देखा कि साहूकार की सबसे छोटी बहू यह काम कर रही है. गऊ माता ने उससे कहा कि तुझे क्या चाहिए? बहू ने कहा कि स्याहू माता आपकी भाएली है उसने मेरी कोख बाँध दी है, आप मेरी कोख खुलवा दो. गऊ माता ने कहा कि ठीक है तुम मेरे साथ चलो. दोनो स्याहू माता की ओर चल दिए लेकिन रास्ते में गरमी बहुत थी इसलिए कुछ देर के लिए वह दोनो एक पेड़ के नीचे बैठ जाती हैं.

पेड़ के नीचे जब छोटी बहू बैठी तो उसने देखा कि एक साँप आ रहा है और पेड़ पर गरुड़ के घोंसलें में बैठे बच्चों को खाने जा रहा है. छोटी बहू ने तुरंत ही उस साँप को मार दिया और गरुड़ के बच्चों को बचा लिया. जब गरुड़ आया और उसने खून देखा तो वह समझा कि छोटी बहू ने उसके बच्चों को मार दिया है और वह उसे चोंच से मारने लगा. छोटी बहू ने कहा कि आपके बच्चों को साँप डसने वाला था, मैंने तो उनकी रक्षा की है और साँप को मार डाला. इस पर गरुड़ बोला कि माँग तू क्या माँगती है? वह कहती है कि दूर सात समंदर पार स्याहू माता रहती है, आप हमें वहां तक छोड़ दें. गरुड़ दोनों को अपनी पीठ पर बिठा स्याहू माता के पास छोड़ आता है. स्याहू माता अपनी बहन को देख कहती है कि आ बहन, बैठ बहुत दिनों में आई हो. दोनों बहनें बातें करने लगी तो बीच में स्याहू माता बोली कि बहन मेरे सिर में जुएँ हो गई हैं तू जरा देख दे. सुरही माता ने बहू को जुएँ देखने का इशारा किया और उसने स्याहू माता कि सारी जुएँ निकाल दी.

स्याहू माता यह देख बहुत खुश हुई और कहने लगी कि तुझे सात बेटे हों और उनकी सात बहुएँ हों. बहू कहने लगी कि मुझे तो एक भी बेटा नहीं है तो सात कहां से होगें? स्याहू माता कहने लगी कि मैंने वचन दिया है और अगर मैं वचन से फिर जाऊँ तो धोबी के यहाँ कंकड़ बन जाऊँ. इस पर साहूकार की छोटी बहू बोली कि मेरी कोख तो तुम्हारे पास बंद पड़ी है. इस पर स्याहू माता बोली कि तूने तो मुझे ठग लिया है. वैसे तो मैं तेरी कोख नहीं खोलती लेकिन अब खोलनी पड़ेगी.

स्याहू माता कहती हैं कि जा तू घर जा, तुझे सात बेटे और सात बहुएँ होगी. तू जाकर उनके सात उद्यापन करना, सात होई बनाकर सात कड़ाही करना. जब वह घर वापिस आई तो देखा कि सात बेटे और सात बहुएँ बैठी हैं. वह सात अहोई बनाकर सात उद्यापन करती हैं और सात ही कड़ाही करती है. शाम के समय सारी जेठानियाँ कहती हैं कि जल्दी से धोक मार लो नहीं तो छोटी बच्चों को याद कर रोना शुरु कर देगी. कुछ देर बाद जेठानियाँ अपने बच्चों से कहती हैं कि जरा देख कर आओ कि आज तुम्हारी चाची के रोने की आवाज नहीं आई.

बच्चों ने आकर बताया कि चाची तो होई बना रही है और उद्यापन कर रही है. यह सुन जेठानियाँ भागकर आती हैं और कहती हैं कि तूने अपनी कोख कैसे खुलवाई? उसने जवाब दिया कि तुमने तो कोख बँधवाई नही थी तो मैने बँधवा ली लेकिन स्याहू माता ने मुझ पर दया कर मेरी कोख खोल दी है. कहानी सुनकर सबको प्रार्थना करनी चाहिए कि हे, स्याहू माता ! जैसे आपने साहूकार की छोटी बहू की सुनी वैसे ही आप सबकी सुनना.

इसके बाद बिन्दायक जी की कहानी कहते हैं.

बिन्दायक जी की कहानी – Story Of Bindayak Ji

एक बार बिन्दायक जी अपनी एक चुटकी में चावल और दूसरी में चावल लेकर घूम रहे थे कि कोई मेरे लिए खीर बना दो. किसी ने उनकी बात नहीं सुनी लेकिन एक बुढ़िया माई कहने लगी कि ला मैं तेरे लिए खीर बना देती हूँ. वह एक कटोरी ले आई तो बिन्दायक जी बोले कि कटोरी क्यूँ लाई है? भगोना लेकर आ ! बुढ़िया बोली कि भगोने का क्या करेगा? तेरी खीर के लिए यह कटोरी ही काफी है. बिन्दायक जी फिर बोले कि तुम भगोना लेकर तो आओ फिर देखना.

बुढ़िया माई उनकी जिद के आगे झुक गई और भगोना ही खीर के लिए चढ़ा दिया और चढ़ाते ही भगोना दूध से भर गया. बिन्दायक जी महाराज कहने लगे कि मैं जरा बाहर घूमकर आता हूँ तुम खीर बनाकर रखना. कुछ देर में खीर बन गई लेकिन बिन्दायक जी महाराज नहीं आए. खीर देख बुढ़िया का जी ललचा गया और वह खीर खाने लगी और कहने लगी कि बिन्दायक जी महाराज आओ भोग लगाओ.

कुछ देर में बिन्दायक जी आए और बोले कि खीर बन गई? बुढ़िया बोली कि हाँ बन गई, आओ जीम लो! बिन्दायक जी बोले कि जिस समय तुम खीर खा रही थी उसी समय मैं जीम लिया था. बुढ़िया कहने लगी कि तुमने तो मेरा परदा ही हटा दिया लेकिन किसी ओर का परदा मत हटाना. यह सुनकर बिन्दायक जी महाराज ने बुढ़िया के घर में खूब धन-दौलत भर दी.

हे, बिन्दायक जी महाराज! जैसे आपने बुढ़िया का घर भरा वैसे ही आप कहानी कहने और सुनने वाले का भी घर भरना.  

 

रमा एकादशी – Rama Ekadashi

यह एकादशी कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष को मनाई जाती है. इस एकादशी के प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी दूर हो जाते हैं और ईश्वर के चरणों में जगह मिलती है. इस दिन केशव भगवान का संपूर्ण विधि विधान से पूजा कर के नैवेद्य और आरती कर के प्रसाद बांटना चाहिए. अपनी सामर्थ्यानुसार ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए.

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रमा एकादशी व्रत कथा – Story Of Rama Ekadashi Fast

प्राचीन समय में मुचकुन्द नाम का राजा था जिसे एकादशी के व्रत पर पूर्ण विश्वास था और वह सभी एकादशियों को व्रत रखता था. अपनी प्रजा पर भी उसने यही नियम लागू कर रखा था. राजा की एक कन्या थी चन्द्रभागा, वह पिता से भी अधिक इस व्रत पर विश्वास करती थी. उसका विवाह राजा चन्द्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हो गया और शोभन मुचकुन्द के साथ ही रहता था.

एकादशी आई और सभी ने व्रत किया और शोभन ने भी यह व्रत किया लेकिन अत्यंत कमजोर होने से वह भूख से व्याकुल हो गया जिससे उसने प्राण त्याग दिए. राजा, रानी तथा उनकी पुत्री चन्द्रभागा बहुत दुखी हुए. शोभन को एकादशी के प्रभाव से मन्दरांचल पर्वत पर धनधान्य से युक्त व शत्रुओं से रहित देवनगर में उत्तम आवास मिला. शोभन की सेवा में रम्भादि अप्सराएँ सदैव तत्पर रहती थी.

एक दिन राजा मुचकुन्द टहलते हुए मंदरांचल पर्वत पर पहुंच गए तो अपने दामाद को सुखी देखा. घर आकर सारा वृतांत अपनी पत्नी व पुत्री को बताया. पुत्री यह सब समाचार सुन अपने पति के पास चली गई. फिर दोनों सुखपूर्वक रम्भादि अप्सराओं की सेवा लेते हुए सुखपूर्वक रहने लगे.

गोवत्स द्वादशी – Govatsa Dwadashi

गोवत्स द्वादशी का यह त्यौहार कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है. इस दिन सुबह स्नानादि से निवृत हो गाय तथा बछड़ों की सेवा व पूजा की जाती है. उन्हें गेहूँ से बनी चीजें खिलाई जाती हैं. इस दिन व्यक्ति गाय के दूध का सेवन नहीं करते हैं. इसके साथ ही कटे फल तथा गेहूँ से बने पदार्थ भी नहीं खाते हैं. गोवत्स की कहानी सुनने के बाद ब्राह्मणों को फलादि दान करते हैं.

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गोवत्स द्वादशी की कथा  – Story Of Govatsa Dwadashi

प्राचीन समय में भारत में सुवर्णपुर नगर में देव दानी राजा राज्य करता था. उसके सवत्स एक गाय और भैंस थी. राजा की दो रानियाँ थी. एक का नाम गीता तो दूसरी का नाम सीता था. सीता भैंस से सहेली सा प्यार करती थी तो गीता गाय व बछड़े से सहेली सा प्रेम करती थी. एक दिन भैंस सीता से कहती है कि गीता रानी गाय व बछड़ा होने से मुझसे ईर्ष्या करती है. सीता ने सब सुनकर कहा कि कोई बात नहीं मैं सब ठीक कर दूंगी. सीता रानी ने उसी दिन गाय के बछड़े को काटकर गेहूँ के ढ़ेर में गाड़ दिया. किसी को भी इस बात का पता नहीं चल पाया.

राजा जब भोजन करने बैठा तब मांस की वर्षा होने लगी. महल में चारों ओर मांस तथा खून दिखाई देने लगा. थाली में रखा सारा भोजन मलमूत्र में बदल गया. यह सब देख राजा को बहुत चिन्ता हुई. उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजन ! तुम्हारी रानी सीता ने गाय के बछड़े को मारकर गेहूँ के ढेर में छिपा दिया है. इसी कारण यह सब अनर्थ हो रहा है. कल गोवत्स द्वादशी है इसलिए भैंस को बाहर कर गाय व बछड़े की पूजा करो. कटे हुए फल और दूध का सेवन नहीं करना इससे तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएंगे और बछड़ा भी जीवित हो जाएगा.

संध्या समय में गाय के घर आने पर राजा ने उसकी पूजा की और जैसे ही बछड़े को याद किया वह गेहूँ के ढेर से बाहर निकलकर गाय के पास आकर खड़ा हो गया. यह सब देख राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने राज्य में सभी को गोवत्स द्वादशी का व्रत करने का आदेश दिया. 

धन तेरस – Dhan Teras

धन तेरस को कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है. धन तेरस को मनाने का प्राचीन प्रमाण वैदिक साहित्य में भी पाया गया है. जैसे कि यमराज को वैदिक देवता माना गया है इसलिए इस दिन यमराज की भी पूजा की जाती है. इस दिन लक्ष्मी का आवास घरों में होता है. इस दिन संध्या समय में एक दीपक घर के मुख्य द्वार के पास जलाया जाता है. कई स्थानों पर इसे नाली के पास जलाया जाता है.

इस दिन नए बर्तन खरीदने की परंपरा है. कई लोग अपनी सामर्थ्यानुसार इस दिन चाँदी की वस्तु भी खरीदते हैं.

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धन तेरस की कथा – Story Of Dhan Teras

एक बार विष्णु जी, लक्ष्मी जी के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करने आए. कुछ समय बाद विष्णु जी कहने लगे कि मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ तुम उधर मत देखना और उत्तर दिशा की ओर जाना लेकिन विष्णु जी जैसे ही दक्षिण दिशा की ओर मुड़े लक्ष्मी जी तभी उनके पीछे चल दी. कुछ दूर जाने पर गन्ने का खेत आया तो वह तोड़कर चूसने लगी. विष्णु जी ने देखा तो वह बहुत क्रोधित हुए और लक्ष्मी जी को श्राप देते हुए कहा कि जिसका यह खेत है तुम 12 वर्षों तक उसकी सेवा करो. इतना कहकर वह क्षीरसागर को चले गए. लक्ष्मी जी किसान के यहाँ रहने लगी और उसे धनधान्य से पूर्ण कर दिया.

12 वर्ष पूरे होने पर लक्ष्मी जी जाने लगी तो किसान ने उन्हें रोक लिया. विष्णु जी जब लक्ष्मी जी को लेने आए तब भी किसान ने उन्हें नहीं जाने दिया. इस पर भगवान बोले कि तुम परिवार सहित गंगा स्नान को जाओ और मैं तुम्हें जो कौड़ियाँ दे रहा हूँ उन्हें गंगा जी में छोड़ देना जब तक तुम वापिस नहीं आओगे हम नहीं जाएंगे. किसान ने भगवान के कहे अनुसार किया. उसने जैसे ही कौड़ियाँ गंगा में डाली वैसे ही चार चतुर्भुज निकलें और कौड़ियाँ लेकर जाने लगे. किसान ने आश्चर्य चकित होकर गंगा जी से पूछा कि ये चार भुजाएँ किसकी थी? गंगा जी ने कहा कि हे किसान ! वे चारों भुजाएँ मेरी ही थी.

गंगा जी ने किसान से पूछा कि तुमने जो कौड़ियाँ मुझे भेंट की है वे तुम्हें किसने दी है? किसान ने कहा कि मेरे घर मे दो सज्जन आए हुए हैं, उन्होने दी हैं. अब गंगाजी कहती हैं कि तुम्हारे घर जो पुरुष है वह विष्णु जी हैं और जो स्त्री है वह लक्ष्मी जी हैं. तुम लक्ष्मी जी को जाने मत देना नहीं तो फिर से वैसे ही निर्धन हो जाओगे. किसान जब वापिस लौटा तो भगवान से बोला कि मैं इन्हें नहीं जाने दूँगा. इस पर भगवान बोले कि इन्हें मेरा श्राप था जो 12 वर्ष तक तुम्हारी सेवा कर रही थी और लक्ष्मी जी तो चंचल हैं वह एक जगह नहीं ठहर सकती. इन्हें तो बड़े-बड़े नहीं रोक पाए. लेकिन किसान जिद पर अड़ गया कि वह लक्ष्मी जी को नहीं जाने देगा.

किसान की जिद सुनकर लक्ष्मी जी कहने लगी कि अगर तुम मुझे रोकना चाहते हो तो सुनो, कल धन तेरस है. तुम अपना घर साफ करना और शाम को दीपक जलाकर रखना तब मैं तुम्हारे घर आऊँगी. उस समय तुम मेरी पूजा करना लेकिन मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी. किसान ने कहा ठीक है मैं ऎसा ही करुंगा और उसके बाद लक्ष्मी जी दसों दिशाओं में फैल गई, विष्णु जी देखते रह गए. किसान ने अगले दिन वैसा ही किया जैसा लक्ष्मी जी ने कहा था और उसका घर धन-धान्य से भर गया. इस तरह वह किसान हर वर्ष धन तेरस के दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने लगा. उस किसान को पूजा करते देख अन्य लोगों ने भी पूजा करना आरंभ कर दिया.

 

दुर्घटना अथवा अपमृत्यु टालने का मंत्र – Mantra For To Avoid Accident

धन तेरस के दिन परिवार के सभी सदस्यों को दक्षिण दिशा की ओर मुँह कर के यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपक जलाकर निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए.

मंत्र – मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह ।

         त्रयोदश्यां दीपदानात पूर्यज: प्रीयतां मम ।।

इसका अर्थ है कि मृत्यु काल में जंजीर और दण्ड धारण किए हुए और भैंसे पर सवार सूर्य पुत्र यमराज मैं आपको त्रयोदशी के दिन दीपदन कर रहा हूँ अपमृत्यु से मेरी रक्षा करें, इससे मुझे बचाइए.

नरक चतुर्दशी – Narak Chaturdashi

इस दिन किया गया व्रत व पूजन यमराज को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी अथवा नरका चौदस के नाम से मनाया जाता है. इस दिन नरक से मुक्ति पाने के लिए सुबह काला तेल लगाकर अपामार्ग पौधे सहित स्नान करना चाहिए. शाम के समय यमराज के लिए दीपदान करते हैं. मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का संहार किया था.

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नरक चतुर्दशी की कथा – Story Of Narak Chaturdashi

प्राचीन समय में रन्तिदेव नाम का राजा राज्य करता था. अपने पूर्व जन्म में वह दानी धर्मात्मा था और इस जन्म में भी पूर्व कर्मों के कारण उसने कई दानादि जैसे सत्कार्य किए थे. राजा के अंत समय में यमराज उन्हें लेने आया और लाल आंखे दिखाकर बार-बार राजा से कहने लगा कि चलो तुम्हारा अंत समय आ गया है, तुम्हे नरक जाना होगा. राजा यमराज की बात सुनकर डर गया और नरक जाने का कारण पूछने लगा. यम के दूतों ने कहा कि राजन आपने जो दान पुण्य किया है उसे सारा जगत जानता है लेकिन जो पाप किए हैं वह केवल भगवान और धर्मराज ही बता सकते हैं.

यम के दूतों की बात सुनकर राजा बोला कि उन पापों को मुझे भी बताओ जिससे मैं उनका निवारण कर सकूँ. यमदूत बोले कि एक बार तेरे द्वार से एक ब्राह्मण भूख से व्याकुल हो लौट गया था. इसलिए तुम्हे नरक में जाना होगा. राजा ने दूतों से विनती की कि एक साल का समय मुझे दे दो. दूतों ने तुरंत उसकी बात मान ली और एक साल की उम्र बढ़ाकर वह वापिस चले गए. राजा ने ऋषियों से इस पाप की मुक्ति का उपाय पूछा तो ऋषियों ने कहा कि राजन आप कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करना और भगवान कृष्ण की पूजा करना. ब्राह्मण को भोजन कराना, दान देना और सार अपराध सुनाकर उससे क्षमा माँग लेना. ऎसा करने से आप पाप मुक्त हो जाओगे.

कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी आने पर राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने कहा और अंत में वह विष्णुलोक को गया.

कार्तिक माह के व्रत व त्यौहार – भाग 2 के लिए यहाँ क्लिक करें

 

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