भाद्रपद माह के व्रत तथा त्यौहार – भाग 3

गणेश चतुर्थी – Ganesha Chaturthi

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भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के नाम से मनाया जाता है. इस दिन सुबह सवेरे उठ कर स्नानादि से निवृत होकर सोने, चाँदी, ताँबे, मिट्टी अथवा गोबर के गणेश जी की मूर्त्ति बनाकर उनकी पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद इक्कीस व्यंजनों का भोग लगाना चाहिए. उसके बाद हरी दूब के 21 अंकुर लेकर गणेश जी के दस नामों पर चढ़ाना चाहिए जो निम्नलिखित हैं :-

1) गतापि

2) गोरी सुमन

3) अघनाशक

4) एकदन्त

5) ईशपुत्र

6) सर्वसिद्धिकर

7) विनायक

8) कुमार गुरु

9) इभवक्राय

10) मूषक वाहन संत

इसके बाद दस लड्डुओं का भोग ब्राह्मणों को दान कर देने चाहिए और बाकी बचे लड्डू अपने सेवन के लिए रख लेने चाहिए.

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा – Story Of Ganesh Chaturthi

एक बार भोगवती नामक नदी पर भगवान शंकर स्नान करने गए. उनके चले जाने के बाद पार्वती जी ने अपने तन की मैल से एक पुतला बनाया जिसका नाम उन्होंने गणेश रखा. गनेश जी को उन्होंने अपने द्वार पर एक मुदगल हाथ में देकर बिठा दिया कि जब तक मैं स्नान करुँ किसी पुरुष को अंदर मत आने देना.

भगवान शंकर स्नान के बाद वापिस घर आते हैं तो उन्हें द्वार पर गणेश जी मिलते हैं जो उन्हें अंदर जाने से रोक देते हैं. इस पर भगवान शंकर क्रोध से भर कर गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर देते हैं और अंदर चले जाते हैं. पार्वती जी समझती हैं कि भोजन में देरी के कारण शिवजी उनसे नाराज हैं. उन्होंणे शीघ्रता से दो थालियों में भोजन लगाया और शंकर जी को भोजन करने को कहा. भगवान शिव जब भोजन करने बैठते हैं तब पूछते हैं कि ये दूसरी थाली किसके लिए है? पार्वती जी कहती हैं कि दूसरी थाली पुत्र गणेश के लिए है जो बाहर पहरा दे रहा है.

यह सुनते ही शंकर जी बोले कि मैने तो उसका सिर काट दिया है! इतना सुनते ही पार्वती अत्यधिक दुखी हुई और पुत्र गणेश को फिर से जीवित करने की याचिका करने लगी. शंकर जी ने देखा कि एक हथिनी ने बच्चे को जन्म दिया है तो उन्होंने तुरंत उस बच्चे का सिर काटकर गणेश जी के धड़ से जोड़ दिया. यह घटना भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुई मानी जाती है इसीलिए भाद्रपद की इस चतुर्थी को गणेश जी की विशेष रुप से पूजा की जाती है.

भाद्रपद की चतुर्थी के चन्द्रमा का दर्शन नहीं किया जाता है क्योंकि इस दिन के चन्द्रमा को कलंकित माना गया है.

ऋषि पंचमी – Rishi Panchami

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भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से मनाया जाता है. इस दिन कुछ स्थानों पर व्रत किया जाता है और गंगाजी में स्नान किया जाता है. यदि गंगा जी में स्नान नहीं कर पाते हैं तब अपने घर में सुबह सवेरे स्नान कर व्रत करना चाहिए. इस दिन 108 बार मिट्टी से हाथ धोने चाहिए. गोपी चंदन, आंवला, तिल, गाय का पेशाब, गंगाजल आदि सभी चीजों को मिलाकर हाथ व पैरों को धोया जाता है. 108 प्रकार की दातुन का उपयोग किया जाता है. 108 पत्ते सिर पर रखकर 108 बार घंटी से नहाया जाता है. नहाने के बाद नए कपड़े पहने जाते हैं.

उपरोक्त कार्य पूरा होने पर गणेश जी की पूजा की जाती है. उसके बाद बाद कहानी सुनते हैं और कहानी सुनने के बाद केले, घी, चीनी और सामर्थ्यानुसार दक्षिणा रखकर बायना निकाला जाता है और किसी ब्रह्मण अथवा सुपात्र को दिया जाता है. दिन में केवल एक ही समय भोजन करना चाहिए. भोजन में केवल फल अथवा मेवा ही खा सकते हैं. दूध, दही अथवा हल से जोती हुई चीजों का सेवन इस दिन वर्जित होता है.

ऋषि पंचमी व्रत कथा – Story Of Rishi Panchami

एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से पूछा कि सभी पापों को नष्ट करने वाला कौन सा व्रत श्रेष्ठ माना गया है? राजा की बात सुनने पर ब्रह्माजी ने ऋषि पंचमी के व्रत को सभी से उत्तम बताया और कहा “हे राजन ! विदर्भ देश में एक उत्तंक नाम का सदाचारी ब्राह्मण रहता था. उसकी पत्नी का नाम सुशीला था. उसकी दो संताने थी, एक पुत्र तथा एक पुत्री. पुत्री का विवाह होने के बाद वह विधवा हो गई. इस दुख से अत्यंत दुखी होने पर अपनी कन्या सहित ब्राह्मण दंपत्ति ऋषि पंचमी का व्रत रखने लगे जिसके फलस्वरुप वह लोग जन्मों के आवागमन से छुटकारा पाकर स्वर्गलोक चले गए.

सूर्य षष्ठी अथवा छठ – Surya Shashthi Or Chhath

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भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी के रुप में मनाया जाता है. इस दिन जो व्यक्ति गंगा स्नान करता है, जप करता है और व्रत भी रखता है उसे बहुत ज्यादा पुण्य फल मिलते हैं. इस दिन सूर्य पूजन तथा गंगा स्नान का महत्व माना गया है. जो गंगा से दूर हैं वह अपने आसपास की नदी अथवा तालाब में सुबह सवेरे स्नान कर इस व्रत को रखते हैं. इस व्रत की पूजा में कनेर के लाल फूल, गुलाल, दीप तथा लाल वस्त्र का महत्व है. जो इस व्रत को करते हैं उनके नेत्र रोग तथा कोढ़ दूर होता है. इस दिन व्रती नमक का सेवन नहीं करते. सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेना चाहिए और आंखे बंद कर सूर्य की ओर देखना स्वास्थ्यवर्धक माना गया है.

दूबड़ी आठे – Dubadi Aathe

दूबड़ी आठे का पर्व भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है. पहले दिन रात को चने व मोठ भिगो देते हैं और अगले दिन के लिए थोड़ा खाना भी बनाकर रख लेते हैं. अगले दिन अष्टमी को सुबह सवेरे पीली मिट्टी को भिगो देते हैं. इसकी पूजा का विधान ओगद्वादस की तरह ही होता है लेकिन इसमें बछड़े की जगह पटरे पर सात बहू-बेटे बना लेते हैं. पाँच अथवा सात कुल्हड़ियाँ बनाई जाती है और झाड़ू की तिल्ली का दरवाजा बना लेते हैं. चने व मोठ छीलते हुए पहले कहानी सुनी जाती है. उसके बाद लोटे का कच्चा दूध मिला जल सूरज को देते हैं.

एक अलग लोटे में पानी लेकर चने, मोठ, लड्डू व फल का बायना निकालकर सास को दिया जाता है. जिस वर्ष लड़की की शादी होती है वह अपने मायके आकर विशेष बायना अपनी सास के लिए निकालती है. यह बायना खास पहला बायना होता है और दूसरा बायना भी निकालते हैं जो हर वर्ष की तरह होगा. कहानी सुनकर तथा बायना निकालकर पहले बासी खाना खाया जाता है फिर उसके बाद दूसरा खाना खाते हैं.

दूबड़ी आठें की कथा – Story Of Dubadi Aathe

प्राचीन समय में एक साहूकार रहता था और उसके सात बेटे थे. वह अपने जिस भी बेटे का विवाह करता वह मर जाता था. इस तरह से उसके छ: बेटे मृत्यु की गोद में चले गए. अब उसका सबसे छोटा पुत्र ही बचा था जिससे वह दुखी रहने लगा कि इसके विवाह के बाद यह भी मर जाएगा. उसके छोटे बेटे के विवाह की भी चर्चा होने लगी और रिश्ता तय होने पर विवाह की तिथि भी पक्की कर दी गई. लड़के विवाह में शामिल होने के लिए उसकी बुआ भी आने लगी तो उसे रास्ते में एक बुढ़िया चक्की पीसते हुए मिली और उसने बुढ़िया से सारी बातें कह डाली.

उसकी बात उनकर बुढ़िया बोली कि विवाह के दिन घर से बाहर आते हुए ही वह दरवाजे के गिरने से दबकर मर जाएगा. अगर वह बच भी गया तो रास्ते में जहां बारात रुकेगी वहाँ पेड़ गिरने से मर जाएगा और अगर यहां भी बच गया तो ससुराल में जाने पर वहां का दरवाजा गिरने से मर जाएगा. अगर यहाँ भी बच गया तो फेरों के समय सातवाँ फेरा लेते हुए साँप के काटने से मर जाएगा. इस पर लड़के की बुआ ने कहा कि हे माता! इसके बचने का कोई उपाय बताओ? इस पर बुढ़िया बोली कि उपाय तो है पर कठिन है.

बुआ ने कहा कि आप उपाय तो बताएं चाहे कठिन ही सही, हम उसे करने का प्रयास तो करें! अगर प्रयास करने पर भी लड़का नहीं बचा तो उसकी किस्मत. बुढ़िया ने कहा कि जब बारात लेकर लड़का घर से निकले तब पीछे की दीवार तोड़कर वहाँ से निकले और रास्ते में बारात कहीं रुकती भी है तो पेड़ के नीचे लड़का ना ठहरे. जब ससुराल पहुंचे तब पीछे के दरवाजे को फोड़कर ही जयमाला करवाना. जब भाँवचर का समय हो जाए तो एक कटोरी में दूध डालकर रख लेना और एक ताँत का फाँसया बनाकर रख लेना. जब साँप दूध पी ले तब उसे फाँसे में फँसाकर बाँध लेना.

साँप के बँधने से उसकी पत्नी सर्पिणी आएगी उसे छुड़ाने के लिए तब तुम कहना कि पहले मेरे छ: भतीजों को जीवित करो. वह तुम्हारे छ: भतीजों को जीवित कर देगी. लेकिन एक बात का ध्यान रखना कि यह बात किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बताना, नही तो बात कहने वाले और बात सुनने वाले दोनों की मृत्यु निश्चित है. दोनों में से कोई नहीं बचेगा. सारी बातें बताने के बाद बुढिया ने अपना नाम दूबड़ी बताया फिर वह चली गई.

जब बारात जाने लगी तब बुआ ने कहा कि ठहरो! मेरे भतीजे को दीवार फोड़कर पीछे से बाहर निकालो. ऎसा होने पर लड़का कुशलपूर्वक बाहर आ गया और आगे का दरवाजा भरभराकर गिर गया तब सब लोग कहने लगे कि बुआ ने लड़के को बचा लिया. बारात जब जाने लगी तो बुआ भी बारात के साथ चलने लगी तब सभी ने बुआ को रोकना चाहा कि औरतें बारात में नहीं आती हैं लेकिन बुआ ने एक नहीं सुनी और वह बारात के साथ चल दी.

बारात रास्ते में एक पेड़ के नीचे रुकने लगी तब बुआ ने बारात को रोका और लड़के को पेड़ के नीचे खड़े होने की बजाय धूप में खड़ा कर दिया. लड़के के धूप में खड़ा होते ही पेड़ भी गिर गया. यह देख सभी बाराती बुआ की प्रशंसा करने लगे. अब पूरी बारात बुआ की समझदारी की कायल हो गई और किसी ने फिर बुआ का विरोध नहीं किया. जब बारात लड़के की ससुराल पहुंची तब बुआ ने लड़के व बारात को पीछे के दरवाजे से भीतर प्रवेश कराया. उसके बाद आगे का दरवाजा भी गिर गया इस पर सभी हैरान थे कि यह सभी बातें बुआ को कैसे पता चली!

अब लड़के की भँवरे पड़ने की बारी आई तो बुआ ने पहले से ही एक कटोरी में कच्चा दूध लेकर रख लिया और ताँत का एक फाँसा भी पास रख लिया. जब लड़के की सातवीं भँवर पड़ने का समय हुआ तभी साँप भी आ गया. साँप को देखते ही बुआ ने उसके आगे दूध की कटोरी रख दी. जब साँप दूध पीने लगा तो बुआ ने उसे ताँत के फाँसे में फंसाकर बाँध लिया. जब सर्पिणी आये तो बुआ ने बह्तीजों को जिन्दा करने की बात कही तो उसने वैसा ही किया और साँप को लेकर चली गई. अब साहूकार के सभी बेटे जीवित थे. बारात कुशलता से वापिस आ गई और साहूकार के बेटों को जीवित करने वाली उस बुढ़िया का नाम दूबड़ी आठे पड़ गया. कहानी सुनने पर सभी को कहना चाहिए कि हे दूबड़ी माता ! जैसे आपने साहूकार के बेटों को जीवित किया वैसे ही आप सभी की रक्षा करना. इस कहानी के बाद बिन्दायक जी की कथा कही अजती जो निम्नलिखित है:-

बिन्दायक जी की कथा – Story Of Bindayak Ji

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दूबड़ी आठे की कथा के बाद बिन्दायक जी की यह कथा भी कही जाती है. प्राचीन समय में एक बुढ़िया रहती थी. वह हर रोज मिट्टी के गणेश जी बनाकर उनकी पूजा करती थी. उस बेचारी बुढ़िया के गणेश जी रोज गल जाते तो वह रोज बनाती. उस बुढ़िया के घर के सामने किसी सेठ का मकान बन रहा था. एक दिन वह बुढ़िया वहाँ गई और बोली – “राजगीर भाई! मेरे मिट्टी के गणेश जी रोज गल जाते हैं इसलिए आप मेरे लिए एक पत्थर के गणेश जी बना दो. गणेश जी की आप पर बहुत कृपा होगी.” इस पर राजगीर ने कहा – “बुढ़िया माई, जितनी देर हम तुम्हारे पत्थर के गणेश जी बनाने में लगाएंगे तब तक सेठ की एक दीवार बन जाएगी.” यह सुनकर बुढ़िया को बहुत दुख हुआ और वह अपने गह्र वापिस आ गई.

राजगीर सेठ जी की दीवार बनाने में लग गया लेकिन एक दिन बीत जाने पर भी दीवार पूरी नहीं हो पा रही थी. जब भी दीवार को बनाने लगते वह टेढ़ी हो जाती थी. शाम को सेठ जी आए और कहा कि आज कोई काम नहीं हुआ? इस पर राजगीर ने बुढ़िया वाली बात सेठ को बताई. सेठ जी बुढ़िया के पास के गए और बोले कि माई! हम तुम्हें सोने के गणेश जी बनाकर देगें, तुम हमारी दीवार सीधी कर दो. यह सुनते ही गणेश जी ने दीवार सीधी कर दी. सेठ ने बुढ़िया माई को सोने के गणेश जी बनाकर दिए. जिन्हें पाकर बुढ़िया बहुत खुश हुई. हे बिन्दायक जी महाराज ! जैसे आपने बुढ़िया पर कृपा की वैसे ही हम सभी पर अपनी दया दृष्टि बनाए रखना.

भाद्रपद माह के व्रत तथा त्यौहार- भाग 4 के लिए यहाँ क्लिक करें.

https://chanderprabha.com/2016/06/20/fasts-and-festivals-of-bhadrapad-month-part-4-2/

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