प्रेम विवाह अथवा अंतर्जातीय विवाह के ज्योतिषीय योग – भाग 1

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वर्तमान समय में युवक-युवतियाँ जहाँ हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहें है वहाँ एक-दूसरे के प्रति आकर्षण होना भी आम बात हो गई है और यह आकर्षण कब प्रेम का रुप ले लेता है पता ही नहीं चलता. ऎसे में प्रेम विवाह होना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह गई है. दिन प्रतिदिन प्रेम विवाह बढ़ते ही जा रहे हैं लेकिन प्रेम विवाह का योग जन्म कुण्डली में बन रहा है तभी प्रेम विवाह होगा अन्यथा नहीं. कई बार प्रेम संबंध टूट भी जाते हैं.

इस लेख के माध्यम से पाठकों को उन ग्रहों व भावों के बारे में बताया जाएगा जो प्रेम विवाह होने में अपनी भूमिका अदा करते हैं.

लग्न और लग्न का स्वामी ग्रह जिसे लग्नेश कहा जाता है वह व्यक्ति के चरित्र, स्वभाव तथा व्यवहार को दर्शाते हैं. कुण्डली के पंचम भाव से व्यक्ति की भावनाओं (Emotions) का पता चलता है और सप्तम भाव से विवाह का आंकलन किया जाता है. जब जन्म कुण्डली में लग्न या लग्नेश का संबंध पंचम व सप्तम से बनता है तब यह प्रेम विवाह का योग बन जाता है. लग्न व्यक्ति, पंचम भाव भावनाएं तथा सप्तम भाव जीवनसाथी, तीनों का मेल प्रेम विवाह हुआ.

पंचम भाव को पिछले जन्म के कर्मों के लिए भी देखा जाता है और उन कर्मों का कार्यान्वित होना भी इस जन्म में देखा जाता है. पंचम भाव से तो भावनाओं को देखा ही जाता है साथ ही शुक्र ग्रह भी प्रेम का कारक माना जाता है. जब कुंडली के पंचम भाव में बली व पापरहित शुक्र ग्रह स्थित हो तब यह प्रेम का शुद्ध, सरल तथा सात्विक रुप दिखाता है. जब इनका संबंध सप्तम से भी हो रहा हो तब प्रेम विवाह होता है.

सप्तम भाव से विवाह देखने के साथ जीवनसाथी का स्वरुप भी देखा जाता है कि वह कैसा रहेगा और विवाह सफल है या असफल रहेगा. जीवनसाथी का व्यवहार आदि भी इस भाव से देखा जा सकता है. इस भाव से यौन लिप्सा भी देखी जा सकती है. यदि सप्तम भाव पाप ग्रहों के प्रभाव में है तब विवाह सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल नहीं होगा. शुक्र प्रेम व यौन संबंधों को दर्शाता है और यदि सप्तम भाव में शुक्र के साथ मंगल भी स्थित है तब प्रेम संबंधों में वासना की अधिकता देखी जा सकती है और मर्यादाओं का उल्लंघन भी होता है.

शुक्र ग्रह यौन संबंधों में आकर्षण, यौन सुख तथा सांसारिक सुख भोगने की चाह को जगाता है. जन्म कुण्डली में यदि शुक्र का संबंध शनि या राहु से बनता है तब विपरीत लिंगी से संबंध तो बन जाता है लेकिन अधिकाँशत: ऎसे संबंधों का अंत दुखद ही होता है. कई बार ऎसे योग में प्रेम संबंधों को विवाह में तब्दील करने में अनेकों बाधाएँ भी आती हैं.

जन्म कुण्डली के नवम भाव को धर्म त्रिकोण कहा गया है और इस भाव से पिता को भी देखा जाता है. अगर किसी जातक की जन्म कुण्डली में नवम भाव या भावेश अथवा नवम भाव के कारक बृहस्पति पर पाप प्रभाव होता है तब जातक धार्मिक मान्यताओं के साथ पिता की अवलेहना भी कर सकता है और प्राय: ऎसे योग में घर से भागकर विवाह किया जाता है.

प्रेम विवाह के लिए जब कोई जातक माता-पिता की आज्ञा की अवहेलना करता है और सामाजिक मर्यादाओं को भी लाँघता है तथा दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाकर ही मानता है तब ऎसे में मंगल के बली होने के साथ तृतीय भाव का बली होना भी आवश्यक है क्योंकि मंगल तथा तृतीय भाव से व्यक्ति का साहस देखा जाता है. जब व्यक्ति में साहस की कमी होगी तब वह कैसे दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है, वह ऎसा नहीं कर पाएगा.

सामाजिक मान्यताओं को अनदेखा करने के लिए क्रूर व पाप ग्रहों जैसे राहु, केतु, शनि व मंगल का प्रभाव देखा जाता है कि जातक पर इनका कितना प्रभाव है. त्रिक भावों (6, 8, 12) से अगर लग्नेश, सप्तमेश अथवा शुक्र का किसी भी रुप में संबंध (स्थिति, युति अथवा दृष्टि संबंध) बन रहा है तब यह भी असामाजिक संबंधों को दर्शाता है.

अधिकाँश प्रेम विवाह की कुण्डलियों में राहु की भूमिका देखी गई है क्योंकि राहु के प्रभाव से व्यक्ति को कुछ समझ नहीं आता है कि क्या सही है और क्या गलत है. दूसरों के समझाने का भी कोई प्रभाव जातक पर नहीं पड़ता है. प्रेम विवाह होने में शुक्र का पाप पीड़ित होना अथवा राहु की दशा/अन्तर्दशा का होना अथवा राहु से युति/दृष्टि/स्थिति अथवा दशानाथ का राहु के नक्षत्र में होना देखा गया है. यदि किसी की जन्म कुण्डली में चंद्रमा अथवा लग्नेश पाप ग्रहों के प्रभाव में है तब वह भी प्रेम संबंधों का कारण बनता है.

जन्म कुण्डली में अष्टमेश अथवा अष्टम भाव पर राहु/केतु, शनि अथवा मंगल आदि ग्रहों का दुष्प्रभाव पड़ रहा हो तब विवाह में मान्यताओं का उल्लँघन किसी ना किसी रुप में होता ही है. यही संबंध जन्म कुण्डली की बजाय नवाँश कुण्डली में बन रहा है तब भी यही फल माना जाएगा.

यदि लग्न या लग्नेश का पंचम व सप्तम भाव अथवा इनके स्वामियों से किसी भी प्रकार से संबंध बन रहा है तब ऎसे में प्रेम विवाह होने की संभावनाएँ प्रबल होती हैं. ऎसे में यदि चंद्र भी लग्न अथवा सप्तम भाव से किसी तरह का संबंध बनाता है तो प्रेम विवाह की संभावना को अधिक बल मिलता है. संबंध बनाने से तात्पर्य ग्रह का किसी भाव में स्थित होना या उस भाव/भावेश को दृष्ट करना अथवा भावेश से युति करना होता है.

यदि किसी जातक के लग्न में ही राहु अथवा केतु के साथ शुक्र व चंद्र स्थित हों तब प्रेम विवाह का योग बनता है. यदि राहु/केतु लग्न से, सप्तम से या शुक्र से 1:7 या 2:8 भावों की धुरी पर स्थित हों तब सामाजिक मान्यताओं से हटकर विवाह होता है.

किसी जातक की कुण्डली में सप्तमेश तथा पंचमेश का राशि परिवर्तन हो रहा हो अथवा युति हो या दृष्टि संबंध बन रहा हो अथवा किसी भी तरह से संबंध बन रहा हो तब यह प्रेम विवाह का योग बनता है.

किसी जातक की कुण्डली में राहु यदि शनि, मांदि अथवा मंगल के प्रभाव में ना हो और बली अवस्था में सप्तम भाव में स्थित हो तब जातक का विवाह जिससे होगा वह व्यक्ति विदेश से संबंध रखने वाला होगा. ऎसे अवस्था में यह भी संभव है कि जीवनसाथी देश में रहकर ही किसी विदेशी कंपनी में काम करता हो.  

भाग – 2 के लिए यहां क्लिक करें (For Part – 2 Click here)

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