कनकधारा स्तोत्र

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9066244-1363481641302 kanakaअंग हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम ।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदाsस्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया: ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदान दक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्ध मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया: ।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रम भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया: ।।4।।

बाह्यन्तरे मुरजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।

कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारे र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव ।
मातु: समस्तजगतां महनीय मूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धम मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा-मस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह: ।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टि: प्रह्रष्टमकमलोदरदीप्तिरिष्टाम पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।9।।

गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोsस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै ।।11।।

नमोsस्तु नालीकनिभाननायै नमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोsस्तु सोमामृतसोदरायै नमोsस्तु नारायणवल्लभायै ।।12।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधि: सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
सन्तनोति वचनांगमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।14।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम ।।15।।

दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखाव सृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धि पुत्रीम ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितै रपांगै: ।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम ।
गुणाधिका गुरुतर भाग्यभागिनो ते भुवि बुधभाविताशया: ।।18।।

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55 टिप्पणियाँ

  1. Chander Prabha कहते हैं:

    आपकी जन्म कुंडली का दशाक्रम सही नहीं है इसलिए परेशानियाँ आ रही हैं। अभी राहु में शुक्र चल रहा है तो शुक्र दशमाँश कुंडली में नीच के हो गए हैं वो भी राहु/केतु अक्ष पर स्थित होकर। आपकी कुंडली में सूर्य अपनी उच्च राशि में स्थित है तो आपने रूबी क्यूँ पहन लिया?? ये समझ नहीं आया। चंद्रमा अस्त है तो मोती पहन सकते हैं, फिर आपको किसी ने पन्ना पहनने के लिए कहा तो आपने पहन लिया, वो नहीं पहनना है। आपकी कुंडली के भाग्य भाव में बुध नीच का है तो आपको पन्ना पहना दिया गया लेकिन ये किसी ने नहीं देखा कि भाग्य भाव का स्वामी अपने से बारहवें भाव अर्थात अष्टम भाव में स्थित हैं जिससे आपके भाग्य का व्यय हो गया। आप भाग्य को बली बनाएँ। पन्ना उतार दें और गुरु के लिए पुखराज धारण करें या उसका उपरत्न सुनहला धारण करें। इसे आप शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को सुबह सूर्योदय से एक घंटे के अंदर पहन लें। रुद्राक्ष पहने रखें क्योंकि मुझे नहीं समझ आया कभी इसे धारण क्यूँ किया जाता है। आप हर रोज विष्णू भगवान की पूजा करें। राहु आपको भ्रमित रखता है इसलिए रात के समय राहु के मंत्र की एक माला जरुर करें। सोते समय पैरों को धोकर सोएँ और कोशिश करें कि बाहर के लोगों का दिया प्रसाद ना खाने पाएँ। हर रोज संध्या समय में हनुमान जी की पूजा अवश्य करें। मंगलवार के दिन हनुमान जी को प्रसाद लगाएँ।

    नीच के बुध के लिए आप रोज बुध के मंत्र का जाप सुबह के समय करें आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा।

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