कार्तिक माह माहात्म्य – पैंतीसवाँ अध्याय

अनुपम कथा कार्तिक, होती है सम्पन्न। इसको पढ़ने से, श्रीहरि होते हैं प्रसन्न।। इतनी कथा सुनकर सभी ऋषि सूतजी से बोले – हे सूतजी! अब आप हमें तुलसी विवाह की विधि बताइए. सूतजी बोले – कार्तिक शुक्ला नवमी को द्वापर युग का आरम्भ हुआ है. अत: यह तिथि दान और उपवास में क्रमश: पूर्वाह्नव्यापिनी तथा…

कार्तिक माह माहात्म्य – चौंतीसवाँ अध्याय

सूतजी ने ऋषियों से, कहा प्रसंग बखान। चौंतीसवें अध्याय पर, दया करो भगवान।। ऋषियों ने पूछा – हे सूतजी! पीपल के वृक्ष की शनिवार के अलावा सप्ताह के शेष दिनों में पूजा क्यों नहीं की जाती? सूतजी बोले – हे ऋषियों! समुद्र-मंथन करने से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी…

कार्तिक माह माहात्म्य – तैंतीसवाँ अध्याय

दया दृष्टि कर हृदय में, भव भक्ति उपजाओ। तैंतीसवाँ अध्याय लिखूँ, कृपादृष्टि बरसाओ।। सूतजी ने कहा – इस प्रकार अपनी अत्यन्त प्रिय सत्यभामा को यह कथा सुनाकर भगवान श्रीकृष्ण सन्ध्योपासना करने के लिए माता के घर में गये. यह कार्तिक मास का व्रत भगवान विष्णु को अतिप्रिय है तथा भक्ति प्रदान करने वाला है. 1)…

कार्तिक माह माहात्म्य – बत्तीसवाँ अध्याय

मुझे सहारा है तेरा, सब जग के पालनहार। कार्तिक मास के माहात्म्य का बत्तीसवाँ विस्तार।। भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा – हे प्रिये! यमराज की आज्ञा शिरोधार्य करते हुए प्रेतपति धनेश्वर को नरकों के समीप ले गया और उसे दिखाते हुए कहने लगा – हे धनेश्वर! महान भय देने वाले इन नरकों की ओर दृष्टि…

कार्तिक माह माहात्म्य – इक्कतीसवाँ अध्याय

कार्तिक मास माहात्म्य का, यह इकत्तीसवाँ अध्याय। बतलाया भगवान ने, प्रभु स्मरण का सरल उपाय।। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – पूर्वकाल में अवन्तिपुरी (उज्जैन)में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था.वह रस, चमड़ा और कम्बल आदि का व्यापार करता था. वह वैश्यागामी और मद्यपान आदि बुरे कर्मों में लिप्त रहता था. चूंकि वह रात-दिन पाप में…

कार्तिक माह माहात्म्य – तीसवाँ अध्याय

कार्तिक मास की कथा, करती भव से पार। तीसवाँ अध्याय लिखूँ हुई हरि कृपा अपार।। भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा से बोले – हे प्रिये! नारदजी के यह वचन सुनकर महाराजा पृथु बहुत आश्चर्यचकित हुए. अन्त में उन्होंने नारदजी का पूजन करके उनको विदा किया. इसीलिए माघ, कार्तिक और एकादशी – यह तीन व्रत मुझे अत्यधिक प्रिय…

कार्तिक माह माहात्म्य – उन्नत्तीसवाँ अध्याय

प्रभु कृपा से लिख रहा, सुन्दर शब्द सजाय। कार्तिक मास माहात्म का, उन्तीसवाँ अध्याय।। राजा पृथु ने कहा – हे मुनिश्रेष्ठ! आपने कलहा द्वारा मुक्ति पाये जाने का वृत्तान्त मुझसे कहा जिसे मैंने ध्यानपूर्वक सुना. हे नारदजी! यह काम उन दो नदियों के प्रभाव से हुआ था, कृपया यह मुझे बताने की कृपा कीजिए. नारद…

कार्तिक माह माहात्म्य – अठ्ठाईसवाँ अध्याय

पढ़े सुने जो प्रेम से, वह हो जाये शुद्ध स्वरुप। यह अठ्ठाईसवाँ अध्याय कार्तिक कथा अनूप।। धर्मदत्त ने पूछा – मैंने सुना है कि जय और विजय भी भगवान विष्णु के द्वारपाल हैं. उन्होंने पूर्वजन्म में ऎसा कौन सा पुण्य किया था जिससे वे भगवान के समान रूप धारण कर के वैकुण्ठधाम के द्वारपाल हुए?…

कार्तिक माह माहात्म्य – छब्बीसवाँ अध्याय

कार्तिक मास माहात्म्य का छब्बीसवाँ अध्याय। श्री विष्णु की कृपा से, आज तुमको रहा बताय।। नारद जी बोले – इस प्रकार विष्णु पार्षदों के वचन सुनकर धर्मदत्त ने कहा – प्राय: सभी मनुष्य भक्तों का कष्ट दूर करने वाले श्रीविष्णु की यज्ञ, दान, व्रत, तीर्थसेवन तथा तपस्याओं के द्वारा विधिपूर्वक आराधना करते हैं. उन समस्त…

कार्तिक माह माहात्म्य – पच्चीसवाँ अध्याय

सुना प्रश्न ऋषियों का और बोले सूतजी ज्ञानी। पच्चीसवें अध्याय में सुनो, श्री हरि की वाणी।। तीर्थ में दान और व्रत आदि सत्कर्म करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं परन्तु तू तो प्रेत के शरीर में है, अत: उन कर्मों को करने की अधिकारिणी नहीं है. इसलिए मैंने जन्म से लेकर अब…

कार्तिक माह माहात्म्य – चौबीसवाँ अध्याय

लिखवाओ से निज दया से, सुन्दर भाव बताकर। कार्तिक मास चौबीसवाँ अध्याय सुनो सुधाकर।। राजा पृथु बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! आपने तुलसी के इतिहास, व्रत, माहात्म्य के विषय में कहा. अब आप कृपाकर मुझे यह बताइए कि कार्तिक मास में क्या और भी देवताओं का पूजन होता है? यह भी विस्तारपूर्वक बताइए. नारद जी बोले…

कार्तिक माह माहात्म्य – तेईसवाँ अध्याय

तेईसवाँ अध्याय वर्णन आँवला तुलसी जान। पढ़ने-सुनने से ‘कमल’ हो जाता कल्यान।। नारद जी बोले – हे राजन! यही कारण है कि कार्तिक मास के व्रत उद्यापन में तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. तुलसी भगवान विष्णु को अधिक प्रीति प्रदान करने वाली मानी गई है. राजन! जिसके घर में…