कार्तिक माह माहात्म्य – तैंतीसवाँ अध्याय
दया दृष्टि कर हृदय में, भव भक्ति उपजाओ। तैंतीसवाँ अध्याय लिखूँ, कृपादृष्टि बरसाओ।। सूतजी ने कहा – इस प्रकार अपनी
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दया दृष्टि कर हृदय में, भव भक्ति उपजाओ। तैंतीसवाँ अध्याय लिखूँ, कृपादृष्टि बरसाओ।। सूतजी ने कहा – इस प्रकार अपनी
मुझे सहारा है तेरा, सब जग के पालनहार। कार्तिक मास के माहात्म्य का बत्तीसवाँ विस्तार।। भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा
कार्तिक मास माहात्म्य का, यह इकत्तीसवाँ अध्याय। बतलाया भगवान ने, प्रभु स्मरण का सरल उपाय।। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा –
कार्तिक मास की कथा, करती भव से पार। तीसवाँ अध्याय लिखूँ हुई हरि कृपा अपार।। भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा से बोले
प्रभु कृपा से लिख रहा, सुन्दर शब्द सजाय। कार्तिक मास माहात्म का, उन्तीसवाँ अध्याय।। राजा पृथु ने कहा – हे
पढ़े सुने जो प्रेम से, वह हो जाये शुद्ध स्वरुप। यह अठ्ठाईसवाँ अध्याय कार्तिक कथा अनूप।। धर्मदत्त ने पूछा –