कार्तिक माह की पाँच की एक कहानी
कार्तिक माह में बहुत सी कहानियाँ कही जाती हैं लेकिन अब जो कहानी बताई जा रही है वह एक ही
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कार्तिक माह में बहुत सी कहानियाँ कही जाती हैं लेकिन अब जो कहानी बताई जा रही है वह एक ही
चौपाई जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज। वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय निकुंज।। जयति कपाली कालिका,
दोहा -Doha जनक जननि पदम दुरज, निजब मस्तक पर धारि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि।। पूर्ण जगत में
इन्द्र उवाच नमस्तेSस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोSस्तु ते।।1।। अर्थ – इन्द्र बोले – श्रीपीठ पर स्थित और देवताओं
ब्रह्मोवाच – Brahmovach स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर:। मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्।।1।। अर्थ – ब्रह्मा जी बोले – ‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण
अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्य महादेव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, शीतला देवता, लक्ष्मी बीजम्, भवानी शक्ति:, सर्व-विस्फोटकनिवृत्तय अर्थ – इस श्रीशीतला स्तोत्र के ऋषि